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जनसत्ता संवाद: क्यों नोटा को अपना रहे मतदाता?

हाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत नहीं मिलने की बड़ी वजह नोटा (नन आॅफ द अबव) को मिले वोट बताए जा रहे हैं। पांच राज्यों के चुनाव में 16 लाख से अधिक मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया है। मध्यप्रदेश में नोटा के कारण 11 सीटों पर कांग्रेस को फायदा हुआ। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में 18 सीटें ऐसी हैं, जहां जीत-हार के अंतर से ज्यादा नोटा पर वोट पड़े। इनमें राजस्थान में 11 और छत्तीसगढ़ की आठ सीटें शामिल हैं।

Author December 18, 2018 5:21 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर। (फाइल)

जनसत्ता संवाद- जानें-समझें

दीपक रस्तोगी

हाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत नहीं मिलने की बड़ी वजह नोटा (नन आॅफ द अबव) को मिले वोट बताए जा रहे हैं। पांच राज्यों के चुनाव में 16 लाख से अधिक मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया है। मध्यप्रदेश में नोटा के कारण 11 सीटों पर कांग्रेस को फायदा हुआ। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में 18 सीटें ऐसी हैं, जहां जीत-हार के अंतर से ज्यादा नोटा पर वोट पड़े। इनमें राजस्थान में 11 और छत्तीसगढ़ की आठ सीटें शामिल हैं। छत्तीसगढ़ की दंतेवाड़ा और राजस्थान की बेंगू सीट पर सबसे ज्यादा नोटा को वोट मिले। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नोटा पर सबसे ज्यादा 9929 वोट पड़े, वहींं राजस्थान के बेंगू में 3165 मिले। नोटा का इस्तेमाल भारत के अलावा स्पेन, कोलंबिया, इंडोनेशिया, कनाडा, नार्वे, यूक्रेन, ब्राजील, बांग्लादेश, फिनलैंड, स्वीडन, चिली, फ्रांस, बेल्जियम में किया जाता है।

क्या है नोटा?
अगर आपको किसी पार्टी का कोई उम्मीदवार पसंद न हो और आप उनमें से किसी को भी अपना वोट देना नहीं देना चाहते हैं तो फिर आप क्या करेंगे? इस सवाल का जवाब देते हुए चुनाव आयोग चुनाव प्रणाली में एक ऐसा तंत्र विकसित किया है, जिसमें यह दर्ज हो सके कि कितने फीसद लोगों ने किसी को भी वोट देना उचित नहीं समझा है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में उम्मीदवारों की सूची में सबसे आखिर में नोटा का गुलाबी बटन होता है। नोटा उम्मीदवारों को खारिज करने का एक विकल्प देता है। चुनाव आयोग ने 18 सितंबर 2015 को आधिकारिक रूप से नोटा का चिन्ह घोषित किया। इस चिन्ह को अहमदाबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ डिजाइन ने बनाया।

कैसे सामने आया?
नोटा (नन आॅफ द अबव) मतदाता को यह अधिकार देता है कि वह चुनाव लड़ रहे किसी भी उम्मीदवार के लिए मतदान नहीं करे। वर्ष 2009 में चुनाव आयोग ने नोटा संबंधी विकल्प उपलब्ध कराने की मंशा जताई थी। नागरिक अधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने 2004 में नोटा के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की। 27 सितंबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया और चुनाव आयोग को ईवीएम में नोटा का बटन उपलब्ध कराने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि इससे राजनीतिक दलों पर भी अच्छे चुनाव प्रत्याशी खड़े करना का दबाव रहेगा।

