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संस्कृति: लीला अपरंपार

देशभर में रामलीलाओं की परंपरा करीब पांच सौ साल पुरानी है। आस्था और संवेदनाओं के संकट के दौर में अगर भारत आज भी ईश्वर की लीलाभूमि है तो यह यहां के लोकमानस को समझने का नया विमर्श बिंदु भी हो सकता है।

Author Updated: October 29, 2020 12:19 AM
आस्थावनयात्रा पर जा रहे भगवान राम, लक्ष्मण और सीता के सरयू नदी पर पांव पखारता केवट।

प्रेम प्रकाश

जिस कोरोना संकट की शिनाख्त शुरू में ही तात्विक विचारकों ने सेहत से आगे सभ्यता संकट के तौर पर कर ली, वह संकट आज भारत में विचार और प्रतीति के कई दिलचस्प साक्ष्य गढ़ रहा है। इन साक्ष्यों में जहां एक तरफ हमारी सामाजिक चेतना, संवेदना और विकास के चमकदार दावों की असलियत खुल रही है, वहीं यह भी दिख रहा है कि समाज और संस्कृति की देशज निर्मिति से इस देश का लोकमानस आज भी बाहर आने को तैयार नहीं। इसका सबसे बड़ा कारण वह लोक-रागात्मकता है, जहां परंपरा और आस्था के साथ हम अपनी जातीय शिनाख्त को सर्वाधिक महफूज देखते हैं। इस लिहाज से रामलीला की चर्चा करें तो कोरोना संकट के कारण इस बार इनके आयोजनों की पुरानी धज गायब दिखी। लीला मंचन के जो कुछ आयोजन हुए भी वे अत्यंत संक्षिप्त और एक तरह से परंपरा निर्वाह की तरह रहे। पर इस कारण अगर कोई आगे बढ़कर एक सुदीर्घ और सजल लोक परंपरा के लोप होने का खतरा रेखांकित करना चाहे, तो निराशा ही हाथ लगेगी।

भारत आज भी ईश्वर की लीलाभूमि है। यहां आस्था और परंपरा की दो समानांतर और स्वतंत्र धाराएं हैं। एक तरफ मर्यादा पुरुषोत्तम की छवि है, तो दूसरी तरफ लीला पुरुषोत्तम की। राम और कृष्ण काव्य के जानकार इस अंतर को जीवन के दो रंग के तौर पर देखते हैं। मर्यादा की ऊंचाई और व्यवहार के धरातल के बीच का अंतर ही जीवन सत्य है। इस सत्य से मुठभेड़ कभी कबीर जैसे फकीर ने की तो कभी गांधी जैसे महात्मा ने। हर बार निचोड़ यही निकला कि साध्य और साधन के एका के साथ जीवन की सीध जब तक तय होती रहेगी तब तक वह कल्याणकारी ही रहेगी। यही नहीं, प्रेम और शृंगार का लालित्य जीवन को सौरभ से भर देने के लिए तो जरूरी है पर यह दरकार तभी तक जीवन गीत के प्रेरक शब्द बन सकते हैं, जब तक यह दैहिकता की आग से बची रहे।

सांवले रंग के दो ईश्वर रूपों को हमारी आस्था और परंपरा के बीच इसलिए बड़ी जगह मिली है क्योंकि इन्हें हम दो जीवनशैलियों के रूप में देखते हैं। एक तरफ आरोहण और दूसरी तरफ अवगाहन। एक ही जीवन को जीने के दो भरपूर। पर इस समानांतरता को समाप्त करने का मतलब जीवन के अद्वैत को द्वैत में बदलना है। लोक प्रतीकों को तोड़ना उतना ही कठिन है, जितना उसे गढ़ना। न तो आस्था में डूबे किसी लोक प्रतीक को आप रातोंरात गढ़ सकते हैं और न उसे तोड़ सकते हैं।

