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रामचंद्र गुहा का ब्‍लॉग: अंबेडकर की तारीफ के साथ-साथ गोलवलकर और हेडगेवार की भी निंदा करेंगे मोहन भागवत?

बीते छह दिसंबर को गोवा के एक कार्यक्रम में बोलते हुए राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भीमराव अंबेडकर की तुलना अपने संगठन के संस्‍थापक हेडगेवार से की।

आरएसएस चीफ मोहन भागवत (FILE PHOTO/PTI)

बीते छह दिसंबर को गोवा के एक कार्यक्रम में बोलते हुए राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भीमराव अंबेडकर की तुलना अपने संगठन के संस्‍थापक हेडगेवार से की। भागवत ने अंबेडकर को एक महान शख्‍स बताया, जिसने हजारों लोगों को गुलामी की बेडि़यों से आजाद कराया। भागवत ने कहा, ”अंबेडकर की तरह ही हेडगेवार ने भी निस्‍वार्थ भाव से देश की भलाई के लिए काम किया।” ऐसा पहली बार नहीं है, जब आरएसएस चीफ ने अंबेडकर की तारीफ की है। विजयादशमी पर दिए गए अपने भाषण में भी वे ऐसा कर चुके हैं। इस दौरान, पीएम नरेंद्र मोदी, होम मिनिस्‍टर समेत केंद्र सरकार के कई बड़े बीजेपी नेताओं ने संसद के अंदर और बाहर भागवत की दिल खोलकर तारीफ की है।

अंबेडकर की महानता को लेकर संघ परिवार का यह कबूलनामा काफी देर से आया है। इसमें ढोंग भी नजर आता है। आरएसएस और इससे जुड़े अन्‍य संगठन पूरी जिंदगी अंबेडकर के कट्टर विरोधी रहे। 1949 से 1951 के बीच आरएसएस का यह विरोध काफी मुखर रहा। यह वो वक्‍त था, जब अंबेडकर बतौर कानून मंत्री हिंदू पर्सनल लॉ में बदलाव लाना चाहते थे। इससे हिंदू महिलाओं को जाति के बाहर शादी करने, जुल्‍म करने वाले पति को तलाक देने और संपत्‍त‍ि पाने का अधिकार मिल जाता। कुछ महिलावादी विद्वानों ने तर्क दिया कि इन बदलावों से पुरुषों और महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने की मुहिम ज्‍यादा आगे तक नहीं जा पाएगी। हालांकि, हिंदू कट्टरपंथी इससे कहीं आगे निकल गए। एक एंटी हिंदू कोड कमेटी बनाई गई। इसके सदस्‍यों में द्वारका के शंकराचार्य भी शामिल थे। कमेटी ने अंबेडकर के बिल के खिलाफ फरमान जारी किया। इन्‍होंने कहा कि अंबेडकर का बिल शास्‍त्रों को चुनौती देता है। इस आंदोलन में आरएसएस की खुद की भूमिका के बारे में मेरी किताब इंडिया आफ्टर गांधी में जिक्र किया गया है।

किताब में लिखा है, ”एंटी हिंदू कोड बिल कमेटी में पूरे देश में सैकड़ों मीटिंग की। इनमें विभिन्‍न स्‍वामियों ने प्रस्‍तावित कानून का विरोध किया। इस आंदोलन में शामिल लोगों ने खुद को धर्मवीर बताया, जो धर्मयुद्ध लड़ रहे थे। राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ ने इस आंदोलन को समर्थन दिया। 11 दिसंबर 1949 को दिल्‍ली के रामलीला ग्राउंड पर आरएसएस ने एक जनसभा रखी। यहां कई वक्‍ताओं ने बारी बारी से अंबेडकर के बिल की आलोचना की। एक ने तो इसे हिंदू समाज पर एटम बम करार दिया। अगले दिन, कुछ आरएसएस वर्करों ने असेंबली की इमारतों के सामने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने पीएम और डॉक्‍टर अंबेडकर के पुतले जलाए। इसके अलावा, शेख अब्‍दुल्‍ला की कार तोड़ डाली।” मैंने अपने किताब का जिक्र सिर्फ यह बताने के लिए किया है कि आरएसएस का अंबेडकर के प्रति वैर भाव इतिहास में दर्ज है। या तो भागवत को इतिहास के बारे में नहीं पता या फिर वे अपने साथी भारतीयों के इतिहास का समुचित जानकार न होने का फायदा उठा रहे हैं।

