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चौथा रामनाथ गोयनका स्मारक व्याख्यान: विदेश नीति में लीक का हठ ठीक नहींः एस. जयशंकर

विदेश मंत्री ने कहा, ‘अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का ढांचा बदलाव के दौर से गुजर रहा है।’ इस संदर्भ में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रवाद, चीन के उदय, ब्रग्जिट के घटनाक्रम और विश्व अर्थव्यवस्था के संतुलन की कवायद को बदलावों के नाटकीय उदाहरण के रूप में गिनाए।

Author नई दिल्ली | Updated: November 15, 2019 12:47 PM
चौथा रामनाथ गोयनका स्मारक व्याख्यान देते विदेश मंत्री एस जयशंकर। (फोटोः नीरज प्रियदर्शी)

ऐसे में जब विश्व मंच पर भारत खुद को दृढ़तापूर्वक सामने ला रहा है, घिसी-पिटी लीक तक उसकी विदेश नीति को सीमित नहीं रखा जा सकता और तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था में चुस्त होने की जरूरत है। यह कहना है विदेश मंत्री एस जयशंकर का।

गुरुवार को ‘बियांड द डेल्ही डॉग्मा : इंडियन फॉरेन पॉलिसी इन अ चेंजिंग वर्ल्ड’ विषय पर चौथे रामनाथ गोयनका स्मारक व्याख्यान देते हुए जयशंकर ने कहा, ‘अब हम बदलाव के मुहाने पर हैं। अधिक आत्मविश्वास के साथ अलग लक्ष्यों का पीछा करने और विरोधाभासों को साधने के प्रयास किए जा रहे हैं।

महत्वाकांक्षाओं को साकार करने के लिए जोखिम लेना ही होगा।’ उन्होंने कहा कि एक देश जो एक दिन नेतृत्व करने वाला ताकत बनना चाहता है, वह अपने सीमा विवाद सुझाए बगैर, अनपेक्षित क्षेत्रों और गैर-इस्तेमाल मौकों का इस्तेमाल किए बगैर नहीं छोड़ सकता। और सबसे अहम यह कि बदलती विश्व व्यवस्था में लीक पर डटे रहने की हठधर्मिता नहीं चल सकती।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अरसे से चले आ रहे विश्वासों का अब कोई मतलब नहीं। जयशंकर ने कहा कि बदलती विश्व व्यवस्था में हमें उसके मुताबिक सोचने, बात करने और अमल करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अतीत को लेकर चलने से भविष्य के लिए कोई फायदा नहीं होगा।

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विदेश मंत्री ने कहा, ‘अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का ढांचा बदलाव के दौर से गुजर रहा है।’ इस संदर्भ में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रवाद, चीन के उदय, ब्रग्जिट के घटनाक्रम और विश्व अर्थव्यवस्था के संतुलन की कवायद को बदलावों के नाटकीय उदाहरण के रूप में गिनाए। उन्होंने कहा कि ताकत और राष्ट्रीय अवधारणा के परिचय भी अब वैसे नहीं रहे- ‘तकनीक, संपर्क और कारोबार अब नए तत्व हो गए हैं।’

जयशंकर ने कहा, ‘बहुध्रुववाद के कमजोर होने से विश्व का जनमानस वाद-विवाद में है।’ उन्होंने कहा, ‘भारत के विकास में वास्तविक रोड़ा वैश्विक कारण नहीं, बल्कि दिल्ली की लीक पर डटे रहने की हठधर्मिता है।’

उन्होंने कहा, ‘सबूत इस बात की गवाही देते है कि भारत ने जब भी समकालीन वैश्विक राजनीति का मजबूती से आकलन किया है, अपने लाभ को ध्यान में रखकर कदम बढ़ाए हैं। और बिना झिझके अपने अतीत की दीवार को तोड़ा। 1971 का बांग्लादेश युद्ध, 1992 के आर्थिक और राजनीतिक दलाव, 1998 के परमाणु परीक्षण और 2005 के भारत-अमेरिकी परमाणु करार का उदाहरण सामने है। यह सच है कि हिचकोलों के कई दौर झेलने के बाद भारत ने अपने पक्ष में निर्णयात्मक बदलाव करने में सफलता पाई।’

