पंजाब में राष्ट्रपति शासन की कहानी भारत के संवैधानिक इतिहास का एक अनूठा और अशांत अध्याय है। पंजाब में 8 बार राष्ट्रपति शासन लगा है जो भारत के किसी भी राज्य में सबसे ज्यादा बार लगने वाले राष्ट्रपति शासन के मामलों में से एक है। पंजाब अब तक कुल 3510 दिनों तक राष्ट्रपति शासन के अधीन रहा है। 1951 से 1992 के बीच राज्य में कुल 8 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया। 1951 से 1992 के बीच पंजाब ने आठ बार राष्ट्रपति शासन देखा। यानी करीब 41 साल के इस दौर में लगभग हर पांच साल में एक बार राज्य केंद्र के सीधे नियंत्रण में चला गया।

1987 से 1992 के बीच पंजाब लगातार पांच साल तक राष्ट्रपति के नियंत्रण में रहा। राज्य में सबसे पहले साल 20 जून 1951 में पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा था। इन आठ घटनाओं के पीछे हर बार वजह एक जैसी नहीं थी। कभी राजनीतिक अस्थिरता, कभी राज्य के पुनर्गठन की प्रक्रिया, कभी केंद्र और राज्य के बीच टकराव तो कभी आतंकवाद और बिगड़ती कानून-व्यवस्था इसके कारण बने। जानते हैं पंजाब में राष्ट्रपति शासन की पूरी टाइमलाइन…

राष्ट्रपति शासन क्या होता है?

संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत जब किसी राज्य में संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार सरकार चलाना संभव नहीं रह जाता, तब राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है। इस दौरान राज्य की कार्यपालिका केंद्र सरकार के अधीन आ जाती है और विधानसभा को निलंबित या भंग किया जा सकता है।

पहली बार: (20 जून 1951 – 17 अप्रैल 1952)

यह आजाद भारत के इतिहास का सबसे पहला राष्ट्रपति शासन था। खास बात यह थी कि उस समय कांग्रेस के पास विधानसभा में स्पष्ट बहुमत था। लेकिन मुख्यमंत्री गोपी चंद भार्गव और उनके प्रतिद्वंद्वी भीम सेन सच्चर के बीच आंतरिक गुटबाजी इतनी बढ़ गई कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को हस्तक्षेप करना पड़ा। नेहरू के निर्देश पर भार्गव ने इस्तीफा दिया और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। राष्ट्रपति शासन 302 दिन तक चला था।

दूसरी बार: (05 जुलाई 1966 – 01 नवंबर 1966)

यह दौर पंजाब के पुनर्गठन (Reorganization) का था। ‘पंजाबी सूबा आंदोलन’ अपने चरम पर था और भाषाई आधार पर पंजाब को बांटकर हरियाणा को अलग राज्य बनाने की तैयारी चल रही थी। इस प्रशासनिक बदलाव और सीमा निर्धारण की प्रक्रिया को ठीक तरह से पूरा करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री राम किशन की सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। इस बार राष्ट्रपति शासन की अवधि 119 दिन थी।

तीसरी बार: 23 अगस्त 1968 – 17 फरवरी 1969

1967 के चुनावों के बाद पंजाब में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार (जस्टिस गुरनाम सिंह के नेतृत्व में यूनाइटेड फ्रंट) बनी थी। लेकिन कांग्रेस ने जोड़-तोड़ कर लक्ष्मण सिंह गिल को तोड़ लिया और उन्हें बाहर से समर्थन देकर सीएम बना दिया। कुछ ही महीनों में कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया जिससे सरकार गिर गई। कोई भी दल वैकल्पिक सरकार बनाने की स्थिति में नहीं था जिसके बाद मध्य अवधि चुनाव कराने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया। तीसरी बार पंजाब में 178 दिनों के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया।

चौथी बार: 13 जून 1971 – 17 मार्च 1972 (277 दिन)

युवा नेता प्रकाश सिंह बादल पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन अकाली दल के भीतर ही आंतरिक कलह शुरू हो गई। गुरनाम सिंह के गुट ने बगावत कर दी। दल-बदल और राजनीतिक अनिश्चितता को देखते हुए राज्यपाल की सिफारिश पर विधानसभा भंग कर दी गई और राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। पंजाब में लगा यह राष्ट्रपति शासन कुल 277 दिनों के लिए था।

