Raghav Chadha Left AAP: आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, स्वाति मालीवाल और विक्रमजीत साहनी ने शुक्रवार को बीजेपी में शामिल हो गए। उनके इस कदम से राज्यसभा में AAP के सिर्फ तीन सदस्य रह गए हैं और पार्टी राज्यसभा में सिकुड़ गई है।
अब एक सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राघव चड्ढा और उनके साथ बीजेपी में जाने वाले आप के इन बागियों की राज्यसभा की सदस्यता चली जाएगी? इसको लेकर पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के चक्षु रॉय ने बताया कि पूर्व के उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि सातों सांसदों को अयोग्यता का सामना नहीं करना पड़ेगा।
सदस्यता पर क्या कहते हैं विश्लेषक
दूसरी ओर AAP के संसद के दोनों में सदस्य हैं। राज्यसभा अध्यक्ष केवल उसी सदन पर विचार करेंगे जिसकी अध्यक्षता वे कर रहे हैं। चक्षु रॉय ने कहा कि राज्यसभा के अध्यक्ष कह सकते हैं कि चूंकि पार्टी के दो-तिहाई सदस्य बीजेपी में विलय कर चुके हैं, इसलिए वे अब भाजपा सदस्य होंगे और अयोग्यता का सामना नहीं करेंगे।
चक्षु रॉय ने इस मामले में नियमों का हवाला देते हुए कहा कि जब वेंकैया नायडू अध्यक्ष थे, तब TDP के सी एम रमेश ने अपनी पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों के साथ BJP में विलय कर लिया था और अध्यक्ष ने विलय को मंजूरी दे दी थी।
क्या हैं अन्य नियम?
लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य के अनुसार आम आदमी पार्टी के सदस्य राज्यसभा के अलावा विभिन्न विधानसभाओं में भी हैं। उन्होंने संविधान में 52वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम 1985 द्वारा जोड़े गए और 91वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम 2003 द्वारा सुदृढ़ किए गए 10वीं अनुसूची के अनुच्छेद 4 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि किसी सदन के सदस्य को अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।
नियम के अनुसार उसका मूल राजनीतिक दल किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय हो जाता है और वह दावा करता है कि वह और उसके मूल राजनीतिक दल के अन्य सदस्य उस अन्य राजनीतिक दल के सदस्य बन गए हैं या, जैसा भी मामला हो उस विलय से गठित नए राजनीतिक दल के सदस्य बन गए हैं।
अदालत में भी जा सकता है मामला
पीडीटी आचार्य ने बताया कि उनके विचार में इसका मतलब यह होगा कि अरविंद केजरीवाल को स्वयं बीजेपी में विलय के लिए तैयार होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि अब कोई भी सदस्य राज्यसभा अध्यक्ष के समक्ष अयोग्यता याचिका दायर कर सकता है, जो या तो “विलय” को मंजूरी देंगे क्योंकि दो-तिहाई से अधिक आम आदमी पार्टी में शामिल हो चुके हैं, या सात आम आदमी सदस्यों को अयोग्य घोषित कर देंगे। आचार्य ने कहा कि इस फैसले को फिर अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब शिवसेना और एनसीपी के सदस्यों ने पार्टी तोड़कर एनडीए में शामिल होने का फैसला किया, तो चुनाव आयोग (ईसी) ने विधायी बहुमत का हवाला देते हुए अलग हुए गुटों को मूल पार्टी चिन्ह प्रदान किए। इस फैसले के आधार पर पीडीटी आचार्य का मानना है कि यह 10वीं अनुसूची के अनुच्छेद 4 के खिलाफ है।
अध्यक्ष के फैसले का इंतजार
पीडीटी आचार्य ने कहा कि राघव चड्ढा ने कथित तौर पर बीजेपी में विलय की घोषणा कर दी है, इसलिए चुनाव आयोग के पास आम आदमी पार्टी (AAP) के किसी गुट पर निर्णय लेने का अवसर नहीं है, लेकिन अध्यक्ष के फैसले तक दल बदलने वाले सात सांसद आधिकारिक तौर पर AAP के सदस्य बने रहेंगे। आचार्य ने दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 2 (1) (क) का हवाला देते हुए कहा कि सदन के निर्वाचित सदस्य को उस राजनीतिक दल का सदस्य माना जाएगा।
कैसे बढ़ेंगी राघव और उनके साथियों की परेशानी?
