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राम चंद्र गुहा का ब्‍लॉग: भाजपा के मनमोहन सिंह हैं अरुण जेटली

2013-14 के चुनाव प्रचार में मोदी ने कहा- न खाऊंगा, न खाने दूंगा। मोदी कहना चाहते थे- डॉ. साब ने खुद नहीं खाया, लेकिन अपने साथियों को खाने दिया। यह मंतव्‍य डीडीसीए के मामले में अरुण जेटली पर भी लागू होता है।

Author Updated: December 29, 2015 1:09 AM
विश्‍लेषक और इतिहासकार रामचंद्र गुहा की नजर में अरुण जेटली और मनमोहन सिंह में कई समानताएं हैं।

अरुण जेटली कई मायनों में भाजपा के मनमोहन सिंह हैं। सिंह की तरह वे भी काफी सफल हैं। सांसद और मंत्री बनने से पहले काफी कामयाब पेशेवर रहे हैं। शांत चित्‍त हैं और हर राजनीतिक दलों में दोस्‍त भी बनाए हुए हैं। सिंह की ही तरह वह राज्‍यसभा को अपना संसदीय घर मानते हैं। यही नहीं, उनकी ही तरह जब एक बार उन्‍होंने लोकसभा चुनाव लड़ने की कोशिश की तो हार गए। और अंत में, मनमोहन सिंह की ही तरह अरुण जेटली की छवि भी बेदाग नेता की रही है। ये समानताएं हाल के उस विवाद से और मजबूत हुई हैं, जिसमें जेटली फंस गए हैं। मनमोहन सिंह दस साल तक प्रधानमंत्री रहे। उन पर एक पैसा इधर से उधर करने का आरोप नहीं लगा। लेकिन उनके इर्द-गिर्द भाई-भतीजावाद और ऐसी दूसरी बीमारियां फैलती रहीं। 2011-12 में जब भ्रष्‍टाचार का मामला तूल पकड़ा तो पीएम खुद भी जांच के घेरे में आ गए। केवल इसलिए क्‍योंकि वह उस कैबिनेट के मुखिया थे, जिसके कुछ सदस्‍यों पर भ्रष्‍टाचार का आरोप लगा था।

दावा किया गया कि 2004 से 2014 तक सत्‍ता में रही यूपीए सरकार आजाद भारत की सबसे भ्रष्‍ट सरकार की थी। और क्रिकेट जगत में भी यह बात आम है कि डेल्‍ही एंड डिस्ट्रिक्‍ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) में भाई-भतीजावाद, भ्रष्‍टाचार, धांधली खूब होती रही है। यह देश के सबसे ज्‍यादा बदइंतजामी वाले क्रिकेट एसोसिएशन में से एक माना जाता है। हालांकि, अब तक कोई सबूत नहीं आया है, लेकिन आरोप है कि लंबे समय तक इसके अध्‍यक्ष रहते हुए जेटली को यहां हुई गड़बड़‍ियों से काफी फायदे मिले। अगर मनमोहन सिंह ए. राजा, सुरेश कलमाड़ी आदि की गलतियों के लिए नहीं बख्‍शे जा सकते तो डीडीसीए में हुई धांधलियों के मामले में अरुण जेटली कैसे बेदाग निकल सकते हैं? डीडीसीए के अफसरों ने जो कुछ किया, उसकी जिम्‍मेदारी अध्‍यक्ष पर भी तो आती है?

डीडीसीए में भ्रष्‍टाचार के खिलाफ मोर्चा अब भाजपा से निलंबित किए जा चुके सांसद कीर्ति आजाद ने खोला है। उन्‍हें एक और क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी का भी साथ मिल रहा है। युवा पाठकों को शायद यह याद दिलाने की जरूरत पड़े कि बेदी वह शख्‍स हैं जिन्‍होंने भारत के लिए न केवल टेस्‍ट और वनडे सीरीज में जीत हासिल की, बल्कि दिल्‍ली को क्रिकेट के नक्‍शे पर मजबूती से लाने में अहम भूमिका निभाई। बेदी के दिल्‍ली टीम का कप्‍तान बनने से पहले उसे रणजी ट्रॉफी में कभी जीत नहीं मिली थी। उनकी कप्‍तानी में दिल्‍ली ने तीन साल में दो बार यह ट्रॉफी जीती। बाद में जिन खिलाड़ि‍यों को बेदी ने तैयार किया (इनमें कीर्ति आजाद भी शामिल थे) उनकी अगुआई में दिल्‍ली ने चार बार और रणजी ट्रॉफी जीती। आगे चल कर जैसे-जैसे ट्रॉफी का टोटा पड़ता गया, वैसे-वैसे डीडीसीए में भ्रष्‍टाचार, भाई-भतीजावाद आदि गंदगी बढ़ती गई।

डीडीसीए बीसीसीआई के तहत काम करने वाली संवैधानिक ईकाई है। जेटली बीसीसीआई में भी सक्रिय थे। कई सालों तक वह इसके उपाध्‍यक्ष रहे। 2009 के लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी हार गई तो ऐसा लगा कि जेटली बीसीसीआई का अध्‍यक्ष बनने की महत्‍वाकांक्षा भी पाल रहे थे। 2012 में जेटली को उनके नॉर्थ जोन के बजाय ईस्‍ट जोन से अध्‍यक्ष पद का उम्‍मीदवार बनाने के लिए बीसीसीआई का संविधान भी बदल दिया गया था। इसके कुछ ही समय बाद नरेंद्र मोदी ने पीम बनने की महत्‍वाकांक्षा सार्वजनिक कर दी थी। जेटली लंबे समय से मोदी के मित्र और सलाहकार थे। सो उन्‍होंने भी अपना ध्‍यान क्रिकेट से हटा कर वापस राजनीति में लगा दिया। बीसीसीआई अध्‍यक्ष बनने की चाहत रखने वाले जेटली देश के वित्‍त मंत्री बन गए।

2013-14 के चुनाव प्रचार में मोदी ने कहा- न खाऊंगा, न खाने दूंगा। यह मनमोहन सिंह के उस दावे के संदर्भ में था कि वह खुद ईमानदार हैं। मोदी कहना चाहते थे- डॉ. साब ने खुद नहीं खाया, लेकिन अपने साथियों को खाने दिया। यह मंतव्‍य डीडीसीए के मामले में अरुण जेटली पर भी लागू होता है।

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