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पंजाब में बनी चौथे मोर्चे की जमीन, नवजोत सिंह सिद्धू और परगट सिंह ने बनाई पार्टी

नवजोत सिंह सिद्धू और परगट सिंह ने नई पार्टी का नाम आवाज-ए-पंजाब रखा है।
Author September 2, 2016 16:45 pm
नवजोत सिंह सिद्धू (बाएं) और परगट सिंह की फाइल फोटो।

पूर्व हॉकी खिलाड़ी और अकाली दल के नेता परगट सिंह ने शुक्रवार (2 सितंबर) को “अावाज-ए-पंजाब” नामक राजनीतिक पार्टी के गठन की घोषणा की। परगट ने अपनी, पूर्व बीजेपी सांसद नवजोत सिंह सिद्धू और अकाली दल के विधायक बंधुओं सिमरजीत सिंह बैंस एवं बलविंदर सिंह बैंस की तस्वीर वाला एक पोस्टर अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है। इसी के साथ राज्य में अकाली दल-बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के खिलाफ एक चौथा मोर्चा बनने की जमीन तैयार हो गई है।

पंजाब में अगले साल विधान सभा चुनाव होने हैं और राज्य में शिरोमणी अकाली दल और बीजेपी गठबंधन की सरकार है। कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी है, तो संसदीय चुनाव में पहली बार पंजाब से अपना खाता खोलने वाली आम आदमी पार्टी तीसरे विकल्प के लिए खुद को पेश कर रही है। ज्यादातर राजनीतिक जानकार राज्य में इन्हीं दलों के बीच मुख्य मुकाबला मान रहे हैं। लेकिन कहा जाता है कि राजनीति संभावनाओं को साधने की कला है और शायद यही वजह है कि पंजाब के राजनीतिक फिजा में एक चौथा गुल खिलता नजर आ रहा है। जी हां, स्थानीय मीडिया की मानें तो अलग-अलग दलों के बागी या असंतुष्ट नेता पंजाब में चौथा मोर्चा बना की कोशिश में हैं। परगट और सिद्धू ने नई पार्टी की घोषणा करके एक तरह से इस चौथे मोर्चे की आधारशिला रख दी है।

इस चौथे मोर्चे की संभावना का जन्म राज्य में आम आदमी पार्टी के तीसरे मोर्चे के रूप में उभार से ही हुआ है। 2014 के लोक सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल वाराणसी से बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ ताल ठोक रहे थे। उस समय पूरे देश समेत उन्हें भी इस बात का पूरा यकीन नहीं रहा होगा कि महज डेढ़ साल पुरानी उनकी पार्टी का लोक सभा में खाता बनारस से सैकड़ों किलोमीटर दूर पंजाब में खुलेगा। आम आदमी पार्टी ने अपने पहले ही लोक सभा चुनाव में पंजाब की 13 में से चार सीटें जीत लीं। आप की इस जीत से राजनीतिक खिलाड़ियों को संकेत मिल गया कि पंजाब में गैर अकाली दल-बीजेपी और गैर कांग्रेस राजनीति के लिए जमीन पकी हुई है। पंजाब पिछले कुछ समय से नशाखोरी, बेरोजगारी और किसानों की बदहाली जैसे मुद्दों को लेकर मीडिया के सुर्खियों में रहा है। राज्य की अकाली-बीजेपी सरकार पर विपक्षी दल अनदेखी और कुशासन के गंभीर आरोप लगाते रहे हैं। वहीं राज्य की सत्ता में सबसे ज्यादा वक्त तक रह चुकी कांग्रेस के दामन पर भी कमोबेश वही दाग़ हैं जो अकाली-बीजेपी गठबंधन के दामन पर बताए जा रहे हैं।

pargat singh party poster परगट सिंह द्वारा फेसबुक पेज पर शेयर किया गया पोस्टर।

राज्य में उपजे राजनीतिक खालीपन को भांप चुकी आम आदमी पार्टी ने आगामी विधान सभा चुनावों के मद्देनजर अपनी कमर सबसे पहले कस ली थी। राजनीतिक सटोरिए 17 जुलाई तक यही दांव खेल रहे थे कि आप राज्य में दिल्ली वाला करिश्मा दोहरा पाएगी या नहीं? लेकिन 18 जुलाई को बीजेपी के राज्य सभा सांसद और पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिद्धू के इस्तीफे के बाद राज्य के राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदलने लगे। सिद्धू ने जब संसद सदस्यता से इस्तीफा दिया तो दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने उनके इस कदम की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उस समय अफवाह उड़ी कि सिद्धू को आम पंजाब का सीएम उम्मीदवार बना सकती है।

