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“सामने से गुज़रते इंसान को सड़क पार करने दो, कोई ज़िंदा चलता हुआ नज़र आया है”, वेंटिलेटर पर रवीश का पोस्ट, लोग बोले- लगता है सिस्टम ही वेंटिलेटर पर है

रवीश ने लिखा कि ऐसा लगा कि हम शहर में श्मशान में चल रहे हैं। कभी किसी इंसान को सड़क पार करते देख कर उसे देर तक देखने का मन करने लगा। कोई ज़िंदा चलता हुआ नज़र आया है। सामने से गुज़रते उस इंसान को आराम से सड़क पार करने दिया।

रवीश कुमार ने वेंटिलेटर पर एक फेसबुक पोस्ट लिखा है। (Express photo)

देश में कोरोना वायरस का संक्रमण बहुत तेजी से फैल रहा है। रोजाना यहां लाखों की संख्या में लोग संक्रमित पाये जा रहे हैं वहीं हजारों की संख्या में मौतें हो रही है। अस्पतालों में दवा, ऑक्सिजन, वेंटिलेटर और बिस्तर की कमी है। इसको लेकर वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने एक फ़ेसबुक पोस्ट डाला है। इसमें रवीश ने लिखा है कि ऐसा लगा कि हम शहर में नहीं श्मशान में चल रहे हैं।

इसपर यूजर्स के भी कोमेंट्स आ रहे हैं। एक यूजर ने लिखा “लगता है सिस्टम ही वेंटिलेटर पर है।” संतोष नाम के एक यूजर ने लिखा “वाकई लगता है कि वर्तमान मे पूरा देश ही वेंटीलेटर पर नजर आ रहा और सब की मनोदशाएं भी। जिधर भी और जहां तक नजरे पहुंच जाती हैं चारो ओर यही मंजर…बहुत कुछ टूटा हुआ,बिखरा हुआ,घोर अशांति फिर एक अजनबी और रहस्य से भरी खामोशी….! एक ने लिखा “भावनाओं का सैलाब सा उमड़ पड़ा। इतना सरल शब्दों में दिल की गहराइयों को व्यक्त करना आसान नहीं है। एक प्रवाह जो हमें हमसे और सच्चाई से रूबरू करा गया। एक दस्तावेज बन गया। सैल्यूट रवीश कुमार को। अभिव्यक्ति के शहंशाह।”

रवीश ने अपने पोस्ट में लिखा “अस्पताल से फोन आया था। सुनने वाले की आवाज़ से आहट मिल गई। इस पल को न जाने हम कितने दिनों से नकार रहे थे। हर सांस के साथ एक उम्मीद और चलने लगती थी। हम कार में बैठ गए। पता नहीं चला कि वहां पहुंचने का सही रास्ता क्या है। सड़क पर बहुत कम कारें चल रही थीं। उन कारों की रफ़्तार धीमी लग रही थी जबकि वे तेज़ चल रही होंगी। ऐसा लगा कि अगल-बगल से गुज़रती कारों ने सर झुका लिया हो। कारों ने कार होने का अहंकार त्याग दिया था। क्या उस वक्त चल रही सारी कारें किसी अस्पताल से लौट रही थीं या अस्पताल की तरफ भाग रही थीं? शहर बेआवाज़ लगने लगा।”

रवीश ने लिखा कि ऐसा लगा कि हम शहर में श्मशान में चल रहे हैं। कभी किसी इंसान को सड़क पार करते देख कर उसे देर तक देखने का मन करने लगा। कोई ज़िंदा चलता हुआ नज़र आया है। सामने से गुज़रते उस इंसान को आराम से सड़क पार करने दिया। पीछे कोई कार भी नहीं थी जो हार्न बजाकर मुझ पर गुस्सा करती। हम रास्ते भूलते जा रहे थे। भटकते जा रहे थे। जबकि गूगल मैप वाली बता तो रही थी कि कैसे जाना है। उसके संकेतों को समझने में कई बार गलती हुई। ऐसी ही एक पतली सी सड़क पर पहुंच गए। वहां फल-सब्ज़ी का साप्ताहिक बाज़ार लग रहा था। बीच सड़क पर एक शख़्स अपनी विशालकाय बीएमडब्ल्यू लगाकर खरबूज खा रहा था। उसके खरबूज खाने तक हमें रुकना पड़ा। हार्न बजाने का मन नहीं किया।

