Punjab Politics: असम के डिब्रूगढ़ में सलाखों में कैद लोकसभा सांसद अमृतपाल सिंह की पार्टी ‘वारिस पंजाब दे’ इन दिनों एक गंभीर राजनीतिक उलझन से जूझ रही है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने राजनीतिक और वैचारिक दायरे का विस्तार कैसे करे, साथ ही उस वर्ग को भी अपने साथ कैसे जोड़े रखे जिसके बीच खालिस्तान के प्रति समर्थन अभी भी खुलकर दिखाई देता है। पार्टी के लिए समस्या ये भी है कि अमृतपाल जेल में हैं और अगले कुछ महीनों में विधानसभा के चुनाव हैं।
पार्टी में विस्तार और विचार को लेकर अंतर्विरोध तब और गहरा गया जब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के पूर्व अधिकारी निरंजन सिंह ने सार्वजनिक रूप से खालिस्तान का विरोध करने के बाद महज चार दिन में ही पार्टी से नाता तोड़ लिया। इस घटना ने एक बार फिर उस वैचारिक खींचतान को उजागर कर दिया है, जिसे पार्टी अपनी स्थापना के समय से ही संभालने की कोशिश कर रही है।
अमृतपाल सिंह की राजनीतिक विरासत
यह पूरी राजनीतिक स्थिति उस समय से शुरू हुई जब खड़ूर साहिब से लोकसभा सांसद अमृतपाल सिंह ने साल 2024 के आम चुनाव में एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में बड़ी जीत दर्ज की थी। अमृतपाल सिंह वर्तमान में डिब्रूगढ़ जेल में बंद हैं और उन्होंने खालिस्तान के समर्थन को लेकर कभी कोई संकोच नहीं दिखाया है, हालांकि पार्टी की मुख्यधारा की गतिविधियां ज्यादातर नशा मुक्ति और अन्य सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रही हैं।
चुनाव जीतने के बाद ही परिवार और पार्टी के भीतर मतभेद सामने आने लगे थे, जब जुलाई 2024 में उनकी मां बलविंदर कौर ने उन्हें खालिस्तान का समर्थक मानने से इनकार किया था, जिसका अमृतपाल ने तुरंत खंडन किया था। पूर्व ईडी अधिकारी निरंजन सिंह के पार्टी में आने और तुरंत इस्तीफा देने से यह साफ हो गया कि पार्टी की मुख्यधारा की छवि और उसकी वैचारिक जड़ों के बीच तालमेल बिठाना आसान नहीं है।
अकाली दल (अमृतसर) का अनुभव और वैचारिक प्रतीक
इस राजनीतिक परिदृश्य को समझने के लिए शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के सफर को भी देखना जरूरी है। सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व वाली यह पार्टी खुलकर खालिस्तान के मुद्दे पर चुनाव लड़ती रही है, लेकिन वह एक सीमित चुनावी दायरे से बाहर निकलने में संघर्ष करती नजर आई है।
वहीं, ‘वारिस पंजाब दे’ के प्रचार और रैलियों में जरनैल सिंह भिंडरावाले, सिख अलगाववादी और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसपाल सिंह खालड़ा की तस्वीरें और प्रतीक लगातार दिखाई देते हैं। हालांकि, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भिंडरावाले का नाम केवल खालिस्तान समर्थक दलों तक सीमित नहीं है, क्योंकि मुख्यधारा के कई अन्य राजनीतिक दल और नेता भी समय-समय पर उनका उल्लेख करते रहे हैं।
‘खालसा राज’ और संविधान पर पार्टी का पक्ष
इन विवादों और चुनौतियों के बीच पार्टी के प्रवक्ता और हिंदू नेता गंगवीर सिंह राठौर ने पार्टी के रुख का खुलकर बचाव किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द “खालसा राज” भारतीय संविधान के बिल्कुल अनुकूल है और इसका अर्थ न्यायपूर्ण शासन तथा जन कल्याण से है।
राठौर ने तर्क दिया कि “राज करेगा खालसा” सदियों से सिख अरदास का हिस्सा रहा है और 1947 के बाद इस ऐतिहासिक विचार को गलत तरीके से देखा गया। उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल का हवाला देते हुए कहा कि वहां सभी धर्मों के लोग सौहार्द के साथ रहते थे। पार्टी का दावा है कि वह केवल संवैधानिक ढांचे के भीतर रहकर काम करती है और उसका उद्देश्य विभिन्न विचारधाराओं के लोगों को बिना किसी नफरत के एक मंच पर लाना है।
चुनावी भविष्य और जनता के बीच भ्रम की स्थिति
अमृतपाल सिंह की लोकसभा जीत ने यह साबित कर दिया था कि एक खास वर्ग के बीच उनका प्रभाव मजबूत है, लेकिन निरंजन सिंह जैसे प्रशासनिक और नए चेहरों के जुड़ने और हटने से पार्टी के व्यापक विस्तार के दावों पर सवाल खड़े होते हैं।
पार्टी के सामने अब यह तय करने की बड़ी चुनौती है कि वह एक संप्रभुतावादी या कट्टर छवि वाली पार्टी के रूप में सीमित रहे या फिर एक ऐसी मुख्यधारा की राजनीतिक ताकत बने जो समाज के सभी वर्गों और अलग-अलग विचारों के नेताओं को अपने साथ जोड़ सके। आगामी समय में पंजाब की राजनीति में इस वैचारिक संतुलन को साध पाना ही ‘वारिस पंजाब दे’ के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करेगा।
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