उन्होंने कहा, ‘1991 तक वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का आकलन करने में चूक का असर बाद की नीतियों पर पड़ा। दो दशक तक परमाणु असमंजस नाटकीय रूप से 1998 में खत्म हुआ। 26/11 का जवाब देने में हुई खामी उड़ी और बालाकोट से एकदम उलट रही। घटनाक्रम हो या दौर, उनके सबक की समीक्षा होती है।’

जयशंकर ने कहा, ‘यह तथ्य है कि आजादी के सात दशक के बाद भी हमारे कई सीमा विवाद अनसुलझे पड़े हैं। अपने अतीत से खुद की तुलना करें तो अर्थव्यवस्था के लिहाज से हम बेहतर दिखते हैं, लेकिन चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया की तुलना में थोड़ी अलग तसवीर बनती है। भारत को नीति में ज्यादा यथार्थवादी होने की जरूरत है। पाकिस्तान के इरादों को भांपने में शुरू में हुई गफलत शायद अनुभवहीनता का नतीजा रही। एक दशक के बाद भी सीमाओं को सुरक्षित करने में बेपरवाही को उचित ठहराना मुश्किल है।’

उन्होंने कहा कि भारत ने खुद की छवि एक अनिच्छुक ताकत के रूप में बनाई। लेकिन वह अपनी ही रिवायतों में उलझा रहा। उन्होंने कहा कि यही वह कारण रहा जिससे भारत ने सुरक्षा हालात को लेकर मिशन के अंदाज में काम नहीं किया जैसा काम हमारे कई प्रत‍िद्वंद्व‍ियों ने दिखाया। 1962 की लड़ाई के दौरान सेना से पर्याप्त परामर्श करने में मजबूती नहीं दिखी। उस दौर की तुलना में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद सृजित करने का फैसला अलग तरह की मानसिकता को दर्शाता है।

पाकिस्तान को लेकर उन्होंने कहा कि सच्चाई यह है कि बातचीत के मुद्दे पर आतंकवाद के खात्मे की शर्त को जोड़ने में हमें काफी समय लग गया। अर्थव्यवस्था और कूटनीति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था से कूटनीति संचालित होती है। उसका उलट नहीं हो सकता। भारत के लारा आरसीईपी पर दस्तखत नहीं करने को लेकर जयशंकर ने कहा कि चीन ने एफटीए के बगैर एक विशेष कारोबार चुनौती सामने रख दी। आरसीईपी पर बहस न सिर्फ विदेश नीति बल्कि कारोबार जगत के लिए भी सबक है।

उन्होंने रेखांकित किया, ‘बैंकाक में हमें स्पष्ट तौर पर नए समझौते से होने वाले हानि लाभ हमें समझ में आ गए। हमने आखिर तक सौदेबाजी की और हमें ऐसा करना भी चाहिए था। और तब, क्या ऑफर था, यह जानकर हम पीछे हट गए। इस समय खराब समझौते से बेहतर है कि समझौता नहीं किया जाए। यह भी समझना जरूरी है कि आरसीईपी फैसला क्या नहीं है। यह उस एक्ट ईस्ट नीति से पीछा हटना नहीं है, जो हमारे प्राचीन और समकालीन इतिहास में गहरे पैठी हुई है। हमारा आपसी सहयोग इतने आयामों में फैला हुआ है कि इससे आधार की अनदेखी नहीं होती।

कारोबार में भी, भारत के आरसीईपी के 15 में से 12 भागीदारों के साथ एफटीए हैं। इसका हमारे हिंद-प्रशांत सोच से भी कोई लेना-देना नहीं है, और यह आरसीईपी सदस्यता के भी आगे की चीज है। आरसीईपी या किसी अन्य एफटीए में शामिल होने को लेकर सार्थक बहस हो सकती है। वृहद रणनीति के लिए इससे भ्रमित नहीं होना है।’

जून में जयशंकर की नियुक्ति किसी विदेश सचिव को विदेश मंत्री बनाए जाने का पहला उदाहरण रहा।

द एक्सप्रेस ग्रुप ने अपने संस्थापक के निधन के 25 साल होने पर 2016 में रामनाथ गोयनका स्मारक व्याख्यान शुरू किया। प्रथम तीन आरएनजी स्मारक व्याख्यान क्रमश : रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन, भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और भारत के मौजूदा प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने दिए।

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