रायबरेली में बुधवार को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 1857 की क्रांति के एक कम चर्चित योद्धा वीरा पासी की मूर्ति का अनावरण किया। यूपी की राजनीति में इस कदम को काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं और सभी राजनीतिक दल दलित समुदाय, खासकर पासी समाज को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में लगे हैं।

राहुल गांधी ने उसी दिन वीरा पासी की याद में आयोजित “बहुजन स्वाभिमान सभा” को भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि लोग वीरा पासी और डॉ. भीमराव आंबेडकर को याद तो करते हैं, लेकिन जिन विचारों और सिद्धांतों के लिए उन्होंने संघर्ष किया, आज उनकी ठीक से रक्षा नहीं हो रही है। राहुल ने आरोप लगाया कि देश के संविधान पर हमला हो रहा है।

कौन थे वीरा पासी?

वीरा पासी 1857 की क्रांति के दौरान रायबरेली के शंकरपुर रियासत के शासक राणा बेनी माधव बख्श सिंह के बेहद भरोसेमंद साथी और सेनापति थे। वे दलित समाज की पासी जाति से आते थे। उनका जन्म 11 नवंबर 1835 को रायबरेली जिले के लोधवारी गांव के एक गरीब परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता की मौत हो गई थी। इसके बाद वे अपनी बहन के घर रहने लगे। स्थानीय बोली में बहन के घर रहने वाले भाई को “वीरना” कहा जाता था, जो बाद में बदलकर “वीरा” बन गया।

कहा जाता है कि उनकी ताकत और बहादुरी से प्रभावित होकर राणा बेनी माधव ने उन्हें अपनी सेना में शामिल किया था। धीरे-धीरे वे उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाने लगे।

स्थानीय लोककथाओं के मुताबिक, 1857 की क्रांति के दौरान जब अंग्रेजों ने राणा बेनी माधव को पकड़ लिया था, तब वीरा पासी ने साहस दिखाते हुए उन्हें जेल से छुड़ा लिया था। इसके बाद अंग्रेज सरकार ने वीरा पासी को पकड़ने या उनके बारे में जानकारी देने पर 50 हजार रुपये का इनाम घोषित कर दिया था।

हालांकि इतिहास की किताबों में वीरा पासी का नाम ज्यादा नहीं मिलता, लेकिन रायबरेली और आसपास के इलाकों में लोककथाओं और मौखिक परंपराओं के जरिए उनकी वीरता की कहानियां आज भी सुनाई जाती हैं। माना जाता है कि अंग्रेजों से लड़ते हुए राणा बेनी माधव की रक्षा करते समय उनकी मौत हो गई थी।

यूपी की राजनीति में दलित नायकों पर फोकस

पिछले कुछ वर्षों में यूपी की राजनीति में दलित समाज के ऐतिहासिक नायकों को सामने लाने की कोशिश तेज हुई है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी के फैजाबाद सांसद अवधेश प्रसाद ने संसद में शपथ लेते समय “वीरांगना” ऊदा देवी और “महाराजा” बिजली पासी का नाम लिया था।

ऊदा देवी अवध की बेगम हजरत महल की सेना का हिस्सा थीं और उन्होंने 1857 की लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को संगठित किया था। वहीं बिजली पासी को मध्यकाल में यूपी के कुछ हिस्सों का शासक माना जाता है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने लखनऊ स्थित बिजली पासी किले के विकास और उसे पर्यटन स्थल बनाने की योजना भी बनाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी महाराजा बिजली पासी की तारीफ कर चुके हैं।

इतिहास में दलित नायकों की अनदेखी?

दलित नेताओं और शिक्षाविदों का कहना है कि इतिहास की मुख्यधारा में दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों के योगदान को लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के प्रोफेसर अजय कुमार के मुताबिक, इन समुदायों ने अब अपनी पहचान, सम्मान और इतिहास को फिर से सामने लाने की कोशिश शुरू की है।

उन्होंने कहा कि दलित समुदायों के पास लिखित रिकॉर्ड कम थे, इसलिए उनका इतिहास लोकगीतों, कहानियों और मौखिक परंपराओं के जरिए बचा रहा। समाजवादी पार्टी के नेता मनोज पासवान ने कहा कि कांशीराम ने दलित नायकों को पहचान दिलाने का काम किया और लोगों से अपने इतिहास पर गर्व करने की अपील की।

क्यों अहम है पासी समाज?

यूपी में पासी समुदाय अनुसूचित जाति की आबादी का करीब 7 प्रतिशत हिस्सा है। जाटवों के बाद यह राज्य का सबसे बड़ा दलित समूह माना जाता है। 2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को पासी समुदाय से अच्छा समर्थन मिला था। पार्टी के पांच पासी उम्मीदवार चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे, जबकि बीजेपी के तीन उम्मीदवार जीते।

बहुजन समाज पार्टी के कमजोर होने के बाद अब समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी सभी दलित वोटों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही हैं। इसी वजह से आंबेडकर, कांशीराम और अब वीरा पासी जैसे दलित नायकों को राजनीति के केंद्र में लाया जा रहा है।

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उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अभी कुछ महीने का वक्त है लेकिन उससे पहले एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला है। कांग्रेस के अनुसूचित विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम और बाराबंकी से कांग्रेस के सांसद तनुज पूनिया मंगलवार को बसपा की सुप्रीमो मायावती से मुलाकात करने के लिए उनके लखनऊ स्थित आवास पर पहुंचे थे। राजेंद्र पाल गौतम ने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर इस बात की जानकारी दी है कि वे मायावती से मिलने उनके घर पर गए थे लेकिन मुलाकात का समय नहीं मिल सका। उन्होंने उम्मीद जताई कि जल्द ही बीएसपी सुप्रीमो से मुलाकात होगी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक