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जनसत्ता संवाद: ‘मृत रॉकेट’ के इस्तेमाल की गुंजाइश तलाश रहा इसरो

भारत दुनिया का ऐसा एकमात्र देश बन गया है, जिसने वैज्ञानिक तौर पर कचरा ठहराए जाने वाले रॉकेट पर शोध शुरू किया है। इसरो ने यह अनूठा शोध शुरू किया है। अंतरिक्ष में रॉकेट भेजे जाने के बाद वह मृत माने जाते हैं। एक बार उपयोग हो जाने के बाद उन्हें दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

Author December 18, 2018 4:59 AM
इसरो अध्यक्ष के सिवन (Source: Express Photo by Prem Nath Pandey)

शोध-अनुसंधान
भारत दुनिया का ऐसा एकमात्र देश बन गया है, जिसने वैज्ञानिक तौर पर कचरा ठहराए जाने वाले रॉकेट पर शोध शुरू किया है। इसरो ने यह अनूठा शोध शुरू किया है। अंतरिक्ष में रॉकेट भेजे जाने के बाद वह मृत माने जाते हैं। एक बार उपयोग हो जाने के बाद उन्हें दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसे वैज्ञानिक कचरा भी कहते हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को लगता है कि ऐसे रॉकेट (डेड रॉकेट) भी उपयोगी हो सकते हैं। इसरो एक ऐसी नई तकनीक पर काम कर रहा है, जिसमें वह अंतरिक्ष के प्रयोगों के लिए भेजे जाने वाले पीएसएलवी रॉकेट के अंतिम चरण तक का इस्तेमाल करेगा। अपन इस नए शोध और नई तकनीक का प्रदर्शन इसरो के वैज्ञानिक जनवरी में करेंगे, जब पीएसएलवी सी44 लॉन्च किया जाएगा। इसरो के अध्यक्ष के सिवन के मुताबिक, इस तकनीक के जरिए डेड रॉकेट को छह महीने के लिए जीवन दिया जाएगा। यह तकनीक कामयाब हुई तो अंतरिक्ष में नया शोध करना आसान हो जाएगा। इसी के साथ बेहद सस्ता भी, क्योंकि इसरो को इसके लिए अलग से नया रॉकेट नहीं दागना पड़ेगा।

इसरो के चेयरमैन के मुताबिक, जनवरी में प्राथमिक उपग्रह (प्राइमरी सेटेलाइट) के रूप में माइक्रोसैट को लेकर जा रहे पीएसएलवी सी44 को नई प्रणाली की मदद से जिंदा किया जाएगा। इसमें बैटरियां और सौर ऊर्जा (सोलर) पैनल लगे होंगे। पीएसएलवी से प्राइमरी सैटलाइट के अलग हो जाने के बाद भी आखिरी चरण का रॉकेट सक्रिय रहेगा। प्रयोग सफल रहने के बाद शोध छात्र और अंतरिक्ष वैज्ञानिक अपने अंतरिक्ष प्रयोगों के लिए इस रॉकेट का मुफ्त में इस्तेमाल कर सकेंगे। इसरो के पूर्व चेयरमैन और अंतरिक्ष वैज्ञानिक एएस किरण के मुताबिक अंतरिक्ष में भेजा गया रॉकेट आखिरी चरण के बाद बिना किसी नियंत्रण के पृथ्वी के उसी कक्ष (आॅर्बिट) में घूमता रहता है, जहां उसने उपग्रह को स्थापित करने के लिए छोड़ दिया। ऐसे रॉकेट को स्थायित्व देने के लिए इसके अलग खांचे (कंपार्टमेंट) में अतिरिक्त ईंधन रखना होगा। ऐसा करते समय यह भी ख्याल रखना होगा कि इसके मूल विन्यास से छेड़छाड़ न हो। उन्होंने बताया कि उपग्रह को अंतरिक्ष में छोड़ने और स्थापित करने के बाद अंतिम चरण का रॉकेट पृथ्वी के कक्ष में घूमते हुए नीचे को गिरता रहता है। अंत में वह जैसे ही धरती के वातावरण के संपर्क में आता है, जल जाता है।

उन्होंने बताया कि बैटरी और सोलर पैनल लगाकर हम इस प्रक्रिया को (रॉकेट के कक्ष में चक्कर काटने को) महीनों तक बढ़ा सकते हैं। ऐसे में जमीन पर स्थित नियंत्रण कक्ष से जोड़कर इससे फिर से संपर्क साधा जा सकता है और छात्र एवं शोधार्थी इसका इस्तेमाल अपने प्रयोगों के लिए कर सकते हैं। ऐसा हो जाने के बाद उन्हें प्रयोग के लिए अलग से छोटे एवं प्रायोगिक उपग्रह लॉन्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को लगता है कि ऐसे रॉकेट (डेड रॉकेट) भी उपयोगी हो सकते हैं। इसरो एक ऐसी नई तकनीक पर काम कर रहा है, जिसमें वह अंतरिक्ष के प्रयोगों के लिए भेजे जाने वाले पीएसएलवी रॉकेट के अंतिम चरण तक का इस्तेमाल करेगा।

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