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विचार: अदाकारी पर टिके जनतंत्र को झिंझोड़ती आवाज़

बाईस अप्रैल, 2015 का दिन भारतीय संसदीय जनतांत्रिक राजनीति की पराजय के एक दिन के रूप में याद रखा जाएगा। इसकी वजह यह है कि एक किसान उस वक्त खुदकुशी कर लेता है...

Author April 23, 2015 11:29 am
मामले में जांच की जिम्मेदारी अपराध शाखा को सौंपी गयी है। (फ़ोटो-पीटीआई)

अपूर्वानंद

बाईस अप्रैल, 2015 का दिन भारतीय संसदीय जनतांत्रिक राजनीति की पराजय के एक दिन के रूप में याद रखा जाएगा। इसकी वजह यह है कि एक किसान उस वक्त खुदकुशी कर लेता है जब उसी के सवाल पर एक जनतांत्रिक प्रतिरोध सभा हो रही होती है। वह उस सभा से ताकत नहीं महसूस करता। वहां इकट्ठा समुदाय को अपनी बिरादरी नहीं मान पाता। खुद को इस भीड़ के बीच इतना अकेला पाता है कि मंच से किसानों के हक में दिए जा रहे भाषणों और नारों से उसे यह आश्वासन नहीं मिलता कि उनमें उसकी आवाज शामिल है। अपनी आवाज उसे अकेले ही उठानी है। और अदाकारी पर टिके इस जनतंत्र में वह तभी सुनी जा सकती है, जब खुद नाटक बन जाए।

गजेंद्र सिंह ने यही किया। भारतीय किसान के अकेलेपन को और कैसे जाहिर किया जा सकता था? जंतर-मंतर पर हो रही रैली और उसके नेताओं को तो इस सवाल पर सोचना ही चाहिए, दूसरे दलों को भी इस पर विचार करना चाहिए। किसानों की आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े क्या किसी राजनीतिक दल को इसके लिए मजबूर कर रहे हैं कि वह विदर्भ में, पंजाब में, राजस्थान में किसानों के बीच जाए, उनसे बात करे, उन्हें यकीन दिलाए कि संघर्ष ही रास्ता है? कि आत्महत्या से संघर्ष को बल नहीं मिलता?

आत्महत्या सामूहिक निर्णय का मामला नहीं लेकिन संघर्ष है। फिर संघर्ष क्या सामूहिकता का निर्माण नहीं कर रहा? अगर किसानों के नाम पर किया जाने वाला संघर्ष उनकी लाचारी को अपनी ताकत बनाकर कामयाब होना चाहेगा तो यह जनतंत्र का सबसे नाकामयाब क्षण होगा।
जनतंत्र सिर्फ चुनाव से नहीं चलता। संसद के मुकाबले वह सड़क पर आकार लेता है। जनता की गोलबंदी, लोगों के एक-दूसरे के करीब आने, अपने खून के रिश्तेदारों की जगह नई बिरादरियां बनने की संभावना से एक अकेले इंसान को ताकत मिलती है। यह रंगमंच के ट्रस्ट गेम की तरह है। गिरते अभिनेता को पता होता है कि उसे गिरने नहीं दिया जाएगा। अगर वह गिरा तो यह उसकी नहीं समूह की असफलता है।

आम तौर पर मृत्यु आदमी के भीतर की इंसानियत को जगा देती है। सामने मृत को देखकर हम खामोश हो जाते हैं। मौत हमें हमारे रोजमर्रा के छोटेपन से मुक्त होने में मदद करती है। हम अपने घोर दुश्मन की मौत पर भी मौन हो जाते हैं। लेकिन जो मृत्यु की उपस्थिति में भी चीखता रहे, अपनी पुरानी भूमिका में ही कैद रहे, उससे मुक्त न हो पाए , उसमें कुछ बुनियादी खोट है। उससे सावधान रहना चाहिए। यही खोट उनमें है जो गोधरा में ट्रेन में मारे गए लोगों का जुलूस बनाकर ले गए और उससे भी ज्यादा लोगों की हत्या को क्रूरता के साथ देखते रहे। अगर आज वे देश के शीर्ष पर हैं तो यह जनतंत्र की सफलता नहीं है। उसी तरह दिल्ली सरकार के मुखिया समेत सारे मंत्रियों को अगर गजेंद्र की मौत से, जो कि सामान्य मौत न थी, सदमा नहीं पहुंचा तो उनसे जनता को सावधान हो जाने की आवश्यकता है।

आम आदमी पार्टी की नैतिक लापरवाही, उनके प्रवक्ताओं के बयान से और भी प्रकट हो गई। क्या वह फ्रायडीयन फिसलन भर थी? या वह उनका मूल स्वभाव है? या वह क्रूरता और कठोरता है जो भारत की संसदीय राजनीति में साधारण जन के प्रति है जो दरअसल उससे प्यार नहीं करती? यह भी साफ है कि उसमें बुनियादी दर्दमंदी नहीं है। और इस दर्दमंदी के बिना जनतांत्रिक राजनीति कैसे हो सकती है?

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