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राजधानी एक्सप्रेस : वातानुकूलित सफर के 50 साल पूरे

इसे देश की पहली ऐसी ट्रेन होने का भी गौरव हासिल है जो 120 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार वाली क्षमता रखती है। तब इस ट्रेन ने हावड़ा से दिल्ली तक का 1450 किलोमीटर का सफर 17 घंटे 20 मिनट में पूरा किया था।

Author Updated: March 5, 2019 7:06 AM
गाड़ियों के कोच में समय-समय पर बदलाव होते रहे

रेलवे की तेज रफ्तार व वातानुकूलित राजधानी एक्सप्रेस सोमवार (4 मार्च) को जब नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची तो उसने अपने इस ऐतिहासिक सफर के 50 साल पूरे किए। इस ऐतिहासिक यात्रा के लिए कोलकाता से चलने से पहले ट्रेन को फूलों से सजाया गया था। रेलवे ने इस दिन के यात्रियों को खास अनुभव कराने के लिए विशेष इंतजाम कर रखे थे। यात्रियों का स्वागत फूलों व लड्डुओं से किया गया। रेलवे बोर्ड के चीफ इंजीनियर (बोगी) शैलेंद्र कुमार व उत्तर रेलवे के तमाम अधिकारियों ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच कर ट्रेन की अगवानी की। यह ट्रेन का स्वर्ण जयंती वर्ष रहा। पहली बार तीन मार्च, 1969 को यह हावड़ा स्टेशन से चलाई गई थी। इसे देश की पहली ऐसी ट्रेन होने का भी गौरव हासिल है जो 120 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार वाली क्षमता रखती है। तब इस ट्रेन ने हावड़ा से दिल्ली तक का 1450 किलोमीटर का सफर 17 घंटे 20 मिनट में पूरा किया था। लेकिन सोमवार को कोहरे के कारण यह गाड़ी करीब डेढ़ घंटे की देरी से आई। आमतौर पर यह अब 16 घंटे 45 मिनट में सफर तय करती है।

कोलकाता-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सुबह करीब 11:30 बजे पहुंची जहां 16 नंबर प्लेटफार्म पर इसकी अगवानी रेलवे के आला अधिकारियों ने की। शैलेंद्र कुमार व उत्तर रेलवे के दिल्ली के मंडल प्रबंधक आरएन सिंह ने ट्रेन के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कई पूर्व कर्मचारी भी कोलकाता में ट्रेन को हरी झंडी दिखाने पहुंचे थे। इनमें से कई कर्मचारी काफी बुजुर्ग हो गए हैं। इसमें करीब 15-16 ऐसे यात्री भी शामिल रहे जिन्होंने इसमें यात्रा तब से शुरू की जब यह गाड़ी शुरू हुई थी। शैलेंद्र ने कहा कि गाड़ियों के कोच में समय-समय पर बदलाव होते रहे।

उन्होंने बताया कि पहली बार जब गाड़ी चली थी तब इसमें एक ही दर्जे के वातानुकूलित कोच होते थे जिसे एसी फर्स्ट कहते हैं। इसके बाद दूसरे दर्जे के वातानुकूलित कोच शामिल किए गए। बाद में तीसरे दर्जे के वातानुकूलित कोच शामिल किए गए। इसके तहत समय समय पर कई जरूरी बदलाव किए जाते रहे जिनमें कोच को ज्यादा आरामदेह बनाने से लेकर जर्क रहित व साफ सुथरा रखने के लिहाज से बदलाव किए जाते हैं। एक यात्री पवन ने बताया कि यात्रा ऐतिहासिक है, यह रास्ते में पता चला। टिकट लेते समय मालूम नहीं था। एक यात्री ने कहा कि ट्रेन में उन्हें विशेष खाना परोसा गया था। आमतौर से इस ट्रेन में आइसक्रीम मिलती है लेकिन इस बार रसगुल्ला भी था। यात्रियों ने बताया कि रवाना होने के साथ ही यात्रियों को ग्रीटिंग कार्ड दिए गए जिस पर 50 साल होने के बारे में लिखा था।

एक महिला यात्री ने बताया कि ट्रेन के स्वर्ण जयंती साल होने की जानकारी कई यात्रियों को स्टेशन पहुंच कर मिली। उन्होंने कहा कि पहले तो ट्रेन को सजा हुआ देख कर उन्हें लगा कि कोई नेता जा रहा होगा या फिर गाड़ी नई खरीदी गई है। लेकिन बाद में मालूम चला कि यह तो खास यात्रा है। कर्मचारियों ने भी विशेष वर्दी पहनी थी जो पचास साल होने के लोगो के बैज लगाए हुए थे। इस पल को यादगार बनाने के लिए नई दिल्ली पर भी फोटो खींचे गए। यात्रियों के साथ भी व अफसरों के साथ भी। उत्तर रेलवे के मुख्य प्रवक्ता दीपक कुमार ने बताया कि इस गाड़ी की शुरुआत भारतीय रेलवे के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई। इसके पहले सभी गाड़ियां 50 से 60 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से ही चलती थीं। लेकिन बाद में इस गाड़ी ने करीब 1500 किलोमीटर की दूरी को 16 से 17 घंटे में समेट दिया।

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