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रवीश का पोस्ट, बोले- अर्णब की पत्रकारिता रेडियो रवांडा का उदाहरण, जिसके उद्घोषक ने भीड़ को उकसाया और लाखों लोग मारे गए

अर्णब की गिरफ्तारी के बाद रवीश कुमार ने एक फेसबुक पोस्ट में कहा कि रवांडा के रेडियो उद्घोषक ने हिंसा भड़का दी थी और लोग मारे गए। उन्होंने यह भी कहा कि अर्णब पर लगे आरोपों की जांच पूरी होनी जरूरी है।

republic TV, arnab goswami, ravish kumar, suicide case, hathras caseएनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार।(file)

रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के बाद रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में कहा है कि अगर पुलिस किसी को दंगे के झूठे आरोप में फंसा दे तो अर्णब पहले पत्रकार होंगे जो कहेंगे, ठीक है। उन्होंने रेडियो रवांडा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां के उद्घोषक ने भीड़ को उकसा दिया और लाखों लोग मारे गए थे। अर्णब ने कभी भीड़ की हिंसा में मारे गए लोगों का पक्ष नहीं लिया। पिछले चार महीने से अपने न्यूज़ चैनल में जो वो कर रहे हैं उस पर अदालतों की कई टिप्पणियां आ चुकी हैं। तब किसी मंत्री ने क्यों नहीं कहा कि कोर्ट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला कर रहा है?

रवीश कुमार ने आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले को संगीन बताते हुए कहा कि नाम आया है तो जांच होनी चाहिए। उन्होंने महाराष्ट्र पुलिस पर भी निशाना साधा और कहा कि पुलिस को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या प्रमाण होने के बावजूद केस को बंद कर दिया गया था? क्या राजनीतिक दबाव था? तभी पता चलेगा कि राजनीतिक दबाव में ही सही किसी के साथ इंसाफ हो रहा है।

रवीश कुमार ने बदले की भावना को भी जायज ठहराते हुए कहा कि क्या अर्णब ने कभी ऐसा नहीं किया? उन्होंने कहा कि जब मुझे कुछ होगा तो अर्णब एक शब्द नहीं बोलेंगे। गर पुलिस किसी को दंगों के झूठे आरोप में फंसा दे तो अर्णब गोस्वामी पहले पत्रकार होंगे जो कहेंगे कि बिल्कुल ठीक है। पुलिस पर संदेह करने वाले ही ग़लत हैं। फिर भी एक नागरिक के तौर आप भी अर्णब के केस में पुलिस के बर्ताव का सख़्त परीक्षण कीजिए ताकि सिस्टम दबाव और दोष मुक्त बन सके। इसी में सबका भला है।

मैं आज क्यों लिख रहा हूं, अर्णब की गिरफ्तारी के तुरंत बाद क्यों नहीं लिखा?
आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला संगीन है…

Posted by Ravish Kumar on Wednesday, 4 November 2020

रवीश ने डॉ. कफील की गिरफ्तारी का हवाला देते हुए कहा कि योगी आदित्यनाथ ने इस नाइंसाफी पर क्यों कुछ नहीं कहा था? उन्होंने एनडीटीवी पर पड़े छापे का जिक्र करते हुए कहा कि क्या वह प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला नहीं था? ‘जब एनडीटीवी पर छापे पड़ रहे थे और एक चैनल को डराया जा रहा था तब अर्णब का कैमरा बाहर लगा था और लिंचमैन की तरह कवर किया जा रहा था। उनके कवरेज में एक लाइन प्रेस की स्वतंत्रता पर नहीं थी। उनका रिपोर्टर डॉ रॉय के घर की दीवार फांदने का प्रयास कर रहा था। बीजेपी के मंत्री प्रवक्ता मेरा बहिष्कार करते हैं।’ उन्होंने कहा एनडीटीवी के पत्रकार अर्णब की गिरफ्तारी की निंदा कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘एक बार अर्णब हाथरस केस में योगी की पुलिस को ललकार कर देख लेते, मुख्यमंत्री योगी को ललकार कर देख लेते जिस तरह से वे मुख्यमंत्री उद्धव को ललकारते हैं तो आपको अंतर पता चल जाता कि कौन सी सरकार संविधान का पालन कर रही है।’

अर्णब गोस्वामी की जमानत पर बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में दावा किया गया कि मई 2018 में पुलिस ने गोस्वामी और ‘रिपब्लिक टीवी’ के दो वरिष्ठ अधिकारियों के बयान दर्ज किए थे और सूंपर्ण जांच के बाद ही मामला बंद किया गया था। याचिका में कहा, ‘याचिकाकर्ता ने उस समय मृतक की कम्पनी के साथ व्यापारिक लेनदेन के सभी दस्तावेज मुहैया कराए थे और मामले में पूरा सहयोग किया था।’ उसने यह भी कहा कि गोस्वामी की कम्पनी ‘एआरजी आउटलियर प्राइवेट लिमिटेड’ ने अन्वय नाइक की कम्पनी ‘कॉनकॉर्ड डिजाइन्स’ को अनुबंध के तहत बकाया राशि का 90 प्रतिशत भुगतान कर दिया था। याचिका में कहा, ‘जुलाई 2019 में, नाइक की कम्पनी के खाते में पूरी बकाया राशि जमा करा दी गई थी, लेकिन खाते के निष्क्रिय होने की वजह से वह राशि हमारे खाते में वापस आ गई।’ उसने कहा कि याचिकाकर्ता ने पूर्व में पुलिस के साथ पूरा सहयोग किया और आगे भी करते रहेंगे।

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