संघ ने गांधी की तरह ही अंबेडकर की भी मृत्‍युपरांत तारीफ की। गांधी, जिनका संघ हमेशा विरोध करता रहा। आरएसएस की स्‍थापना 1925 में हुई थी। इसके बाद से कई साल तक इस संगठन ने गांधी और राष्‍ट्रीय आंदोलन से दूरी बनाए रखी। आरएसएस ने न तो नमक सत्‍याग्रह में हिस्‍सा लिया और न ही भारत छोड़ा आंदोलन में। 194 7 तक गांधी से यह दूरी पूरी तरह कटुता और वैर में बदल गया। आरएसएस ने गांधी पर मुस्‍ल‍िम तुष्‍ट‍िकरण का आरोप लगाया। उनके मुताबिक, गांधी को विभाजन के लिए राजी नहीं होना चाहिए था। 8 दिसंबर 1947 को आरएसएस ने अपने कार्यकर्ताओं की दिल्‍ली में मीटिंग रखी। एक प्रत्‍यक्षदर्शी के मुतबिक, आरएसएस के सरसंघचालक एम एस गोलवलकर ने कथित तौर कहा, ”संघ तब तक आराम नहीं करेगा, जब तक यह पाकिस्‍तान को खत्‍म नहीं कर लेता। अगर कोई हमारे रास्‍ते में आएगा तो हमें उसे भी खत्‍म करना ही होगा। फि‍र चाहे वे नेहरू सरकार हो या कोई दूसरी सरकार। मुसलमानों का जिक्र करते हुए उन्‍होंने कथित तौर पर कहा कि दुनिया की कोई ताकत उन लोगों को हिंदुस्‍तान में रहने में मदद नहीं कर सकती। उन्‍होंने यह देश छोड़ना ही होगा। महात्‍मा गांधी मुसलमानों को भारत में इसलिए रखना चाहते हैं ताकि कांग्रेस को चुनावों के वक्‍त फायदा हो। लेकिन उस समय तक एक भी मुसलमान भारत में नहीं रहेगा। अगर उन्‍हें यहां रहने दिया गया तो जिम्‍मेदारी सरकार की होगी, हिंदू समुदाय का इसमें कोई दोष नहीं होगा। महात्‍मा गांधी ज्‍यादा वक्‍त तक उन्‍हें बहका नहीं पाएंगे। हमारे पास ऐसे तरीके हैं, जिनसे ऐसे लोगों को तत्‍काल चुप कराया जा सकता है। लेकिन हमारी परंपरा रही है कि हम हिंदुओं का अहित नहीं करते। अगर हमें मजबूर किया गया तो हमें उस हद तक जाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।” यह मीटिंग में मौजूद एक चश्‍मदीद की रिपोर्ट है। सात हफ्ते बाद गांधी की हत्‍या हो गई। हत्‍या उसने की, जो कभी आरएसएस का सदस्‍य था।, लेकिन उसने बाद में संगठन छोड़ दिया था। अभी तक गांधी की हत्‍या में आरएसएस का कोई सीधा संबंध सामने नहीं आया है। हालांकि, अगर आठ दिसंबर 1947 को दिया गोलवलकर का भाषण प्रमाणित होता है तो यह तय है कि इसने गांधी के प्रति काफी कटुता पैदा कर दी। 1950 से लेकर 1960 के दशक तक, आरएसएस ने गांधी और उनकी विरासत संभालने वालों के प्रति अविश्‍वास जारी रखा। हालांकि, 1970 से बदलाव आना शुरू हुआ। आरएसएस उन्‍हें एक अच्‍छा देशभक्‍त जो भटक गया, बताने लगी। खास तौर पर गांधी के उस बात पर जोर देने को लेकर, जिसके मुताबिक मुसलमान और ईसाई भी बराबरी का दर्जा रखने वाले देश के नागरिक हैं।

आम लोगों की तरह संगठन भी अपनी राय बदल सकता है। हालांकि, ऐसा करते हुए उन्‍हें इतिहास का ईमानदार तरीके से आकलन करना चाहिए। खास तौर पर तब, जब उस शख्‍स या संगठन की जनता में एक छवि हो। आरएसएस के केस में कहा जा सकता है कि उनकी एक प्रभावशाली छवि है। अगर आरएसएस खुद याद नहीं करना चाहती तो दूसरे भारतीयों को उन्‍हें याद दिलाना होगा। पहले विरोध और बाद में बड़े लोगों की तारीफ करना नए मतदाता वर्ग को तैयार करना है, लेकिन इससे सवालों में घिरा इतिहास मिट नहीं जाता। अगर भागवत को खुद को पाक साफ साबित करना है तो उन्‍हें अंबेडकर की तारीफ करते हुए उन हेडगेवार और गोलवलकर की निंदा करनी होगी, जिनका भारत के बारे मानना था कि यहां मुसलमान हिंदुओं के बराबर नहीं हैं और महिलाएं पुरुषों के। दुर्भाग्‍यवश ऐसा फिलहाल तो नहीं होने जा रहा। आरएसएस के लिए गोलवलकर और हेडगेवार वैसे ही हैं, जैसे सीपीएम के लिए लेनिन और स्‍टालिन। विद्वान जानते हैं कि गोलवलकर और हेडगेवार पितृसत्‍तामक परंपरा के वाहक उग्र राष्‍ट्रवादी थे तो वहीं लेनिन और स्‍टालिन क्रूर तानाशाह। हालांकि, ऐसे लोगों का अनुसरण करने वाले विचारक सभी तरह की आलोचनाओं से परे हैं।

(लेखक एक इतिहासकार हैं। उन्‍होंने हाल ही में ‘Gandhi Before India’ नाम की किताब लिखी है।)

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