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विशेष: सौंदर्य का तर-बतर बोध

दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के साथ अब तो सूरत, इंदौर, पटना, भोपाल जैसे शहरों में भी बारिश दिखाने और बताने का सबसे आसान तरीका है, किसी किशोरी या युवती को भीगे कपड़ों के साथ दिखाना। कहने को बारिश को लेकर यह सौंदर्यबोध पारंपरिक है। पर यह बोध लगातार सौंदर्य का दैहिक भाष्य बनता जा रहा है। और ऐसा मीडिया और सिनेमा की भीतरी-बाहरी दुनिया को साक्षी मानकर बखूबी समझा जा सकता है।

Rainy Scene in HIndi Cinema, Rajkapoor, Nargisफिल्मों में बारिश के दृश्य हमेशा से दिखाए जाते रहे हैं। राजकपूरऔर नर्गिस के बारिश में भीगते हुए गीत गाने का दृश्य काफी चर्चित रहा है।

कोविड-19 के संकट के बीच अगर कुछ सुकूनदेह है तो वह है पर्यावरण और प्रकृति का वह रूप, जो न सिर्फ सुंदर है बल्कि खासा प्रेरक भी है। दुनिया भर में इस बारे में नए सिरे से अध्ययन शुरू हुए हैं कि इंसानी हस्तक्षेप को कितना और कैसे न्यूनतम किया जाए कि ग्लोबल वार्मिंग जैसा पर्यावरण संकट हमें न घेरे। बहरहाल, बात सावन की और खासतौर पर बरसात की। इस साल मौसम विभाग अभी देश के विभिन्न हिस्सों में मानसून के पहुंचने का कैलेंडर बनाने में ही लगा था कि बारिश ने अपनी रिमझिम दस्तक देश के विभिन्न हिस्सों में दे दी।

पूर्व मानसून और मानसून के बीच घटाओं की मेहरबानी ने इस साल गर्मी की झुलस को काफी हद तक नियंत्रित रखा। मौसम की इस खुशमिजाजी को देखकर सभी खुश हैं। सावन के पहले दिन भी देश के विभिन्न हिस्सों में अच्छी-खासी बारिश हुई और उमस भरी गर्मी के बीच लोगों ने राहत की सांस ली। पर एक बात जरूर अखरती है, वह यह कि वर्षा गीत और सावनी झूला झूलने के आदी देश में बारिश का मतलब अब बादशाह और हनी सिंह जैसे रैपर बता रहे हैं।

दिलचस्प है कि बढ़ती गर्मी बारिश की याद ही नहीं दिलाती, उसकी शोभा भी बढ़ाती है। केरल तट पर मानसून की दस्तक हो कि दिल्ली में उमस भरी गर्मी के बीच हल्की बूंदा-बांदी, खबर के लिहाज से दोनों की कद्र है और दोनों को पर्याप्त जगह मिलती भी है। अखबारों-टीवी चैनलों पर जिन खबरों में कैमरे की कलात्मकता के साथ ‘स्क्रिप्ट’ के लालित्य की थोड़ी-बहुत गुंजाइश होती है, वह बारिश की खबरों को लेकर ही। पत्रकारिता में प्रकृति की यह सुकुमार उपस्थिति अब भी बरकरार है, यह गनीमत नहीं बल्कि उपलब्धि जैसी है। पर इसका क्या करें कि इस उपस्थिति को बचाए और बनाए रखने वाली आंखें अब धीरे-धीरे या तो कमजोर पड़ती जा रही हैं या फिर उनके देखने का नजरिया बदल गया है।

दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के साथ अब तो सूरत, इंदौर, पटना, भोपाल जैसे शहरों में भी बारिश दिखाने और बताने का सबसे आसान तरीका है, किसी किशोरी या युवती को भीगे कपड़ों के साथ दिखाना। कहने को बारिश को लेकर यह सौंदर्यबोध पारंपरिक है। पर यह बोध लगातार सौंदर्य का दैहिक भाष्य बनता जा रहा है। और ऐसा मीडिया और सिनेमा की भीतरी-बाहरी दुनिया को साक्षी मानकर बखूबी समझा जा सकता है।

कई अखबारी फोटोग्राफरों के पास तो अपने खींचे या यहां-वहां से जुगाड़े गए ऐसे फोटो की बाकायदा लाइब्रेरी है। समय-समय पर वे हल्के फेरबदल के साथ इन्हें जारी करते हैं और खूब वाहवाही लूटते हैं। जो नए मॉडल और कलाकार अपना पोर्टफोलियो लेकर प्रोडक्शन हाउस के चक्कर लगाती हैं, उनमें बारिश या पानी से भीगे कपड़ों वाले फोटोशूट जरूर शामिल होते हैं।

अभिनेत्रियों के रूपहले परदे पर भीगने-भिगाने का चलन वैसे बहुत नया भी नहीं है। पर पहले उनका यह भीगना-नहाना ताल-तलैया, गांव-खेत से जुड़े-बीते प्रेम के पानीदार क्षणों को जीवित करने के भी कलात्मक बहाने थे। आज यह बहाना सीधे देह को हर तरह के आकर्षण की सीध में खड़े कर देने की अधीरता में बदल गया है।

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