रमजान के महीने की शुरुआत से एक दिन पहले यानी 18 फरवरी को जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के उपायुक्त पंकज कुमार शर्मा ने एक आदेश जारी किया। आदेश के मुताबिक, सरकार, वक्फ बोर्ड या किश्तवाड़ की जामिया मस्जिद के इमाम की अनुमति के बिना कोई भी व्यक्ति, गैर सरकारी संगठन या धार्मिक एवं धर्मार्थ संगठन रमजान के महीने के दौरान चंदा इकट्ठा नहीं कर सकता।
इस आदेश की राजनीतिक दलों और धार्मिक नेताओं ने आलोचना की और इसे मुसलमानों के धार्मिक मामलों में दखल करार दिया। उन्होंने इसे तत्काल वापस लेने की मांग भी की।
इसे लेकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का रुख अपने सहयोगी दलों से अलग क्यों है, इस पर बात करने से पहले हम यह जानते हैं कि आदेश में क्या है?
उपायुक्त के आदेश में क्या लिखा था?
आदेश में कहा गया है कि किश्तवाड़ जिले में कोई भी व्यक्ति, गैर सरकारी संगठन, ट्रस्ट, संस्था या समिति संबंधित अधिनियमों (जम्मू-कश्मीर सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, ट्रस्ट अधिनियम) के तहत वैध पंजीकरण के बिना दान (नकद, वस्तु या डिजिटल माध्यम से) एकत्र नहीं कर सकता है। इसके लिए किश्तवाड़ वक्फ बोर्ड इकाई के कार्यकारी अधिकारी/किश्तवाड़ जामिया मस्जिद के इमाम (मजलिस शूरा समिति किश्तवाड़ के अध्यक्ष) या संबंधित तहसीलदारों से पूर्व लिखित सूचना/अनुमति प्राप्त करना जरूरी है।
आदेश में कहा गया है कि यह जिला प्रशासन की कानूनी जिम्मेदारी है कि वह यह तय करे कि राहत, कल्याण या धार्मिक उद्देश्यों के लिए इकट्ठा किए गए धन का मनी लॉन्ड्रिंग या गलत कामों में इस्तेमाल न हो।
बताना होगा कि मुस्लिम समुदाय अपनी संपत्ति का एक हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों को दान के रूप में देता है और दान का अधिकतर हिस्सा रमजान के महीने में दिया जाता है। इस महीने के दौरान धार्मिक संस्थान, निर्माणाधीन मस्जिदें, मरीज और गरीब लोग तथा धर्मार्थ संगठन चंदा एकत्रित करते हैं।
राजनीतिक दलों ने क्या कहा?
बीजेपी ने इस आदेश का स्वागत किया और इसे जम्मू और कश्मीर के सभी क्षेत्रों में लागू करने की मांग की, जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी), पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और कांग्रेस ने इसे असंवैधानिक करार दिया और तत्काल वापस लेने की मांग की। कांग्रेस के विधायकों ने विधानसभा में भी यह मुद्दा उठाया।
क्यों हो रहा है आदेश का विरोध?
इससे पहले अन्य धर्मों के लोगों से चंदा इकट्ठा करने को लेकर ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया गया था, इसलिए इस आदेश को अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप बताया गया। यह आदेश ऐसे वक्त में आया जब सरकार मस्जिदों से चंदे और पैसे से जुड़ी जानकारी मांग रही थी, जिससे इसे लेकर शक पैदा हुआ।
कुछ धार्मिक नेता भी उपायुक्त के इस आदेश को लेकर शक जाहिर कर रहे हैं क्योंकि इससे प्रशासन को इस बात का अधिकार मिलता है कि कौन पैसा इकट्ठा कर सकता है और कौन नहीं। एक और विवादास्पद मुद्दा यह है कि इस आदेश ने भाजपा नेता दरख्शां अंद्राबी के द्वारा चलाए जा रहे वक्फ बोर्ड को दान पर फैसला लेने का अधिकार भी दे दिया है।
एक ओर जहां सहयोगी दलों ने इस आदेश का विरोध किया, वहीं मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इसका बचाव करते हुए कहा कि यह धार्मिक नेताओं के आग्रह पर जारी किया गया था।
उमर अब्दुल्ला ने क्या कहा?
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सदन में विधायकों से हर मुद्दे का राजनीतिकरण न करने का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री ने कहा, “उपायुक्त साहब ने यह आदेश मनमाने ढंग से या बिना किसी कारण के जारी नहीं किया है। रमजान से पहले, सभी उपायुक्तों को स्थानीय मुसलमानों से बात करके तैयारियां करने के लिए कहा गया था। इस बैठक के दौरान, कई लोगों ने बताया कि कुछ लोग रमजान के पवित्र महीने में फर्जी गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) बनाते हैं। वे बीमार लोगों की सहायता का दावा करते हुए पैसे इकट्ठा करते हैं और किसी को नहीं पता कि इसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है।”
मुख्यमंत्री ने कहा, “मैंने अपने स्तर पर इसकी जांच करने की कोशिश की। स्थानीय मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने उपायुक्त से ऐसा आदेश जारी करने का अनुरोध किया था। उन्होंने उपायुक्त साहब से अनुरोध किया कि असली एनजीओ को चंदा न मिलने के कारण नुकसान उठाना पड़ता है।’
मुख्यमंत्री ने कहा कि जामिया मस्जिद (किश्तवाड़) के इमाम और अन्य इमामों ने इस फैसले का स्वागत किया है।
