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कृषि कानूनः यह नाक की नहीं, नाश की लड़ाई है…जिंदगी की जंग है- बोले टिकैत

मानसून सत्र के दौरान किसानों ने संसद कूच का ऐलान किया है। साथ ही संयुक्त किसान मोर्चा ने सभी विपक्षी दलों के सांसदों के लिए 'पीपुल्स व्हिप' जारी किया है।

राकेश टिकैत ने किसान आंदोलन को लेकर कहा कि ये नाक की लड़ाई नहीं है बल्कि ये तो हमारे नाश की लड़ाई है। (एक्सप्रेस फोटो)

पिछले 7 महीने से भी अधिक समय से देशभर से आए किसान दिल्ली की सीमाओं पर धरना दे रहे हैं। किसान केंद्र सरकार द्वारा पारित किए गए तीनों कृषि कानूनों को वापस करने की मांग कर रहे हैं। सोमवार को मानसून सत्र के पहले दिन किसान आंदोलन के मुद्दे पर विपक्षी सांसदों ने संसद में जमकर विरोध प्रदर्शन किया। इसी बीच किसान आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन चुके किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि यह नाक की लड़ाई नहीं है, बल्कि नाश की लड़ाई है। साथ ही उन्होंने कहा कि यह जिंदगी की जंग है।

दरअसल आजतक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में जब एंकर अंजना ओम कश्यप ने किसान नेता राकेश टिकैत से सवाल पूछा कि आपने इसे नाक की लड़ाई क्यों बना लिया है। इसपर जवाब देते हुए राकेश टिकैत ने कहा कि ये नाक की लड़ाई नहीं है बल्कि ये तो हमारे नाश की लड़ाई है। हम जिंदा कैसे रहेंगे, यह उसकी लड़ाई है। गांव कैसे रहेंगे, यह उसकी लड़ाई है। जिस हिसाब से बाजार बढ़े हैं, उसी हिसाब से हमारी भी कीमतें बढ़नी चाहिए।   

इसके अलावा जब एंकर अंजना ओम कश्यप ने कहा कि अब तो 15 अगस्त भी आने वाला है। आपको भी पता है कि सीधे सीधे कानूनों की वापसी तो नहीं होगी लेकिन प्रावधानों पर बात जरूर होगी तो आखिर कैसे इसका रास्ता निकलेगा। इसपर जवाब देते हुए राकेश टिकैत ने कहा कि 15 अगस्त आएगा तो हम झंडा फहराएंगे। इसपर एंकर ने कहा कि वो तो प्रधानमंत्री फहराएंगे। तो राकेश टिकैत ने कहा कि क्या इस देश का किसान तिरंगा झंडा नहीं फहरा सकता है। हम तो दिल्ली की जमीन पर झंडा फहराएंगे।

गौरतलब है कि मानसून सत्र के दौरान किसानों ने संसद कूच का ऐलान किया है। साथ ही संयुक्त किसान मोर्चा ने सभी विपक्षी दलों के सांसदों के लिए ‘पीपुल्स व्हिप’ जारी किया है। व्हिप में उनसे सदन से वॉकआउट नहीं करने को कहा गया है। सांसदों को सदन में रहकर तीनों कृषि कानूनों का विरोध करने को कहा गया है। सोमवार को मानसून सत्र के दौरान इस पीपुल्स व्हिप का असर भी दिखा। विपक्षी सांसदों ने कृषि कानून सहित कई मुद्दों पर सदन के अंदर जमकर विरोध प्रदर्शन किया।

बता दें कि किसान आंदोलन को 7 महीने से भी अधिक होने के बावजूद अभी तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। जनवरी महीने के बाद से ही किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच कोई बातचीत नहीं हुई है। केंद्र सरकार ने आखिरी मीटिंग में तीनों कानूनों को डेढ़ साल तक निलंबित करने का प्रस्ताव भी दिया था लेकिन किसान संगठनों ने इसे नामंजूर कर दिया था। हालांकि पिछले दिनों कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने साफ़ कर दिया है कि सरकार तीनों कानूनों के किसी भी प्रावधान पर बात करने को तैयार है लेकिन कानूनों को वापस लेने पर कोई बात नहीं होगी।

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