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राजीव की आख‍िरी रात का आंखों देखा ब्‍योरा: इन लोगों की पहल पर देर रात रैली कर रहे थे गांधी, ऐसे हुई थी मौत

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी अगर जीवित होते तो 20 अगस्त 2018 को वह 75 वर्ष के हो जाते। श्रीलंका के उत्तरी और उत्तर-पूर्वी इलाकों में दो दशकों से ज्यादा समय तक सक्रिय रहे उग्रवादी संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) की एक आत्मघाती महिला हमलावर ने बम से धमाका कर राजीव गांधी की जान ले ली थी। 29 मई 1991 की उस भयानक रात का आखों देखा मंजर पत्रकार नीना गोपाल ने 2016 में प्रकाशित अपनी किताब 'द असैसिनेशन ऑफ राजीव गांधी' में बयां किया है।

राजीव गांधी अपनी मां इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 40 साल की उम्र में भारत के प्रधानमंत्री बने। वे देश के सबसे युवा पीएम थे। (फाइल फोटो)

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी अगर जीवित होते तो 20 अगस्त 2018 को वह 75 वर्ष के हो जाते। श्रीलंका के उत्तरी और उत्तर-पूर्वी इलाकों में दो दशकों से ज्यादा समय तक सक्रिय रहे उग्रवादी संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) की एक आत्मघाती महिला हमलावर ने बम से धमाका कर राजीव गांधी की जान ले ली थी। 29 मई 1991 की उस भयानक रात का आखों देखा मंजर पत्रकार नीना गोपाल ने 2016 में प्रकाशित अपनी किताब ‘द असैसिनेशन ऑफ राजीव गांधी’ में बयां किया है। नीना गोपाल भी उस रात राजीव गांधी के साथ थीं। जब पूर्व प्रधानमंत्री कार से रैली स्थल पहुंचे थे तो नीना भी उन्हीं के साथ कार से वहां पहुंची थीं। नीना के मुताबिक प्रधानमंत्री के पीछे-पीछे जाते वक्त उन्हें कुछ शंका हो रही थी इसलिए वह राजीव गांधी से कहकर उनका इंतजार करने के लिए एक जगह रुक गई थीं। कुछ मिनटों में कानों को सुन्न करने वाला धमाका हुआ।

नीना धमाके से 10 कदम की दूरी पर थीं। धमाके की चपेट में आए लोगों का खून और चिथड़े उनके ऊपर, उनकी सफेद साड़ी पर आ लगे थे। किताब में एक जगह नीना गोपाल बताती हैं कि कांग्रेस नेता जीके मूपानार, जयंति नटराजन और मारगाथन चंद्रशेखर के कहने पर पूर्व प्रधानमंत्री अजीब वक्त पर देर रात उस चुनावी रैली में शामिल होने गए थे। मारगाथम के आग्रह पर राजीव गांधी पेरंबदूर आए थे। अगले दिन नटराजन और मूपानार अलग से उन्हें मिले थे और बताया था कि उन्होंने कैसे राजीव गांधी को जमीन से उठाने की कोशिश की थी लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि उनके हाथ पूर्व प्रधानमंत्री के शरीर टुकड़े लगे थे।

नीना ने किताब में लिखा है कि रैली के वक्त राजीव गांधी के पास उनके निजी बॉडीगार्ड प्रदीप कुमार गुप्ता के अलावा कोई भी पुलिसवाला तैनात नहीं किया गया था। बॉडीगार्ड भी धमाके में मारा गया था और राजीव गांधी के आगे उसकी लाश पड़ी थी। वहां कोई एंबूलेंस नहीं थी, चिकित्सा कर्मी नहीं थे, स्ट्रैचर या ऐसा कोई ऐसा वाहन नहीं था जो धमाके की चपेट में आए लोगों को पास के अस्पताल ले जाता। धमाके के कुछ मिनटों के भीतर, दो कारें, जिनमें से एक अंबेसडर थी, वे मुख्यमार्ग की ओर बैक हुईं थीं और फिर तेज रफ्तार पकड़ गई थीं। बाद में एक एंबुलेंस आई थी, जिसमें राजीव गांधी के पार्थिव शरीर को ले जाया गया था।

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