दर्जा क्या है?
वर्ष 2018 में नोटा को भारत में पहली बार उम्मीदवारों के समकक्ष दर्जा मिला। हरियाणा में दिसंबर 2018 में पांच जिलों में होने वाले नगर निगम चुनावों के लिए हरियाणा चुनाव आयोग ने निर्णय लिया कि नोटा के विजयी रहने की स्थिति में सभी प्रत्याशी अयोग्य घोषित हो जाएंगे एवं दोबारा चुनाव कराया जाएगा।
इससे पहले ऐसी स्थिति में द्वितीय स्थान पर रहे प्रत्याशी को विजयी माना जाता था। इस प्रावधान को अब हर चुनाव के लिए लागू कर दिया गया है। मतगणना के दौरान नोटा मतों की गिनती उसी तरह की जाती है, जिस तरह उम्मीदवारों के मतों की गिनती होती है।

सबसे पहले कब?
नोटा का इस्तेमाल सबसे पहले 2013 में छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान, मध्यप्रदेश और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के विधानसभा चुनाव में हुआ। तब चुनाव में 15 लाख लोगों ने नोटा का पहली बार इस्तेमाल किया। इसके बाद 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भी नोटा का इस्तेमाल किया गया। 2015 तक देश भर के सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में नोटा का इस्तेमाल शुरू हो गया। राजस्थान में 2013 के चुनाव में पांच लाख 89 हजार 923 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था। इस बार चार लाख 67 हजार 785 ने इसका उपयोग किया।

मतदाताओं का रुख?
इस बार के विधानसभा चुनावों की तरह अतीत में भी नोटा ने कई सीटों पर उलटफेर किए हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 60 लाख लोगों ने नोटा का विकल्प चुना था। बिहार विधानसभा चुनाव में नोटा को नौ लाख 47 हजार 276 वोट मिले थे, जो कुल पड़े वोट का 2.5 फीसद रहा। गुजरात विधानसभा चुनाव में चार लाख 54 हज़ार 880 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया। वडोदरा लोकसभा क्षेत्र की सीटों पर 18,053 वोट नोटा के पड़े थे। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में 8,31,835 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया। तमिलनाडु में 5,57,888 मतदाता नोटा के साथ गए।

क्या कहते हैं जानकार?
नोटा बेहतर है। हमें यह कहना चाहिए कि अगर नोटा वोटों के कुछ निश्चित फीसद को पार कर जाता है, जैसे अगर विजेता एवं पराजित उम्मीदवार के बीच मतों का अंतर नोटा के मतों से कम होता है, तो हमें दूसरी बार चुनाव कराना चाहिए। साथ ही, अगर जीता उम्मीदवार एक-तिहाई वोट जुटाने में नाकाम रहे तब भी दोबारा चुनाव हो। भारत में ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ निर्वाचन प्रणाली की उपयोगिता खत्म हो चुकी है।
-टीएस कृष्णमूर्ति, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त

कई बार देखा गया कि जनप्रतिनिधियों के आचरण से नाराज मतदाताओं ने सामूहिक रूप से वोट न देने का फैसला कर लिया। ऐसे मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने में नोटा कारगर साबित हो रहा है। इससे राजनीतिक दलों पर साफ-सुथरे और संवेदनशील उम्मीदवार चुनने का दबाव बढ़ रहा है। जब नोटा आया था तो लोगों ने इसे ‘राइट टु रिजेक्ट’ के तौर पर लिया, आज भी बहुत से लोग इसे उसी रूप में लेते हैं। हालांकि, चुनाव आयोग यह स्पष्ट कर चुका है कि नोटा राइट टु रिजेक्ट नहीं है।
– डॉ. विजय लक्ष्मी मोहंती, 2014 के नतीजों के आधार पर नोटा को लेकर शोधकर्ता, विभागीय प्रमुख, श्री श्री रविशंकर विश्वविद्यालय

नोटा को लेकर कई सवालों पर संशय बना हुआ है। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि कुल मतदाताओं में से 50 फीसद से अधिक मतदाता नोटा का इस्तेमाल कर लें तो क्या होगा? अहम सवाल यह भी है कि अगर ऐसी स्थितियां उत्पन्न हती हैं तो क्या इसका असर चुनाव नतीजों पर भी पड़ेगा?
– एन गोपालस्वामी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त

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