पांचवीं बार: 30 अप्रैल 1977 – 20 जून 1977 (51 दिन)

यह विशुद्ध रूप से देश की राष्ट्रीय राजनीति का असर था। 1977 में केंद्र में आपातकाल (Emergency) खत्म होने के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। केंद्र सरकार ने एकमुश्त फैसला लेते हुए पंजाब सहित नौ राज्यों की कांग्रेस सरकारों को सिर्फ इसलिए बर्खास्त कर दिया क्योंकि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस हार चुकी थी और केंद्र का मानना था कि ये सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इस बार पंजाब में 51 दिनों के लिए राष्ट्रपति शासन लगा।

छठी बार: 17 फरवरी 1980- 6 जून 1980 (अवधि 110 दिन)

इतिहास ने खुद को दोहराया। 1980 में इंदिरा गांधी भारी बहुमत के साथ दोबारा देश की प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने ठीक वही रणनीति अपनाई जो 1977 में जनता पार्टी ने अपनाई थी। इंदिरा गांधी ने पंजाब की प्रकाश सिंह बादल सरकार समेत गैर-कांग्रेसी सरकारों को बर्खास्त कर दिया और राज्य में नए सिरे से चुनाव कराए गए। छठी बार लगे राष्ट्रपति शासन की अवधि कुल 110 दिन थी।

सातवीं बार: 6 अक्टूबर 1983 – 29 सितंबर 1985 (1 वर्ष 354 दिन)

1980 के दशक की शुरुआत में पंजाब में अलगाववाद और उग्रवाद (खालिस्तान आंदोलन) ने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। जरनैल सिंह भिंडरावाले के उभार और लगातार बढ़ती हिंसक घटनाओं के बीच कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी। कपूरथला के पास एक बस में हिंदू यात्रियों की हत्या के बाद, मुख्यमंत्री दरबारा सिंह ने खुद इस्तीफा दे दिया (या उनसे दिलवाया गया) और केंद्र ने सुरक्षा बलों को खुली छूट देने के लिए सीधे कमान अपने हाथ में ले ली। इसी दौर में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ भी हुआ। इस बार 1 साल 354 दिनों के लिए पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा।

आठवीं और सबसे लंबी अवधि: 11 मई 1987 – 25 फरवरी 1992 (4 वर्ष 259 दिन)

1985 के राजीव-लौंगोवाल समझौते के बाद राज्य में चुनाव हुए और सुरजीत सिंह बरनाला के नेतृत्व में अकाली दल की सरकार बनी। लेकिन उग्रवाद थमा नहीं था। केंद्र सरकार (राजीव गांधी) का आरोप था कि बरनाला सरकार उग्रवादियों पर लगाम लगाने में नाकाम रही है और राज्य पुलिस के भीतर भी मिलीभगत है।

स्थिति इतनी गंभीर थी कि संसद ने संविधान संशोधन के जरिए पंजाब में राष्ट्रपति शासन को सामान्य सीमा से आगे बढ़ाने का रास्ता बनाया। आखिरकार फरवरी 1992 में विधानसभा चुनाव हुए और निर्वाचित सरकार ने सत्ता संभाली। राष्ट्रपति शासन की यह अवधि करीब पांच साल तक रही जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे लंबे राष्ट्रपति शासनों में से एक मानी जाती है। इस बार राष्ट्रपति शासन की कुल अवधि 4 वर्ष 259 दिन थी।

सिर्फ सरकार बदलने की कहानी नहीं राष्ट्रपति शासन

पंजाब में राष्ट्रपति शासन की कहानी केवल आठ बार सरकार बदलने की कहानी नहीं है। यह राज्य की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों, केंद्र-राज्य संबंधों, गठबंधन राजनीति, 1966 के पुनर्गठन और 1980 के दशक के आतंकवाद जैसे दौर की भी कहानी है। शुरुआत के वर्षों में राष्ट्रपति शासन मुख्यतः राजनीतिक अस्थिरता का परिणाम था जबकि बाद के वर्षों में यह राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ा असाधारण कदम बन गया।

यही वजह है कि पंजाब का यह दौर भारतीय संघीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में गिना जाता है। इसलिए पंजाब का इतिहास केवल ‘आठ बार राष्ट्रपति शासन’ का रिकॉर्ड नहीं बल्कि भारतीय संघवाद, लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा के बदलते स्वरूप का आईना भी है।