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वक्त की नब्ज़: अमर्त्य सेन की मानसिकता पर सवाल

लोकसभा चुनाव के समय भी डॉक्टर साहिब ने खुल कर मोदी के खिलाफ प्रचार किया था, इस आधार पर कि जिस व्यक्ति ने गुजरात में हुए 2002 वाले दंगों में मुसलमानों का कत्लेआम

Author July 12, 2015 2:07 PM
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रोफेसर अमर्त्य सेन। (फाइल फोटो)

इसलिए कि मुझे विश्वास है कि भारत के पिछड़ेपन का मुख्य कारण है वह मानसिकता जो नेहरूजी के समाजवाद से पैदा हुई। मैं वामपंथी बुद्धिजीवियों का विरोध करने का मौका कभी नहीं छोड़ती हूं। इस हफ्ते मुझे मौका दिया है वामपंथी विचारधारा के महान पंडित डॉक्टर अमर्त्य सेन ने। डॉक्टर सेन वतन लौटे हैं इस बार अपनी नई किताब का प्रचार करने। इस सिलसिले में पत्रकारों से भेंट करते हुए उन्होंने दोहराया कि उनकी नजरों में नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री होने के काबिल नहीं हैं।

लोकसभा चुनाव के समय भी डॉक्टर साहिब ने खुल कर मोदी के खिलाफ प्रचार किया था, इस आधार पर कि जिस व्यक्ति ने गुजरात में हुए 2002 वाले दंगों में मुसलमानों का कत्लेआम होने दिया उसको कोई हक नहीं होना चाहिए अपने इस ‘सेकुलर’ देश के मुखिया बनने का। इस बार भी डॉक्टर सेन ने यही एतराज जताया लेकिन उनसे किसी ने यह नहीं पूछा कि क्या यही बात उन्होंने कभी राजीव गांधी के बारे में कही थी?

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डॉक्टर सेन गर्व से कहते हैं कि वह भारत के नागरिक हैं लेकिन अपना ज्यादा समय बिताते हैं विदेशों में, सो शायद 1984 में भारत में नहीं थे जब दिल्ली की सड़कों पर तीन दिन तक लावारिस पड़ी रहीं सिखों की लाशें। ऐसा कत्लेआम था वह कि तीन हजार से ज्यादा सिख मारे गए तीन दिनों में, सो दिल्ली शहर के मुर्दाघरों में जगह नहीं रही। लाशों को सड़कों पर ही जलाया गया कूड़े की तरह। बाद में राजीव गांधी ने इस हिंसा को जायज यह कह कर कहा कि ‘बड़ा दरख्त गिरता है तो धरती हिलती है।’

क्या डॉक्टर सेन ने कभी कहा है कि राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनने का कोई हक नहीं था? राजीव गांधी के दौर में कत्लेआम मुसलमानों के भी हुए थे। भागलपुर में 1989 वाले दंगे में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे जिसमें 900 मुसलमान थे। मेरठ के हाशिमपुरा इलाके से 1987 वाले दंगे के दौरान पुलिसवालों ने कोई 100 मुसलमानों को गिरफ्तार किया और गंग नगर के किनारे ले जाकर ट्रक के अंदर ही उनको गोलियों से भून दिया। उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी के थे और प्रधानमंत्री भी।

डॉक्टर सेन कई बार कह चुके हैं कि उनकी राय में गुजरात मॉडल कुछ भी नहीं है केरल मॉडल के सामने। इसलिए कि केरल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में गुजरात से कहीं आगे है। लेकिन क्या डॉक्टर साहिब ने इस बात पर कभी कोई बयान दिया है कि केरल के अंदर एक जहरीला किस्म का इस्लाम फैल रहा है पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया नाम की संस्था के जरिए?

