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राफेल डील को सस्ता बताने के लिए CAG ने लगाया क्या गणित, जानिए

कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने यूपीए के शासनकाल में तय कीमत से ज्‍यादा में सौदा तय किया है। वहीं, सीएजी की रिपोर्ट में इसे पूर्व में किए गए करार की तुलना में सस्‍ता बताया गया है। अब ऐसे में सवाल उठता है कि ऑडिट एजेंसी ने किस आधार पर रिपोर्ट तैयार की है।

Author नई दिल्‍ली | February 14, 2019 4:12 PM
एनडीए की सरकार ने भारतीय वायु सेना की डिमांड पर राफेल में अतिरिक्त सुरक्षा उपकरण लगाने के ऑर्डर दिए. जिसके बाद कीमतें काफी बढ़ गईं. ( फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)

राफेल फाइटर जेट डील पर CAG की रिपोर्ट संसद में पेश की जा चुकी है। इसमें मोदी सरकार द्वारा किए गए करार को यूपीए के शासनकाल में की गई डील से 2.86 फीसद सस्‍ता बताया गया है। एनडीए सरकार ने 7.87 बिलियन यूरो (63 हजार करोड़ रुपए) में सौदा तय किया है, जिसके तहत फ्रेंच कंपनी दासॉ एविएशन 36 विमान को फ्लाईअवे कंडीशन (वायुसेना के बेड़े का हिस्‍सा बनने लायक स्थिति) में भारत को मुहैया कराएगी। कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने यूपीए के शासनकाल में तय कीमत से ज्‍यादा में सौदा तय किया है। वहीं, सीएजी की रिपोर्ट में इसे पूर्व में किए गए करार की तुलना में सस्‍ता बताया गया है। अब ऐसे में सवाल उठता है कि ऑडिट एजेंसी ने किस आधार पर रिपोर्ट तैयार की है। दरअसल, भारतीय वार्ताकारों के दल ने 26 दौर की वार्ता के दौरान (मई 2015 और अप्रैल 2016) फाइटर जेट की तीन कीमतों पर विचार किया गया था, जिसके बाद एक बेंचमार्क कॉस्‍ट तय की गई थी। इसके तहत अधिकतम कीमत 5.06 बिलियन यूरो (40,498 करोड़ रुपए) तय की गई थी। सीएजी ने बेंचमार्क प्राइस को ‘वास्‍तविकता से बेहद कम’ बताते हुए खारिज कर दिया।

भारतीय वार्ताकारों ने फ्रांसीसी समकक्ष और दासॉ एविएशन के प्रतिनिधियों के साथ एलाइंड प्राइस (वह कीमत जिसपर किसी भी वस्‍तु को हासिल किया जा सकता है) पर भी चर्चा की थी। इसका आधार दासॉ द्वारा वर्ष 2007 में 126 विमानों की खरीद (8.20 बिलियन यूरो या 65,630 करोड़ रुपया) के लिए दिया गया प्रस्‍ताव था। इसके अलावा फ्रेंच कंपनी ने वर्ष 2016 में अंतिम ऑफर (7.87 बिलियन यूरो या 63 हजार करोड़ रुपए) दिया था, जिसके तहत 36 विमानों की खरीद के लिए करार पर हस्‍ताक्षर किया गया। दिलचस्‍प है कि अंतिम ऑफर में बैंक गारंटी को शामिल ही नहीं किया गया था। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में भी इसका उल्‍लेख किया है। हालांकि, भारतीय वार्ताकारों द्वारा तय एलाइंड कॉस्‍ट में बैंक गारंटी को भी शामिल किया गया था। दल के तीन सदस्‍यों ने इसपर आपत्ति जताई थी और कहा था कि इसकी वजह से दासॉ की ओर वर्ष 2016 में दिया गया ऑफर 5.3 फीसद तक महंगा हो गया।

विभिन्‍न पहलुओं पर विचार कर तय हुई थी बेंचमार्क प्राइस: रफाल लड़ाकू विमान खरीद को लेकर बेंचमार्क प्राइस तय की गई थी। वार्ताकार दल के सदस्‍यों ने विभिन्‍न पहलुओं को ध्‍यान में रखते हुए इसे निर्धारित किया था। इसमें वर्ष 2011 में 126 विमानों की खरीद को लेकर लगाई गई बोली से जुड़े तथ्‍य भी शामिल थी। इसमें यूरोफाइटर टाइफून की निर्माता कंपनी ईएडीएस के प्रस्‍ताव से जुड़े तथ्‍य भी शामिल थे। मौजूदा प्रक्रिया के तहत किसी भी कांट्रैक्‍ट को फाइनल रूप देने के लिए बेंचमार्क प्राइस पर ही विचार किया जाता है। हालांकि, इस मामले में प्रधानमंत्री की अध्‍यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्‍योरिटी ने एलाइंड कॉस्‍ट पर डील को हरी झंडी दी थी।

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