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जनसत्ता संवाद- रिजर्व बैंक: पेशेवर अर्थशास्री बनाम आइएएस की बहस

आरबीआइ गवर्नर के लिए कोई उम्र सीमा तय नहीं है। कानूनन कोई योग्यता भी निर्धारित नहीं है। हालांकि, सरकारें वैसे लोगों को चुनती रही हैं, जिनके पास अर्थव्यवस्था और वित्तीय क्षेत्र की अच्छी समझ हो। आरबीआइएक्ट सरकार को आरबीआइ गवर्नर का कार्यकाल तय करने की छूट देता है, लेकिन यह पांच साल से ज्यादा नहीं हो सकता। हालांकि, सरकार चाहे तो किसी को लगातार दूसरी बार आरबीआई गवर्नर पद पर नियुक्त कर सकती है।

Author December 18, 2018 4:48 AM
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास (फाइल)

सम-सामयिक- जनसत्ता संवाद
शक्तिकांत दास को भारतीय रिजर्व बैंक का 25वां गवर्नर बनाए जाने के बाद अर्थव्यवस्था को लेकर मंथन करने वालों की राय इस नियुक्ति पर बंटी हुई दिख रही है। कई का यह कहना है कि जब केंद्रीय बैंक को किसी विशेषज्ञ की जरूरत थी, तब भारतीय प्रशासनिक सेवा (आइएएस) के इस अधिकारी को शीर्ष पद पर बिठाना दुरुस्त नहीं। दूसरी तरह के विचार रखने वालों का कहना है कि पेशेवर अर्थशास्री अपनी सोच थोपते रहते हैं, ऐसे लोग सरकार के साथ गतिरोध खत्म कर मुद्दे सुलझाने पर ध्यान नहीं देते। माना जा रहा है कि इस तर्क को ही ध्यान में रखकर सरकार ने गवर्नर पद पर आइएएस अधिकारी को बिठाया है। फैसला कितना सही है, यह तो भविष्य में पता चलेगा। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि अतीत में रिजर्व बैंक के गवर्नर के तौर पर आइएएस अधिकारियों की लंबी परंपरा रही है।

अब तक बनाए गए 25 गवर्नर में रिजर्व बैंक ने 11 आइएएस को शीर्ष पद पर देखा है। पांच गवर्नर अथर्शास्त्री रह चुके हैं। इस पद पर एक बैंकर, एक कंपनी कार्यकारी और एक आरबीआइ के ही डिप्टी गवर्नर काबिज हो चुके हैं। रिजर्व बैंक के चार डिप्टी गवर्नरों की नियुक्ति के नियमों के उलट गवर्नर के लिए कोई नियम तय नहीं है। संसात गवर्नर पुरानी पद्धति वाली आइसीएस सेवा से रहे। आरएन मल्होत्रा पहले आइएएस थे, जो आरबीआइ के गवर्नर बने। रिजर्व बैंक के पहले गवर्नर आस्बार्न स्मिथ एक पेशेवर गवर्नर थे। 1975 तक के गवर्नर प्रशासनिक सेवा से थे। इस बीच, गवर्नर बनाए गए पीसी भट्टाचार्य भारतीय लेखा सेवा से थे और बीएन आदरकर अर्थशास्त्री। वह आरबीआइ के डिप्टी गवर्नर थे और उन्हें प्रोन्नत कर थोड़े समय के लिए गवर्नर बनाया गया।

इस बाद अगले 10 साल तक मिश्रित पृष्ठभूमि वाले गवर्नर बने। 1985 में आरएन मल्होत्रा। उनके बाद एस वेंकटरमन दो साल के लिए रहे, जिन्होंने 1991 में महती भूमिका निभाई। उदारीकरण के बाद के दौर में तीन अर्थशास्त्री- डॉ. मनमोहन सिंह, सी रंगराजन और बिमल जालान आए। जालान के बाद उनके डिप्टी गवर्नर वाइवी रेड्डी गवर्नर बनाए गए। वह आइएएस थे, लेकिन अर्थशास्त्र का अध्ययन किया था। डी सुब्बाराव की भी ऐसी ही पृष्ठभूमि रही। इसके बाद आए रघुराम राजन और उर्जित पटेल भी अर्थशास्त्री रहे।

रिजर्व बैंक जो 13 गैर-आइएएस गवर्नर रहे, उन्होंने या तो वित्त मंत्रालय में काम किया था, या सरकार से साथ किसी विभाग में रहे। सीडी देशमुख, बीएन आदरकर, आइजी पटेल, डॉ. मनमोहन सिंह, बिमल जालान, रघुराम राजन- ये सभी वित्त मंत्रालय में सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे। देशमुख और डॉ. सिंह तो वित्त मंत्री भी बने। केआर पुरी (एलआइसी से), अमिताभ घोष (पेशेवर बैंकर), सी रंगराजन (अर्थशास्त्री) और उर्जित पटेल (अर्थशास्त्री) ऐसे रहे, जो सरकार के साथ किसी पद पर नहीं थे। सबसे पहले मधु लिमये ने संसद में 1968 में किसी प्रशासनिक सेवा अधिकारी को आरबीआइ गवर्नर बनाए जाने पर आपत्ति दर्ज कराई थी। 1993 में पूर्व गवर्नर आइजी पटेल ने एक इंटरव्यू में कहा कि क्यों वित्त मंत्रालय के किसी सचिव को गवर्नर बनाया जाए? क्यों नहीं किसी अर्थशास्त्री-शिक्षाविद या सफल कारोबारी को आरबीआइ का गवर्नर बनाया जाए?

इस बात के ऐतिहासिक साक्ष्य हैं कि शुरु में ब्रिटिश सरकार रिजर्व बैंक की स्वायत्तता को लेकर चिंतित रही और उसने कोशिश की कि केंद्रीय बैंक सरकार के किसी दूसरे विभागों की तरह न बन जाए। इसी कारण स्मिथ को गवर्नर बनाया गया, जो तब इंपीरियल बैंक के प्रमुख थे और अपनी स्वतंत्र सोच के लिए जाने जाते थे। हालांकि, बाद में सरकार ने बैंक पर नियंत्रण की कोशिश की। स्टर्लिंग पाउंड और रुपए की कीमत को लेकर मौद्रिक नीति तय करने में उनका सरकार से टकराव बढ़ा। स्मिथ ने अगले दो साल में ही जून 1937 में इस्तीफा दे दिया और आइसीएस अधिकारी को शीर्ष पद पर लाया गया।

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