अयोध्या में राम मंदिर ‘चंदा चोरी’ का आरोप अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। अगर इसे वक्त रहते न सुलझाया गया तो इसका असर अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजों पर भी पड़ सकता है। क्योंकि राजनीतिक दृष्टि से उत्तर प्रदेश का देश की राजनीति पर बहुत महत्वपूर्ण प्रभाव है।

ऐसे में चुनावी लड़ाई सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। 2014 और 2019 में भाजपा की स्पष्ट जीत और 2024 में उसकी करारी हार सुनिश्चित करने के बाद उत्तर प्रदेश से एक बार फिर 2029 के लोकसभा चुनाव का परिणाम तय होने की उम्मीद है। यह नरेंद्र मोदी के बाद के युग की रूपरेखा भी निर्धारित कर सकता है। जिससे प्रधानमंत्री के संभावित उत्तराधिकारियों के भविष्य का फैसला करने में मदद मिलेगी, जब भी उनका चुनाव होगा।

उत्तर प्रदेश का राजनीतिक महत्व किसी से छिपा नहीं है। 14 प्रधानमंत्रियों में से आठ उत्तर प्रदेश से थे। नेहरू-गांधी परिवार, जिसने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए, कश्मीरी पंडित हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश को अपनी कर्मभूमि बनाया। मोदी गुजरात से हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के महत्व को समझते हुए उन्होंने वाराणसी से चुनाव लड़ा और उसे अपना निर्वाचन क्षेत्र बनाया।

आरएसएस के एक वरिष्ठ सदस्य ने अयोध्या में कथित चोरी के बाद संघ परिवार के कई सदस्यों की चिंताओं को व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि अगर उत्तर प्रदेश भाजपा के हाथों से निकल जाता है, तो अन्य राज्य भी एक-एक करके उसके नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं।

राम मंदिर आंदोलन (राम जन्मभूमि आंदोलन) ने भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ने में अहम भूमिका निभाई। यह मंदिर अन्य मंदिरों से अलग है। इसने देश के बड़े हिस्से में हिंदू मानस को गहराई से प्रभावित किया है और बाबरी मस्जिद के स्थान पर मंदिर निर्माण का आंदोलन कई लोगों के लिए हिंदू पहचान पहचान का प्रतीक बन गया।

समाजवादी पार्टी के लिए अवसर क्यों?

राम मंदिर में धन के कथित गबन से श्रद्धालु निराश हैं। इस मुद्दे से भाजपा रे विरोधियों को फायदा हुआ है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कथित चोरी की जानकारी लीक होते ही इस अवसर का लाभ उठाते हुए श्रद्धालुओं से “चोरी” किए गए धन, सोने और चांदी की वापसी की मांग की।

अखिलेश अपने चुनावी अभियान को एक नई दिशा देने के तरीकों की तलाश में थे, जो उनकी पिछड़ा वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों की राजनीति से परे हो। 2024 के लोकसभा चुनावों में यह रणनीति उनके लिए कारगर साबित हुई। जिसके चलते सपा ने 37 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की। जबकि भाजपा की सीटों की संख्या 62 से घटकर 33 रह गई।

इस नतीजे से भाजपा को बड़ा झटका लगा और वह संसद में पूर्ण बहुमत से वंचित रह गई, लेकिन एक ही रणनीति बार-बार कारगर साबित नहीं होती। अखिलेश इस बार अपना दायरा बड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हाल ही में उनकी पार्टी द्वारा आयोजित ब्राह्मण सम्मेलन से पता चलता है कि वह ब्राह्मण समुदाय को अपने पक्ष में करना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की संख्या जनसंख्या का लगभग 9-10% है और ब्राह्मण समुदाय का प्रभाव उनकी संख्या से कहीं ज्यादा है।

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की राजनीति और सत्ता में राजपूतों के लगातार प्रभाव, हाल में पिछड़े वर्गों के पक्ष में माने जा रहे यूजीसी के नए नियम, भाजपा द्वारा जातीय जनगणना पर सहमति और अब राम मंदिर से जुड़े कथित चंदा गबन के आरोपों ने ब्राह्मणों और कुछ अन्य सवर्ण जातियों के एक वर्ग में नाराजगी पैदा की है। हालांकि, यह भी सच है कि समय-समय पर असंतोष जताने के बावजूद ब्राह्मण समुदाय राम मंदिर आंदोलन शुरू होने के बाद से लगातार भाजपा के साथ खड़ा रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार कांग्रेस के सहयोग से अखिलेश यादव ब्राह्मण मतदाताओं में सेंध लगा पाएंगे?