बदलाव और आशंका
अखबारों-टीवी चैनलों में पिछले साल तक खबर आ रही थी कि ‘हाईटेक’ होता जा रहा है रामलीलाओं का मंचन। इस बार हाईटेक की जगह ‘डिजिटल’ शब्द चलन में रहा। हालांकि इसका कारण कोरोना संकट है जिसके कारण लीला कमेटियां रामलीला का डिजिटल प्रसारण करने को बाध्य रहीं। सवाल यह कि बदलाव के भड़कीले दावे क्या रामलीला की पारंपरिक भारतीय धज को पूरी तरह बदलकर रख देंगे? दिलचस्प है कि यह आशंका भारतीय चित्त-मानस और काल के अध्येताओं की नजर में आज भी बड़ी चिंता नहीं है। कह सकते हैं कि कहीं राई को पहाड़ कहकर बेचने वाले सौदागर भले अपने मुनाफे के खेल के लिए कुछ खिलवाड़ के लिए आमादा हों, पर अब भी उनकी ताकत इतनी नहीं बढ़ी है कि हम सब कुछ खोने का रुदन शुरू कर दें। देशभर में रामलीलाओं की परंपरा करीब पांच सौ साल पुरानी है। आस्था और संवेदनाओं के संकट के दौर में अगर भारत आज भी ईश्वर की लीलाभूमि है तो यह यहां के लोकमानस को समझने का नया विमर्श बिंदु भी हो सकता है।

लोक की लीक
दरअसल, बाजार और प्रचारात्मक मीडिया के प्रभाव में चमकीली घटनाएं उभरकर जल्दी सामने आ जाती हैं। पर इसका यह कतई मतलब नहीं कि चीजें जड़मूल से बदल रही हैं। मसलन, बनारस के रामनगर में तो तकरीबन दो सौ सालों से रामलीला खेली जा रही है। दिलचस्प है कि यहां खेली जानेवाली लीला में लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल नहीं होता है। यहां तक कि लीला की सादगी और उससे जुड़ी आस्था को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए रोशनी के लिए बिजली का इस्तेमाल भी नहीं किया जाता। खुले मैदान में यहां-वहां बने लीला स्थल और इसके साथ दशकों से जुड़ी लीला भक्तों की आस्था की ख्याति पूरी दुनिया में है।

‘दिल्ली जैसे महानगरों और चैनल संस्कृति के प्रभाव में देश के कुछ हिस्सों में रामलीलाओं के रूप पिछले दो दशकों में इलेक्ट्रॉनिक साजो-सामान और प्रायोजकीय हितों के मुताबिक भले बदल रहे हैं। पर देश भर में होने वाली ज्यादातर लीलाओं ने अपने पारंपरिक बाने को आज भी कमोबेश बनाए रखा है’, यह मानना है देश-विदेश की रामलीलाओं पर गहन शोध करने वाली डॉ. इंदुजा अवस्थी का।

लोक और परंपरा के साथ गलबहियां खेलती भारतीय संस्कृति की बहुलता और अक्षुण्णता का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है कि चाहे बनारस के रामनगर, चित्रकूट, अस्सी या काल-भैरव की रामलीलाएं हों या फिर भरतपुर और मथुरा की, राम-सीता और लक्ष्मण के साथ दशरथ, कौशल्या, उर्मिला, जनक, भरत, रावण व हनुमान जैसे पात्र के अभिनय 10-14 साल के किशोर ही करते हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अब कस्बाई इलाकों में पेशेवर मंडलियां उतरने लगी हैं, जो मंच पर अभिनेत्रियों के साथ तड़क-भड़क वाले पारसी थिएटर के अंदाज को उतार रहे हैं। पर इन सबके बीच अगर रामलीला देश का सबसे बड़ा लोकानुष्ठान है तो इसके पीछे एक बड़ा कारण रामकथा का अलग स्वरूप है।

अवस्थी बताती हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम और लीला पुरुषोत्तम कृष्ण की लीला प्रस्तुति में बारीक मौलिक भेद है। रासलीलाओं में शृंगार के साथ हल्की-फुल्की चुहलबाजी भले परोसी जाए पर रामलीला में ऐसी कोई गुंजाइश निकालनी मुश्किल है। शायद ऐसा दो ईश्वर रूपों में भेद के कारण ही है। पुष्प वाटिका, कैकेयी-मंथरा और रावण-अंगद या रावण-हनुमान आदि प्रसंगों में भले थोड़ा हास्य होता है, पर इसके अलावा पूरी कथा के अनुशासन को बदलना आसान नहीं है।

