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सचिन पायलट या अशोक गहलोत…Congress के लिए कौन अहम? जानें, राजस्थान की राजनीति में कौन किस पर भारी

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और डिप्टी-सीए सचिन पायलट में टकराव की जो स्थिति है, उससे सरकार फिलहाल खतरे में दिख रही है। ऐसे में इन दोनों में से Congress के लिए कौन अहम है और सूबे की सियासत में कौन किस पर भारी है? आइए जानते हैंः

Author जयपुर/नई दिल्ली | Updated: July 13, 2020 5:46 PM
Rajasthan Political Crisis, Rajasthan Crisis, Sahin Pilot, Ashok Gehlot, Congressराजस्थान के सीएम गहलोत और डिप्टी-सीएम सचिन पायलट। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

राजस्थान की राजनीति मौजूदा कांग्रेसी सरकार पर संकट के बादल मंडराने से बेहद गर्म है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और डिप्टी-सीए सचिन पायलट में टकराव की जो स्थिति है, उससे सरकार फिलहाल खतरे में दिख रही है। ऐसे में इन दोनों में से Congress के लिए कौन अहम है और सूबे की सियासत में कौन किस पर भारी है? आइए जानते हैंः

अगर पायलट ने कांग्रेस छोड़ दी, तब गहलोत सरकार के पास बहुमत कैसे रहेगा?: राजस्थान में कांग्रेस और बीजेपी के नेतृत्व वाले विपक्ष के बीच का अंतर बहुत महीन नहीं है। सूबे में संख्या बल परीक्षा एक महीने पहले हुई थी- राज्य सभा चुनाव के दौरान। कांग्रेस के दो उम्मीदवारों को 200 में से 123 वोट मिले थे। इसमें 107 खुद के (कांग्रेस) थे, जबकि 13 स्वतंत्र विधायक थे। वहीं, दो Bharatiya Tribal Party से और एक RLD से था। दोनों कांग्रेसियों को CPM के भी दो MLA का समर्थन मिला था, जिससे कुल योग 125 होना था पर 123 वोट इसलिए रह गए थे, क्योंकि एक मंत्री और CPM के विधायक अपने स्वास्थ्य के चलते वोट नहीं दे सके थे।

बीजेपी को 74 वोट मिले थे। 72 खुद के, तीन हनुमान बेनीवाल के नेतृत्व वाली Rashtriya Loktantrik Party से। मध्य प्रदेश की ही तरह राजस्थान में भी अधिकतर निर्दलीय सीएम गहलोत के करीबी हैं। फिर भी पायलट 2014 से PCC अध्यक्ष हैं। 2018 के विस चुनाव में टिकट बंटवारे में गहलोत आगे थे और करीब 75% कांग्रेसी विधायक उनके प्रति वफादार माने जाते हैं। वहीं, पायलट खेमे का दावा है कि उनके पास आधे ही विधायकों का समर्थन है।

राजस्थान में BJP बंटी हुई है या नहीं?: हां, यही चीज इसे मध्य प्रदेश की सियासी स्थिति से अलग करती है। साथ ही मुख्यमंत्री पद भी इस पूरी टक्कर के केंद्र में है, जिसे लेकर पायलट और गलहोत आमने-सामने हैं। मध्य प्रदेश में सिंधिया मुख्यमंत्री पद की मांग नहीं कर रहे थे, जिससे बीजेपी के लिए चीजें आसान रही थीं। अगर पायलट बीजेपी में जाते हैं, तब सवाल होगा कि क्या वह मुख्यमंत्री पद से नीचे संतोष करेंगे? कहा जा रहा है कि पूर्व सीएम वसुंधरा राजे और बीजेपी नेतृत्व का बड़ा हिस्सा पायलट को सीएम को तौर पर नहीं स्वीकारेगा।

इस सत्ता संग्राम की जड़ें क्या हैं और कहां से पनपीं?: गहलोत के नेतृत्व में पार्टी की भयंकर हार के बाद जनवरी 2014 में पायलट को Rajasthan Congress का प्रभारी बनाया गया। पायलट के करीबियों के मुताबिक, उनकी नियुक्ति ने पार्टी के भीतर जनरेश्नल शिफ्ट पैदा किया और ऐसे संकेत दिए कि अगर पार्टी दोबारा जीतती है, तब वह सीएम हो सकते हैं।

गहलोत सत्ता में लंबे समय से हैं और वह पहली बार 1998 में सीएम बने थे। वह तब 47 साल के थे। वह पीसीसी चीफ भी रहे हैं और कांग्रेस के उस कैंपेन का नेतृत्व भी कर चुके हैं, जिसने भैरव सिंह शेखावत के नेतृत्व वाली बीजेपी को मात दी थी और कांग्रेस को वापस सत्ता दिलाई थी। दोनों के बीच विवाद तब पनपा, जब कांग्रेस हाई कमान से तीसरी बार गलहोत को सीएम बनाया। ऐसा तब हुआ, जब दोनों नेताओं के बीच चीजें ठीक नहीं थीं और वे दोनों बगैर नाम लिए कई मौकों पर पूर्व में एक-दूजे के खिलाफ जुबानी हमला बोलते थे।

पर ये विवाद हल क्यों नहीं हुआ?: कई नेताओं का मानना है कि पार्टी नेतृत्व पिछले छह सालों में बेहद कमजोर हुआ है। राहुल गांधी का सक्रिय संगठनात्मक गतिविधियों से पीछे हटने का फैसला भी इसमें अहम कड़ी है, जिसने पार्टी के युवा नेताओं और उनके भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े किए। पुराने (बुजुर्ग) और नए (युवा) के बीच की दरार भी पड़ी, जिसने न केवल म.प्र में पार्टी में कलह पैदा की, बल्कि राजस्थान को भी प्रभावित किया।

कांग्रेस के लिए इसके अलावा जाति संबंधी चीजें भी दरकिनार करना मुश्किल है। पायलट गुर्जर समुदाय से आते हैं और उनका कद बढ़ने के खिलाफ जिस चीज ने काम किया, वह मानी जाती है- मीणा समुदाय के चीजें ठीक न होना। वहीं, दूसरी तरफ गहलोत पिछड़ी माली जाति से आती हैं, जिसे किसी भी जाति से खासा खतरा नहीं माना जाता। मसलन जाट, गुर्जर, मीणा और राजपूत।

सरकार नहीं गिरी, तब उस पर सियासी संकट का असर पड़ेगा?: इस संकट से निश्चित तौर पर पायलट का कद कम हो जाएगा। उनके करीबी सूत्र कहते हैं, “वह (पायलट) कैसे सरकार में रह सकते हैं, वह भी नंबर-दो के तौर पर।”

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