ऐसे में अगर वे अध्यक्ष के फैसले के लंबित रहने के दौरान किसी भी विधायी मुद्दे पर एनडीए का समर्थन करते हैं, तो तकनीकी रूप से आम आदमी पार्टी से संबंधित होने के बावजूद उनके सात वोट बीजेपी के 106 वोटों में जुड़ जाएंगे। उच्च सदन में एनडीए की तकनीकी संख्या से अलग किसी मुद्दे पर एनडीए के वोटों की प्रभावी संख्या अब 141 तक चली जाएगी। अगर अध्यक्ष इसे विलय घोषित करते हैं, तो भाजपा की सीटों की संख्या बढ़कर 113 हो जाएगी।
पीडीटी आचार्य का कहना है कि अयोग्यता याचिका लंबित रहने के दौरान यह एक विसंगति भी उत्पन्न होगी। दसवीं अनुसूची के अनुसार पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने पर भी अयोग्यता याचिका दायर की जा सकती है। आचार्य ने कहा कि आप अभी भी राघव चड्ढा समूह को व्हिप जारी कर सकती है और वे इसका उल्लंघन करते रह सकते हैं, और इस आधार पर भी किसी भी अयोग्यता याचिका पर निर्णय लेने का अधिकार अध्यक्ष के पास ही होगा।
दल-बदल कानून का महत्व
अगर दो-तिहाई से कम लोगों ने अपनी निष्ठा बदली तो उस समय के सिनेरियो को समझना भी जरूरी है। उस स्थिति में, दलबदल विरोधी कानून के तहत बागी सदस्यों को एक ही विधानसभा में संख्या के आधार पर अयोग्य घोषित किया जा सकता था।
इस प्रक्रिया में सदन के किसी भी सदस्य को राज्यसभा अध्यक्ष से बागी सदस्यों को दलबदल करने के लिए अयोग्य घोषित करने की याचिका दायर करनी पड़ती। 10वीं अनुसूची में सदन के पीठासीन अधिकारी के लिए दलबदल करने या पार्टी व्हिप की अवहेलना करने के लिए किसी सदस्य की अयोग्यता पर निर्णय लेने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है।
कब हो सकती है न्यायिक समीक्षा
पीठासीन अधिकारी के फैसले की न्यायिक समीक्षा भी उनके फैसले सुनाने के बाद ही होती है, जिसके कारण पीठासीन अधिकारी याचिका पर कोई सुनवाई नहीं करते और अयोग्य घोषित होने के योग्य सदस्य सदन की सदस्यता बरकरार रखते हैं। यह सब तब होता है, जब सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि पीठासीन अधिकारियों को याचिका पर उचित समय सीमा के भीतर निर्णय लेना चाहिए।
2003 का 91वां संविधान संशोधन…
2003 के 91वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने दो काम किए। सबसे पहले इसमें कहा गया कि अयोग्यता की कार्यवाही से बचने के लिए सदन में किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों को दूसरी पार्टी में शामिल होना होगा, जिसे विलय माना जाएगा। यदि सदस्यों की संख्या सदन में उस पार्टी की कुल संख्या के दो-तिहाई से कम है, तो पार्टी बदलने वाले सदस्यों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही शुरू की जा सकती है।
दूसरे, अधिनियम में यह निर्धारित किया गया कि किसी सरकार में मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा या राज्य विधानसभा की कुल संख्या के 15% से अधिक नहीं होगी, और यह भी कहा गया कि बहुत छोटे राज्यों में यह संख्या 12 से कम नहीं होगी।
इस अधिनियम ने 1985 के 52वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के बाद दसवीं अनुसूची को और मजबूत किया, जिसके तहत उपरोक्त अनुसूची को जोड़ा गया था। हालांकि 1985 की दसवीं अनुसूची में सदन में किसी दल के एक तिहाई सदस्यों के विभाजन को वैध माना गया था। इसका भी कई बार दुरुपयोग हुआ, इसलिए 91वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने दसवीं अनुसूची से एक तिहाई के संदर्भ को हटाकर दल-बदल को और कठिन बना दिया, और यह अनिवार्य कर दिया कि अयोग्यता कार्यवाही से बचने के लिए दो तिहाई सदस्यों का दल-बदल आवश्यक होगा।
क्यों बना था दल-बदल कानून?
साल 1960 और 1970 के दशकों में बड़े पैमाने पर हुए दल-बदल के कारण इसे आवश्यक समझा गया था। 1960 के दशक के उत्तरार्ध में बार-बार दल-बदल करने को दर्शाने के लिए “आया राम गया राम” मुहावरा प्रचलित हो गया था। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, 1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल ने एक ही दिन में तीन बार अपनी पार्टी बदली थी।
इंटरनेशनल जर्नल फॉर लीगल रिसर्च एंड एनालिसिस में प्रकाशित ऋत्विक जैन के एक लेख के अनुसार, “1967 और 1972 के चौथे और पांचवें आम चुनावों के बीच लोकसभा और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के लगभग 4,000 सदस्यों में से दल-बदल और प्रतिदल-बदल के लगभग 2,000 मामले सामने आए। मार्च 1971 के अंत तक लगभग 50% विधायकों ने अपनी पार्टी बदल ली थी और उनमें से कई ने एक से अधिक बार पार्टी बदली थी। कुछ ने तो 5 बार तक पार्टी बदली थी।
दल-बदल विरोधी कानून के नकारात्मक पहलू क्या हैं?
दल-बदल के खिलाफ बनाए गए प्रावधानों का उद्देश्य विधायकों की खरीद-फरोख्त को रोकना है, लेकिन इससे विधायक अपनी पार्टी की विचारधारा से मजबूती से बंध जाते हैं। पार्टी के आदेश का उल्लंघन करने पर भी उन्हें अयोग्य घोषित किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्र या राज्य के प्रतिनिधि के रूप में अपनी स्वायत्तता खो देते हैं और पार्टी नेतृत्व के निर्णयों के प्रति पूरी तरह से अधीन हो जाते हैं, जिससे राजनीतिक दलों का केंद्रीकरण होता है।
‘सही आदमी गलत पार्टी में’ राघव चड्ढा ने 7 सांसदों के साथ छोड़ी AAP, BJP में होंगे शामिल

आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा है क्योंकि पार्टी का बड़ा चेहरा रहे राघव चड्ढा ने अपने राज्यसभा के 6 साथियों के साथ AAP छोड़ दी है। राघव के साथ आप छोड़ने वाले साथियों में संदीप पाठक, अशोक मित्तल, विक्रम साहनी, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह और राजिंदर गुप्ता का नाम भी है। पढ़िए पूरी खबर…