सांस्कृतिक बहुरंगता
भाषा और संवाद की दृष्टि से भी रामलीला भारतीय सांस्कृतिक बहुरंगता की वाहक परंपरा रही है। तुलसी ने लोकमानस में अवधी के माध्यम से रामकथा को स्वीकृति दिलाई और आज भी इसका ठेठ रंग लोकभाषाओं में ही दिखता है। मिथिला में रामलीला के बोल मैथिली में फूटते हैं तो भरतपुर में राजस्थानी की बजाय ब्रजभाषा की मिठास घुली है। बनारस की रामलीलाओं में वहां की भोजपुरी और बनारसी का असर दिखता है पर यहां अवधी का साथ भी बना हुआ है। बात मथुरा की रामलीला की करें तो इसकी खासियत पात्रों की शानदार सज-धज है।

कृष्णभूमि की रामलीला में राम और सीता के साथ बाकी पात्रों के सिर मुकुट से लेकर पग-पैजनियां तक असली सोने-चांदी के होते हैं। मुकुट, करधनी और बांहों पर सजने वाले आभूषणों में तो हीरे के नग तक जड़े होते हैं। और यह सब संभव हो पाता है यहां के सोनारों और व्यापारियों की रामभक्तिके कारण। आभूषणों और मंच की साज-सज्जा के होने वाले लाखों के खर्च के बावजूद लीला का रूप आज भी कमोबेश पारंपरिक ही है। मानो सोने की थाल में माटी के दीये जगमग कर रहे हों।

अंतिम तौर पर कहना हो तो कहेंगे कि आज जबकि परंपराओं से भिड़ने की तमीज रिस-रिसकर समाज के हर हिस्से में पहुंच रही है, ऐसे में रामलीलाओं की विकास यात्रा के पीछे आज भी लोक और परंपरा का ही मेल है। राम कथा के साथ इसे भारतीय आस्था के शीर्ष पुरुष का गुण प्रसाद ही कहेंगे कि पूरे भारत के अलावा सूरीनाम, मॉरिशस, इंडोनेशिया, म्यांमा और थाईलैंड जैसे देशों में रामलीला की स्वायत्त परंपरा है। यह न सिर्फ हमारी सांस्कृतिक उपलब्धि की मिसाल है, बल्कि इसमें मानवीय भविष्य की कई मांगलिक संभावनाएं भी छिपी हैं।

भारतीय संस्कृति और लोकआस्था के शीर्षपुरुष
राम कथा भारतीय परंपरा में एक कृति से आगे सांस्कृतिक स्वीकृति का नाम है। दिलचस्प यह कि एक तरफ जहां कबीर के राम निर्गुन हैं, वहीं सगुन भक्ति परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास ने राम कथा का लोकमानस रचा। अलबत्ता भक्ति और आस्था की इस विरासत में रद्दोबदल भी कम नहीं हुए हैं। रामायण और रामकथा के एक हजार से अधिक ग्रंथों का पता अध्येताओं ने लगाया है। तिब्बती और खोतानी से लेकर सिंहली और फारसी तक में रामायण लिखी गई है। 1800 ई. के करीब मुल्ला मसीह फारसी के करीब 5000 छंदों में रामायण को छंदबद्ध करते हैं तो इसी दौरान राम कथा में कई क्षेपक भी जोड़ दिए जाते हैं। इन सबसे राम कथा को लेकर कई तरह के विवाद और विरोधाभासी पक्ष भी समय-समय पर खड़े होते रहे हैं। अच्छी और संतोषजनक बात यह है कि आज भी इन सबके बीच आस्था और श्रद्धा के केंद्र में जो राम हैं, वे मर्यादित तो हैं ही, भारतीय लोक आस्था के शीर्षपुरुष भी हैं।

भंसाली की लीला
मलीला की परंपरा की मजबूती यह दिखाती है कि राम की मर्यादा से मुठभेड़ एक तरफ तो मुश्किल है, वहीं यह खासा खतरनाक भी है। लिहाजा इस छवि से छेड़छाड़ मर्यादित भी नहीं कही जाएगी, एक कमअक्ल हिमाकत भले इसे कह लें। संजय लीला भंसाली ने ऐसी ही हिमाकत की। उनकी फिल्म ‘राम-लीला’ में गांव की लड़कियों से अपनी मर्दानगी के बारे में पूछने का मशविरा देने वाला नायक किसी टोले-मोहल्ले का टपोरी लगता है। पर पटकथा ऐसी लिखी गई है जैसे रामलीला का नया नाटकीय भाष्य चल रहा हो। पता नहीं भंसाली को क्या सूझी कि उन्होंने रोमियो को राम बनाना चाहा और सीता को जुलियट। यह कोई साहसिक उड़ान नहीं बल्कि सीधे-सीधे रचनात्मक दगाबाजी थी।

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