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जनसत्ता संवादः चावल के दाने से भी छोटा रडार

भारतीय वैज्ञानिकों ने अब चावल के दाने से भी छोटी चिप पर एक ऐसा रडार विकसित किया है, जो दीवार के पार रखी चीजों को भी आसानी से पकड़ लेगा।

Author Published on: February 11, 2020 3:22 AM
इस चिपनुमा रडार का इस्तेमाल रक्षा के क्षेत्र में किया जा सकता है। इसके अलावा परिवहन, स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र में भी यह उपयोगी है। यहपरिवहन के क्षेत्र में इसे ऑटोमोटिव रडार के रूप में वाहन में इस्तेमाल किया जा सकता है।

भारतीय वैज्ञानिकों ने चावल के दाने से भी छोटी चिप पर एक ऐसा रडार विकसित किया है, जिससे दीवार के आर-पार की गतिविधियों की भी जानकारी मिल सकती है। इससे शोध से पुलिसकर्मियों, दमकलकर्मियों और सुरक्षा बलों को आपात स्थितियों से निपटने में मदद मिल सकती है। भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलुरु के वैज्ञानिकों ने थ्रू-द-वॉल रडार (टीडब्ल्यूआर) विकसित किया है। इस रडार को विकसित करने का श्रेय भारतीय विज्ञान संस्थान के इलेक्ट्रिकल कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गौरव बनर्जी और उनके शोध दल को जाता है। इस रडार को बनाने में पांच साल लगे।

शोधकर्ताओं ने बताया कि सिमॉस (कॉम्पलिमेंट्री मेटल ऑक्साइड सेमीकंडक्टर) टेक्नोलॉजी की मदद से यह रडार बनाया गया है। इसकी खासियत है कि यह दीवार के पार रखी चीज का पता लगा सकता है। यह संबंधित वस्तु की दूरी, उसकी गति और आकार का पता लगा सकता है। यह रक्षा क्षेत्र से लेकर कृषि, स्वास्थ्य और परिवहन समेत विभिन्न क्षेत्रों में उपयोगी हो सकता है। डॉ बनर्जी ने इस प्रौद्योगिकी को देश की बड़ी उपलब्धि बताया है। उन्होंने बताया, ‘दुनिया के कुछ मुट्ठी भर देशों के पास ही आज किसी रडार के पूरे इलेक्ट्रॉनिक्स को एक चिप पर स्थापित करने की क्षमता है।’

गौरव बनर्जी ने बताया कि रडार बनाने का काम 2015 में शुरू किया गया था। रडार की डिजाइनिंग को लेकर दो साल तक शोध किया गया। इसके बाद इसे प्रधानमंत्री के ‘इम प्रिंट प्रोग्राम’ की मदद मिली। 2017 में केंद्र सरकार से आर्थिक मदद मिलने के बाद रिसर्च एंड डेवलपमेंट में समय लगा। 2019 के जनवरी में चिप की डिजाइन को अंतिम रूप देकर इसे बनने के लिए ताइवान भेजा गया। छह माह में यह बनकर आया। फिर छह माह इसके परीक्षण में लगे। जनवरी 2020 के अंत में सिमॉस चिप रडार को फाइनल किया गया। सिमॉस टेक्नोलॉजी से बने इस रडार में एक ट्रांसमीटर, तीन रिसीवर और एक उन्नत फ्रीक्वेंसी सिंथेसाइजर लगाया गया है। डॉ बनर्जी ने बताया, ‘रडार डिजाइन के मामले में टीडब्ल्यूआर इमेजिंग हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है।’

इसकी वजह यह है कि दीवारों से गुजरते हुए संकेत मंद पड़ जाते हैं। अधिक आवृत्तियों से युक्त रेडियो तरंगें इस चुनौती को हल करने में उपयोगी हो सकते हैं, जिसे डिजाइन करना एक जटिल कार्य है। इस तरह के रडार में खास तरह के चर्प संकेतों का उपयोग होता है, जिसमें माइक्रोवेव ट्रांसमीटर, एक रिसीवर और एक आवृत्ति सिंथेसाइजर जैसे अनुकूलित इलेक्ट्रॉनिक्स की आवश्यकता होती है। इन सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को एक छोटे चिप के रूप में बदलना एक बड़ी चुनौती थी। इसी कारण इस रडार को बनने में समय लग गया। शोधकर्ताओं का कहना है कि छोटा आकार होने के कारण इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर आसानी से किया जा सकता है।

रडार किसी चीज से संकेतों के टकराकर लौटने के सिद्धांत पर काम करते हैं और इनका उपयोग करते समय संकेतों के लौटने में लगने वाले समय का आकलन किया जाता है। इस तरह के संकेतों के आधार पर वस्तु या इंसान का एक खाका तैयार किया जा सकता है और यह निर्धारित करने में भी मदद मिल सकती है कि वह वस्तु किस गति से चलायमान है। टीडबल्यूआर तकनीक आम रडार से एक कदम आगे की चीज है, जो रेडियो तरंगों के जरिए दीवारों को भेदने के सिद्धांत पर काम करती है, जिसे प्रकाश की किरणें भेद नहीं पाती हैं।

इस चिपनुमा रडार का इस्तेमाल रक्षा के क्षेत्र में किया जा सकता है। इसके अलावा परिवहन, स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र में भी यह उपयोगी है। यहपरिवहन के क्षेत्र में इसे ऑटोमोटिव रडार के रूप में वाहन में इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही भविष्य में यह एडवांस ड्राइवर असिस्टेंट सिस्टम यानी ऑटोमेटिक कार को भी मजबूती देगा। इसके अलावा कृषि क्षेत्र और पशुपालन में भी इससे लोगों को मदद मिलेगी। रडार के जरिए जानवरों के बीच होनेवाली बीमारी और पौधे के तेजी से नष्ट होने के कारण का पता लगाया जा सकता है। जानवरों में होनेवाली बीमारी का यह रडार एक साथ सैकड़ों जानवर की हृदय गति और श्वसन तंत्र का मेजरमेंट कर पता लगा सकेगा। वर्तमान में इस रडार को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) के साथ जोड़ने की प्रक्रिया चल रही है। यह अध्ययन केंद्र सरकार के इम्प्रिंट कार्यक्रम, मानव संसाधन विकास मंत्रालय और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के अनुदान पर आधारित है।

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