हम अस्पताल जाना चाहते थे मगर पहुंचना नहीं चाहते थे। थोड़ी देर बाद हम सही रास्ते पर थे। गूगल मैप की आंटी ने बताया। लेकिन जहां जा रहे थे और जिसके लिए जा रहे थे उसने अपना रास्ता कुछ और चुन लिया था। चिकित्सा की दुनिया के एक शिक्षक की बात याद आने लगी। डॉक्टर को सेकेंड क्लास डॉक्टर नहीं होना चाहिए। पर वहां के डॉक्टरों ने एक बिगड़े हुए केस को संभालने की बहुत कोशिश की। शायद और कर सकते थे लेकिन यह छूट उन्हें हासिल है। हमें इस भरोसे के साथ जीना है कि की होगी। इस वक्त मैं उस डॉक्टर के गुस्से के बारे में भी सोच रहा हूँ। उनका भड़कना याद रहेगा। यह भी याद रहेगा कि उन्होंने इसकी परवाह नहीं की कि अपनी मां के बारे में इधर उधर प्रयास करते हुए एक छोटे से बच्चे ने कुछ डॉक्टरों से बात ही कर ली तो क्या गुनाह कर दिया। आखिर वो बच्चा ही था। वह बच्चा किसी भी पल अपनी मां को खो रहा था।एक डॉक्टर के गुस्से से वह बच्चा बिखर गया था इसलिए भाग कर अस्पताल गया।

इंजीनियरिंग के चौथे वर्ष में पढ़ता है। अगर अपने दोस्तों से पूछ ही लिया कि मां को बचा लो। और उसके दोस्त ने अपने डाक्टर पिता से कह ही दिया कि आप कुछ कीजिए। उस डाक्टर ने कह ही दिया कि ठीक है मेरी उन डाक्टर से बात करा दो। तो यह कौन सा गुनाह था उस बच्चे का। क्या डॉक्टर यह बात नहीं जानते। फिर भी हाथ मैंने ही जोड़ा। किसी को फोन कर कहा कि कहिएगा कि इस गुस्से के असर में न रहें। मैं माफी मांगता हूं।

परिवार के लोग सहमे हुए थे कि कहीं ग़ुस्से में डाक्टर आख़िरी वक़्त में कोशिश न छोड़ दें। मैंने ही दिलासा दिलाया कि ऐसा कोई नहीं करेगा। दूसरी तरफ़ मरीज़ की अपनी हालत भी नियंत्रण से बाहर जा रही थी। हम यह भी समझ रहे थे। हमें अपने को खोना भी था और हमें ही सब कुछ समझना भी था। हमारे हिस्से में रोना तो दूसरे दर्जे की सूची में आया है। ख़ैर इसी के साथ यह भी याद रहेगा कि उसी डॉक्टर ने कोशिश अच्छी की। हम मरीज़ों को कोशिश से ही संतोष करना होता है। हमारे एक डॉक्टर मित्र ने कहा कि मेडिकल साइंस के भीतर की सड़न देखनी चाहिए।

कई मेडिक कालेजों में मेडिकल साइंस पढ़ाने वाले टीचर नहीं है। वहां कोई पढ़ाने नहीं जाता। वहां न वेतन है न पेंशन है। सही बात है कि कोई डाक्टर कैसे जाए। वह बीमार पड़ गया तो कौन इलाज कराएगा। सिर्फ़ इतना ही नहीं है, इसके अलावा बहुत कुछ है जिससे सड़न को समझा जा सकता है। फिर भी इस वक्त में हमें डाक्टरों की परेशानी को समझना चाहिए ।एक दोस्त ने बताया कि डॉक्टर टूट गए हैं। उसके अस्पताल में एक माहिर डॉक्टर फूट-फूट कर रोने लगे। सबके बीच। यह सुनकर उस डाक्टर के प्रति सम्मान बढ़ गया। उनका रोना कितना ज़रूरी है। एक डाक्टर जब अपने मरीज़ की नाड़ी चेक कर रहा था तभी उसके फ़ोन पर ख़बर आई कि उसके पिता गुज़र गए हैं। बहुत से डॉक्टर जान लगाकर काम कर रहे हैं। यह भी सच है कि कई सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में मरीज़ के पास कोई नहीं जा रहा। ऐसा मरीज़ के परिजन ही बताते हैं।

यह हमारे समय का एक क्रूर सत्य है। बहरहाल, हम उस अस्पताल से लौटने लगे। जिस रास्ते पर चमचमाती गाड़ियां दौड़ा करती थीं वो ख़ाली थी। लग रहा था एक्सप्रेस वे भी वेंटिलेटर पर है। सारा शहर वेंटिलेटर पर है। श्मशान ही एक जगह है जो वेंटिलेटर पर नहीं है। वहां के मैनेजर ने फ़ोन पर कहा कि हम तो आपके फैन हैं। आप वही हैं न। आप जब कहेंगे व्यवस्था कर देंगे। कोई दिक्कत नहीं होगी। यह उसका प्यार रहा होगा और मैं उसी उदारता के साथ उसके प्यार को स्वीकार कर रहा हूँ और यहाँ दर्ज कर रहा हूं। कम से कम उसने डांटा नहीं। चिल्लाया नहीं। मुझे लगा वह शख्स श्मशान में होकर भी ज़िंदा है। वेंटिलेटर पर नहीं है।

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