इसी संस्था के कुछ कट्टरपंथी मुसलमानों ने 2010 में प्रोफेसर टीजे जोसेफ का हाथ काट डाला था क्योंकि उनकी कट्टरपंथी नजरों में इस बदकिस्मत प्रोफेसर ने इस्लाम के रसूल की बे-अदबी की थी। बे-अदबी क्या? परीक्षा के एक सवाल में रसूल का नाम लिया गया था। क्या डॉक्टर सेन की तरफ से कोई बयान आया उस समय कि अपने इस ‘सेकुलर’ देश में ऐसी बातें नहीं होनी चाहिए?

डॉक्टर सेन की दूसरी शिकायत मोदी सरकार के खिलाफ यह है कि शिक्षा के क्षेत्र में कई वामपंथी बुद्धिजीवियों को हटाया जा रहा है और उनकी जगह बिठाए जा रहे हैं संघी सोच के लोग। यहां डाक्टर सेन की बात सही भी है और गलत भी। वामपंथी बुद्धिजीवियों का हटाना सही है इसलिए कि इनमें कई ऐसे हैं जिन्होंने इतिहास को बदलने की कोशिश की है। यानी यह भी मानने को तैयार नहीं हैं कि मुसलिम हमलावरों ने भारत में आने के बाद मंदिर तोड़े थे और नालंदा विश्वविद्यालय जैसे महान शिक्षा केंद्रों को तबाह किया था।

डॉक्टर सेन, चांसलर थे नए नालंदा विश्वविद्यालय के, मोदी सरकार के आने तक तो जरूर जानते होंगे कि नालंदा की वेबसाइट में जो इस प्राचीन विश्वविद्यालय का इतिहास दिया गया है उसमें उसकी बर्बादी का कारण विदेशी हमलावर बताया गया है मुसलिम हमलावर नहीं। सो वामपंथी इतिहासकारों को बदलना जरूरी है लेकिन उनकी जगह संघी प्रचारकों को बैठाना बेवकूफी है। उनकी जगह आने चाहिए ऐसे विद्वान, ऐसे पंडित, जो नया सोच ला सकें।

डॉक्टर अमर्त्य सेन को यह भी शिकायत है मोदी सरकार से कि शिक्षा और स्वास्थ्य की आम सेवाओं में उन्होंने निवेश कम किया है। ठीक है यह बात। निवेश बढ़ाना चाहिए कम करना गलत है। लेकिन सोनिया-मनमोहन सरकार के सलाहकार होने के नाते डाक्टर सेन ने क्यों नहीं उनको सुझाव दिया कभी कि इन क्षेत्रों में नई नीतियां बननी चाहिए।

इसलिए कि सरकारी स्कूलों में जो इस देश के बच्चे पढ़ने पर मजबूर हैं वह इतने अशिक्षित निकलते हैं स्कूलों से कि अक्सर बच्चों की किताबें नहीं पढ़ पाते हैं इतिहास की किताबें तो दूर की बात। इतनी बेहाल है इस देश की शिक्षा कि हमारे बच्चे जब अंतरराष्ट्रीय स्तर की पीआईएसए नाम की परीक्षा में हिस्सा लेने गए थे तो सबसे नीचे आए थे। सिर्फ किर्गिस्तान के बच्चे उनसे पीछे रहे।

इसका भी दोष मैं देती हूं नेहरूजी के समाजवाद को। अन्य समाजवादी देशों में कुछ और हो न हो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में पश्चिम लोकतांत्रिक मुल्कों से भी आगे थे। समाजवादी नीतियों का दस्तूर है कि आम आदमी को बेहतरीन आम सेवाएं उपलब्ध करवाई जाएं तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हुआ?

समस्या यह है हमारी कि मोदी सरकार के आने के बाद भी इन क्षेत्रों में कोई परिवर्तन नहीं दिख रहा है अभी तक। परिवर्तन तब आ पाएगा जब मानव संसाधन विकास मंत्रालय को समाप्त करके उसकी जगह वापिस पुनर्जीवित किया जाए शिक्षा मंत्रालय। शिक्षा में हमारे बच्चे पीछे रहेंगे जब तक तब तक भारत दुनिया के देशों में पीछे ही रहेगा।

(तवलीन सिंह)

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