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जनसत्ता युवा शक्ति: खुदा के दर पर खुदमुख्तार

मेहरम के बगैर हज यात्रा की इजाजत को मुसलिम महिलाएं तीन तलाक के बाद सरकार की ओर से मिली दूसरी सबसे बड़ी आजादी मान रही हैं। इसका असर यह है कि इस साल करीब दो हजार से अधिक महिलाओं ने अकेले हज पर जाने की अर्जी लगाई। वहीं, अगले साल यानी 2019 के लिए भारतीय हज समिति को अब तक लगभग 2 लाख 23 हजार से अधिक आवेदन मिल चुके हैं। खास बात यह है कि आवेदन करने वालों में 47 फीसद से अधिक ऐसी महिलाएं हैं जिन्होंने अकेले हज यात्रा पर जाने की इच्छा जताई है। खैर यह तो अभी शुरुआत है, आंकड़े अभी और बढ़ेंगे। हज यात्रा में महिलाओं की हिस्सेदारी और बढ़ेगी। लेकिन महिलाओं ने इस आजादी के साथ और भी कई बंधनों से मुक्ति की मांग की है। उम्मीद है सरकारें इस पर जरूर ध्यान देंगी।

Author Published on: December 20, 2018 5:13 AM
रूबा अंसारी (लेफ्ट) और निशात इमरान

सुमन केशव सिंह

हमारा मजहब औरतों को आजादी देता है मगर…

इस्लाम में मेहरम वह शख्स होता है जो लड़की से शादी नहीं कर सकता लेकिन वह उसका सबसे करीबी होता है। अब इस शख्स के बगैर भी महिलाएं हज यात्रा के लिए जा सकती हैं। ये किसी आजादी से कम नहीं है। ये वैसी ही आजादी है, जैसे महिलाओं को तीन तलाक से आजादी मिली थी। ऐसा मानना है शाजिया अल अहमद का जो पेशे से शिक्षिका हैं और मुसलिम बच्चों को, खासकर लड़कियों, को पढ़ाती हैं। दिल्ली की शाजिया का कहना है कि कई बार वे मुसलिम महिलाएं जो हज जाने में सक्षम होती हैं लेकिन वह किन्हीं कारणों से भी अकेली हैं। वह हज के लिए नहीं जा पातीं क्योंकि उनके पास मेहरम नहीं होते थे। यह फैसला महिलाओं को घूमने या कहीं भी आने-जाने की आजादी का है। इस फैसले का सभी मुसलिम महिलाओं को स्वागत करना चाहिए। शाजिया कहती हैं कि हमारा मजहब ही महिलाओं को ये आजादी देता है। हमारा धर्म भी यह कहता है कि तालीम लेने के लिए अगर चीन जाना हो तो वहां भी जाकर तालीम हासिल करो। शाजिया के अनुसार इस्लाम में कहीं भी औरत और मर्द का फर्क नहीं है। इस्लाम कहता है कि अगर आप को एक बेटा व एक बेटी है और आपकी हैसियत किसी एक को तालीम देने की है तो लड़की को तालीम दीजिए क्योंकि इससे पूरा कुनबा पढ़ता है। यह अलग बात है कि इस्लाम के ठेकेदारों ने केवल उन चीजों को उजागर किया जिनसे महिलाओं को बांधा जा सकता है। शाजिया ने इस बात पर जोर देकर कहा कि इस्लाम ने औरत और मर्द दोनों को बराबरी का दर्जा दिया है। इस्लाम औरतों को गुलाम बनाने के पक्ष में नहीं इसलिए मुझे विरासती संपत्ति में हक दिया गया है। यह भी उनकी आजादी से जुड़ा मसला है।
-राजबाला देवी

मुसलिम महिलाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाएगा यह फैसला
24 साल की रूबा अंसारी कहती हैं कि वे महिलाएं जो तलाकशुदा हैं, अकेली रह रही हैं, सक्षम हैं और उनके पास दो लोगों को ले जाने का पैसा नहीं है, अब वे भी अपनी इच्छा से हज जा सकेंगी। मेहरम को साथ ले जाना किसी बंधन जैसा ही था। इसके हटाए जाने के बाद मुसलिम महिलाओं की न केवल सोच, समझ में इजाफा होगा बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। ये एक बड़ी आजादी है। पहले हज जाने वाली महिला को कुछ भी पता नहीं होता था। कैसे जाना है, क्या करना है, वहां क्या-क्या होता है, किन-किन कागजी कार्रवाई से गुजरना पड़ता है आदि। इसके अलावा उन्हें पुरुषों की मर्जी पर ही निर्भर रहना पड़ता कि वह सऊदी जाकर क्या-क्या देखेंगी, क्या खाएंगी और कहां-कहां घूूमेंगी। इस प्रकार वे सऊदी को पूरी तरह से समझ भी नहीं सकती थीं। इस फैसले से न सिर्फ वे इन सब छोटी बड़ी चीजों से दो-चार होंगी तो जाहिर तौर पर वे इन चीजों को जानेंगी, समझेंगी जिससे उनके आत्मविश्वास में इजाफा आएगा। रूबा कहती हैं कि वे कुल मिलाकर मर्दों की मर्जी से ही कुछ कर पाती थीं। अब वे जब अकेली जाएंगी तो वे अपनी मर्जी से हज का आनंद ले सकेंगी। यकीनी तौर पर वो इस्लाम को भी अपने नजरिए से समझेंगी और नए देश को भी। रूबा कहतीं हैं कि ये मौका भी है कि उन महिलाओं के लिए जो अकेली यात्रा करना चाहती हैं।

-रूबा अंसारी

…ताकि महिलाओं को समाज में बराबरी का मौका मिले
अलीगढ़ की निशात इमरान का मानना है कि ये तो बहुत अच्छी खबर है कि महिलाओं को सऊदी अरब की ओर से मेहरम के बगैर भी हज पर जाने की आजादी दी गई है और हिंदुस्तान में भी इसे उसी तरह स्वीकारा गया। हज की इच्छा रखने वाली महिलाओं के साथ हमेशा ये दिक्कत आती थी कि वो मेहरम को साथ लेकर ही जा सकती हैं। इमरान कहती हैं कि मेरे सामने कई बार ऐसे मसले आए कि महिलाएं हज को जाना चाहती हैं लेकिन बेटा फौज में है, शौहर का इंतकाल हो चुका हैं। अब बेटा उन्हें नौकरी के बाद ही हज ले जा सकता है, अकेले वह जा नहीं सकतीं लेकिन अब ये कानून बना है तो ये बहुत अच्छी बात है। आप इसे तीन तलाक के बाद सरकार और वैश्विक पटल पर महिलाओं को मिली बड़ी आजादी के रूप में देख सकते हैं। इमरान अलीगढ़ में मुसलिम झुग्गी-बस्तियों के बच्चों को पढ़ाती हैं। उन्होंने बताया कि मेरहम के बाद हलाला, इद्दत बुर्का और बहुविवाह जैसी चीजों से भी महिलाओं को आजादी मिलनी चाहिए। ये अलग बात है कि अब ज्यादातर मुसलमानों के पास इतनी हैसियत नहीं लेकिन वे धमकी देकर अपनी बातों को मनवाने के लिए महिलाओं पर दबाव डालते हैं। इसलिए सरकार को चाहिए कि इन चीजों पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रयास करें ताकि मुसलिम समाज की महिलाओं को भी समाज में बराबरी मिल सके।

-निशात इमरान

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