Raj-Uddhav Thackeray Protest in Mumbai: महाराष्ट्र की राजनीति में रविवार को बड़ा सियासी घटनाक्रम देखने को मिला। शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे लंबे समय बाद एक बड़े राजनीतिक मुद्दे पर एक साथ नजर आए। दोनों नेताओं ने मुंबई में चुनाव आयोग के खिलाफ संयुक्त विरोध प्रदर्शन किया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की।

दोनों दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक और स्वायत्त संस्था के कामकाज में किसी भी तरह का राजनीतिक प्रभाव नहीं होना चाहिए। इस रैली को महाराष्ट्र में विपक्षी राजनीति के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। यह ऐसा वक्त है, जबकि केंद्रीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी लगातार आलोचनाओं का सामना कर रही है।

कार्यकर्ताओं के हाथ में केवल तिरंगा

उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की संयुक्त रैली रविवार सुबह मुंबई के भायखला स्थित रिचर्डसन एंड क्रुडास से शुरू हुई और सीएसएमटी स्थित BMC मुख्यालय की ओर बढ़ी। इस प्रदर्शन की सबसे खास बात यह रही कि दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता अपने-अपने पार्टी झंडे और चुनाव चिह्न लेकर नहीं पहुंचे।

इसके बजाय कार्यकर्ताओं से केवल तिरंगा लेकर आने की अपील की गई थी। दोनों नेताओं की कोशिश इस आंदोलन को किसी एक पार्टी के कार्यक्रम के बजाय चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ व्यापक नागरिक और राजनीतिक अभियान के तौर पर पेश करने की रही।

SIR बना ECI के खिलाफ विपक्ष की बड़ी वजह

चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष की नाराजगी की प्रमुख वजहों में Special Intensive Revision यानी SIR भी शामिल है। यह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया है, जिसे जून 2025 में बिहार से शुरू किया गया था और बाद में दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तार दिया गया।

विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूची की जांच और दस्तावेजों की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर हुए। हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने और पात्र मतदाताओं को शामिल रखने की प्रक्रिया पर जोर दिया गया है। इसी मुद्दे को लेकर विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच राजनीतिक टकराव लगातार बढ़ा है।

महाराष्ट्र में 2.07 करोड़ नामों को लेकर सवाल

महाराष्ट्र में भी SIR को लेकर विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं। 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में करीब 2.07 करोड़ ऐसे मतदाताओं के नाम शामिल नहीं थे, जिनके enumeration forms जमा नहीं हुए थे। इसके अलावा करीब 1.22 करोड़ मतदाताओं को नोटिस दिए जाने की बात सामने आई।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे लेकर चुनाव आयोग से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की है। विपक्ष इसे ‘वोट चोरी’ जैसे आरोपों से जोड़ रहा है, जबकि चुनाव आयोग की प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को सत्यापित और अपडेट करना बताया जाता है। यही विवाद अब महाराष्ट्र की राजनीति में भी बड़ा मुद्दा बन गया है।

चुनाव आयोग के अंदर भी फैसलों पर उठे सवाल?

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने भी राजनीतिक बहस को तेज किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के नाम पर लिए गए कुछ फैसलों को लेकर आपत्ति दर्ज की थी।

ये मामले नए मतदाता फॉर्म, मतदाता सूची से संबंधित सॉफ्टवेयर और पश्चिम बंगाल में बहाल किए गए मतदाताओं से जुड़ी अपीलों जैसे मुद्दों से संबंधित बताए गए। हालांकि, इन घटनाक्रमों को लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। इस रिपोर्ट के बाद आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और पारदर्शिता पर भी बहस तेज हुई है।

शिवसेना के नाम और धनुष-बाण है उद्धव के लिए मुद्दा

उद्धव ठाकरे के लिए चुनाव आयोग के खिलाफ यह लड़ाई केवल SIR तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें 2022 में हुए शिवसेना विभाजन तक भी जाती हैं। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बगावत के बाद शिवसेना दो गुटों में बंट गई थी। इसके बाद फरवरी 2023 में चुनाव आयोग ने शिवसेना का नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न शिंदे गुट को देने का फैसला किया था। उद्धव ठाकरे ने इस फैसले पर लगातार सवाल उठाए हैं।

चुनाव आयोग के उस निर्णय के बाद उद्धव गुट ने शिवसेना (UBT) नाम और ‘मशाल’ चुनाव चिह्न के साथ 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ा। ऐसे में मौजूदा विरोध प्रदर्शन को उद्धव ठाकरे की पुरानी राजनीतिक लड़ाई से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

राज-उद्धव की करीबियां बढ़ीं

राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे का एक मंच पर आना इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। दोनों चचेरे भाइयों के बीच लंबे समय से राजनीतिक दूरी रही है, लेकिन चुनाव आयोग के मुद्दे ने उन्हें फिर साथ ला दिया है। राज ठाकरे ने कहा कि इस आंदोलन में बीजेपी समेत कोई भी राजनीतिक दल शामिल हो सकता है और इसका एजेंडा केवल चुनाव आयोग से जुड़े सवालों तक सीमित है।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) ने भी प्रदर्शन को समर्थन दिया है। सुप्रिया सुले ने संयुक्त रैली के समर्थन का ऐलान किया। वहीं राजनीतिक संचार रणनीतिकार अभिजीत दिपके से जुड़े ‘Cockroach Janta Party’ अभियान ने भी लोगों से तिरंगा लेकर प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की।

क्या नया राजनीतिक समीकरण बनाएंगे ठाकरे ब्रदर्स?

महाराष्ट्र में अगला लोकसभा और विधानसभा चुनाव 2029 में होना है, इसलिए इस रैली का तत्काल चुनावी असर तय करना अभी मुश्किल है लेकिन राजनीतिक दृष्टि से उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का एक साथ आना महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग, SIR और मतदाता सूची जैसे मुद्दों पर दोनों दल साझा अभियान को आगे बढ़ाते हैं तो महाराष्ट्र में विपक्षी राजनीति के नए समीकरण बन सकते हैं।

खास तौर पर ठाकरे परिवार की दोनों राजनीतिक धाराओं के एक मंच पर आने से मराठी राजनीति में इसका असर देखने को मिल सकता है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग के खिलाफ शुरू हुआ यह साझा आंदोलन आने वाले दिनों में एक बड़े राजनीतिक अभियान में बदलता है और क्या उद्धव-राज ठाकरे की यह एकजुटता 2029 के चुनावों तक कायम रहती है।

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समाजवादी पार्टी के सांसद शिवपाल सिंह पटेल ने बड़ा दावा किया है। प्रतापगढ़ से सांसद पटेल ने कहा कि उनकी पार्टी के साथ गठबंधन के बिना कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनावों में एक भी सीट नहीं जीत पाती। पढ़िए पूरी खबर…