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UP में अध्यक्ष चुनने में भाजपा को आए पसीने

उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष तय करने में भाजपा के पसीने छूट रहे हैं। राज्य में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर नए अध्यक्ष की भूमिका अहम होगी। मौजूदा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी का तीन साल का कार्यकाल खत्म हो चुका है।

Author नई दिल्ली | February 2, 2016 02:27 am

उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष तय करने में भाजपा के पसीने छूट रहे हैं। राज्य में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर नए अध्यक्ष की भूमिका अहम होगी। मौजूदा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी का तीन साल का कार्यकाल खत्म हो चुका है। अमित शाह ने राष्ट्रीय अध्यक्ष की अपनी कुर्सी को सलामत रखने के लिए अपना चुनाव पहले करा लिया। जबकि कायदे से राज्यों के संगठन चुनाव पहले होने चाहिए थे। कुछ राज्यों में अभी भी भाजपा का संगठन चुनाव बाकी है और यूपी भी इसी श्रेणी में है।

सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश से जुड़े हर फैसले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दिलचस्पी ले रहे हैं। आखिर वे लोकसभा में इसी सूबे की वाराणसी सीट की नुमाइंदगी जो कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने निर्णय प्रक्रिया में गृहमंत्री राजनाथ सिंह को तरजीह दी है। पिछले हफ्ते उन्होंने राजनाथ सिंह को अपने घर पर बुला कर काफी देर तक मंत्रणा भी की थी। बिहार से सबक लेकर पार्टी में उत्तर प्रदेश का नया अध्यक्ष पिछड़े तबके के किसी नेता को बनाने पर सहमति बन रही है। आरएसएस की राय भी ऐसी ही बताई जाती है। यह बात अलग है कि लक्ष्मीकांत वाजपेयी भी अपने लिए एक और मौका चाहते हैं और वे इसके लिए दिल्ली में केंद्रीय नेताओं से अपनी लाबिंग भी कर रहे हैं।

पिछड़े नेताओं में पार्टी की पहली पसंद बरेली के विधायक धर्मपाल सिंह बन रहे हैं। वे पिछड़ी लोध जाति के हैं। संगठन और सरकार दोनों का उन्हें खासा अनुभव है। चार बार से लगातार विधानसभा चुनाव जीतते रहे हैं और फिलहाल सदन में पार्टी के उपनेता भी हैं। वाजपेयी की टीम में वे पार्टी के महासचिव हैं। जबकि इससे पहले उपाध्यक्ष भी रहे हैं। भाजपा में अध्यक्ष पद उसी नेता को देने की परंपरा है जो पार्टी में दूसरे पदों पर भी रह चुका हो। धर्मपाल सिंह मायावती और भाजपा की साझा सरकारों से लेकर कल्याण सिंह, रामप्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह की सरकार में भी मंत्री रहे हैं। लेकिन धर्मपाल सिंह के नाम पर कल्याण सिंह सहमत नहीं बताए जा रहे। कल्याण सिंह की बेशक राजस्थान के राज्यपाल होने के नाते इस समय पार्टी की किसी निर्णय प्रक्रिया में औपचारिक तौर पर कोई भूमिका नहीं है। पर सूबे के कद्दावर नेताओं में उनकी गिनती तो होती ही है।

कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह इस समय एटा से लोकसभा सदस्य हैं। उमा भारती भी कल्याण सिंह की तरह लोध ही हैं। वे हैं तो मध्यप्रदेश की पर इस समय लोकसभा में यूपी की झांसी सीट की नुमाइंदगी कर रही हैं। धर्मपाल सिंह के अलावा अध्यक्ष की दौड़ में पिछड़ी कुशवाहा जाति के सांसद केशव मौर्य, एमएलसी और पिछड़ी कुर्मी जाति के स्वतंत्र देव सिंह व केंद्रीय मंत्री और आगरा के दलित नेता कठेरिया भी शामिल बताए जा रहे हैं। कठेरिया का नाम बढ़ाने वालों का तर्क है कि इससे मायावती के मुकाबले दलितों में सकारात्मक संदेश जाएगा। कल्याण सिंह और उमा भारती ने पार्टी अध्यक्ष को परोक्ष रूप से संदेश दे दिया बताते हैं कि उनके कारण लोध तो पहले से ही भाजपा से जुड़े हैं।

लिहाजा पिछड़े तबके की किसी दूसरी जाति के नेता को अध्यक्ष बनाने से ज्यादा लाभ हो सकता है। उधर धर्मपाल सिंह के पैरोकारों का तर्क है कि कल्याण सिंह के सक्रिय राजनीति से दूर हो जाने के कारण पार्टी के लोध वोट बैंक को धर्मपाल सिंह ही संभाल सकते हैं। वे गुटबाजी से दूर हैं और जमीनी स्तर से सियासत की है। पार्टी में मंडल अध्यक्ष और क्षेत्रीय अध्यक्ष जैसे दायित्व निभाए हैं तो ब्लाक प्रमुख भी रह चुके हैं। पिछड़े तबके के होने के बावजूद अगड़ों में भी उनकी स्वीकार्यता है।

विधानसभा चुनाव को देखते हुए राज्य में पार्टी अध्यक्ष के फैसले में हो रही देरी पार्टी के लिए नुकसानदेह मानी जा रही है। पिछले दो महीने से राज्य में पार्टी की गतिविधियां संगठन चुनाव तक ही सिमटी हैं। जबकि अखिलेश सरकार के खिलाफ मायावती अचानक मुखर हुई हैं। जबकि भाजपा अभी सूबे में अपना नया नेता तक ही तय नहीं कर पा रही। पार्टी महासचिव अरुण सिंह का कहना था कि अध्यक्ष अमित शाह अभी राज्य में हर स्तर पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। प्रभारी ओम माथुर और चुनाव अधिकारी की राय से अध्यक्ष का चुनाव यूपी में जल्द ही पूरा हो जाएगा।

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