अपनी हिंदू छवि को मजबूत करने के लिए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अपने गृह क्षेत्र सैफई में केदारनाथ मंदिर की तर्ज पर केदारेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करवा रहे हैं। सैफई मंदिर के जल्द ही खुलने की उम्मीद है। अखिलेश ने कहा है कि इसके बाद वे राम मंदिर के दर्शन करने की योजना बना रहे हैं।

योगी आदित्यनाथ पर निगाहों क्यों टिकीं?

आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि संघ में इस बात को लेकर गहरी चिंता है कि इन आरोपों के कारण मध्यम वर्ग के बीच हिंदुत्व के प्रति ही मोह भंग न हो जाए। ऐसे में भले ही आरएसएस को झटका लगा हो और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव और विश्व हिंदू परिषद के नेता चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार कर लिए गए हों, लेकिन विडंबना यह है कि सबसे बड़ा दांव योगी आदित्यनाथ के लिए हो सकता है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए यह मामला ऐसे वक्त सामने आया है, जब राज्य में आठ महीने बाद चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में लगातार तीसरी जीत उनकी स्थिति को और मजबूत करेगी। वहीं अगर वह मुश्किल से जीतते हैं तो भी वे भाजपा के कई मुख्यमंत्रियों में से एक बने रहेंगे। आदित्यनाथ की लोकप्रियता उत्तर प्रदेश के बाहर भी है। हालांकि योगी आदित्यनाथ ट्रस्ट से सीधे तौर पर जुड़े नहीं हैं, लेकिन अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य के मुखिया के रूप में वह इस संकट को कैसे संभालते हैं।

हालांकि, राम मंदिर में चंदा चोरी की घटना के बाद सीएम योगी ने जांच के लिए तुरंत एसआईटी का गठन किया और उसकी अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई। अभी तक इस मामले में आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे पर अखिलेश यादव के हमलों का सामना किया। सीएम योगी ने अखिलेश को चुनौती दी कि वह मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा उठाएं। यह एक और विवादित स्थल है जो न्यायिक कार्यवाही के केंद्र में है। सपा प्रमुख के लिए इस स्थिति से निपटना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि मथुरा का मुद्दा यादवों को विभाजित कर सकता है, जो उनकी पार्टी का मुख्य आधार हैं। यादव भगवान कृष्ण के भक्त हैं और स्वयं को यदुवंशी कहते हैं, जो कृष्ण के वंशज हैं।

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व शायद आदित्यनाथ को ज्यादा छूट नहीं देना चाहता। फिर भी 2029 के चुनावों के लिए अपनी गति बनाए रखने के लिए भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में जीत बेहद महत्वपूर्ण है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि परिणाम क्या होगा। अंततः यह इस बात पर निर्भर करेगा कि यूपी के मुख्यमंत्री और आरएसएस किस तरह प्रभावी ढंग से राजनीतिक माहौल को नियंत्रित कर पाते हैं और हुए नुकसान की भरपाई करते हैं।

‘चंपत राय स्वस्थ और संतुष्ट हैं’, ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष बोले- इस्तीफे को लेकर उनके मन में कोई नाराजगी नहीं

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। हर दिन कुछ न कुछ खुलासा हो रहा है। इस मामले में अभी तक आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। मामले की जांच कर रही एसआईटी 15 जुलाई को अपनी रिपोर्ट योगी सरकार को सौंप सकती है। इसी बीच श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि ने ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय के स्वास्थ्य की जानकारी ली है। पढ़ें पूरी खबर।