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सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर सिद्धू पंजाब के अमृतसर (पूर्व) से बीजेपी विधायक हैं। कौर सत्ताधारी अकाली दल पर कई बार खुला हमला कर चुकी हैं। सिद्धू ने इस्तीफे की वजह ये बताई कि उन्हें बीजेपी शीर्ष नेतृत्व पंजाब से दूर रहने के लिए कह रहा था और इसलिए उन्होंने पंजाब के लिए संसद सदस्यता छोड़ दी। सिद्धू दंपति के रुख से लोग अनुमान लगाने लगे कि वो दोनों ही आम आदमी पार्टी में जाने की तैयारी में हैं। खुद केजरीवाल ने सूचना दी कि सिद्धू उनसे मिले थे। सिद्धू दूसरे आप नेताओं से भी संपर्क में थे। वहीं पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष और राज्य के पूर्व सीएम अमरिंदर सिंह ने खुलकर कहा कि सिद्धू का कांग्रेस में स्वागत है। अमरिंदर ने याद दिलाया कि सिद्धू के पिता कांग्रेसी थे। लेकिन पूरा अगस्त बीत जाने के बाद भी सिद्धू आधिकारिक तौर पर किसी पार्टी से नहीं जुड़े।

सोमवार (29 अगस्त) को बीजेपी विधायक नवजोत कौर सिद्धू ने अकाली दल और कांग्रेस दोनों पर परोक्ष हमला किया। उनके बयान के बाद कांग्रेस ने भी करारा पलटवार किया। इस बयानबाजी के बाद आखिरकार सिद्धू दंपति के लिए कांग्रेस के दरवाजे भी बंद हो गए।

आम आदमी पार्टी की शुरुआती पहल

चुनावी तैयारी के मामले में दूसरी पार्टियों से आगे रहने की कोशिश करती आम आदमी पार्टी ने अगस्त के पहले हफ्ते में आगामी चुनाव के लिए प्रत्याशियों की पहली लिस्ट जारी कर दी। 19 नामों वाली इस लिस्ट के सामने आते ही पूर्व नौकरशाह और पार्टी की वित्त समिति के समन्वयक हरदीप सिंह किंगरा ने पद और पार्टी से इस्तीफा दे दिया। उनके अलावा पार्टी के टिकट की आस लगाए कुछ और आप नेताओं ने बगावत का बिगूल फूंक दिया। पार्टी किंगरा से मिले झटके से उबरी भी नहीं थी कि अगस्त के आखिरी हफ्ते में आम आदमी पार्टी के पंजाब संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर को टिकट बेचने के आरोप में पद से हटा दिया गया। स्थानीय राजनीति में गहरी पैठ रखने वाले वरिष्ठ नेता सुच्चा सिंह ने साफ कर दिया है कि अब उनके और आप के रास्ते अलग हैं। सुच्चा सिंह के निकाले जाने के बाद किंगरा ने एक ऑडियो जारी करके आप नेता संजय सिंह और दुर्गेश पाठक पर मुलाकात करने के लिए पैसे लेने का आरोप लगाया है। किंगरा को सुच्चा सिंह का करीबी माना जाता है। सुच्चा सिंह इशारा कर चुके हैं कि वो पूरे राज्य का दौरा करने के बाद नई पार्टी के गठन पर विचार करेंगे।

जुलाई 2015 में आम आदमी पार्टी के अनुशासन कमेटी के प्रमुख डॉक्टर दलजीत सिंह को “पार्टी विरोधी” गतिविधियों के लिए आरोप में बाहर निकाल दिया गया। अगले ही महीने अगस्त 2015 में पार्टी ने अपने चार में से दो सांसदों ( पटियाला के सांसद डॉक्टर धर्मवीर गांधी और फतेहगढ़ साहब के सांसद हरिंदर सिंह खालका) को दलजीत सिंह द्वारा आयोजित एक रैली में शामिल होने के बाद “पार्टी विरोधी” गतिविधियों के आरोप के साथ पार्टी से निलंबित कर दिया गया था। इन दोनों नेताओं को निलंबन में सुच्चा सिंह की भी भूमिका रही थी लेकिन पिछले हफ्ते सुच्चा सिंह के पार्टी के पंजाब संयोजक पद से हटाने के बाद धर्मवीर गांधी ने आगामी विधान सभा चुनाव के मद्देनजर “पंजाब केंद्रित मोर्चे” के गठन की घोषणा की। इस मौके पर उन्होंने पार्टी में लोकतंत्र के अभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि पंजाब के नेताओं को किनारे लगाया जा रहा है और सुच्चा सिंह छोटेपुर और कंवर संधू जैसे स्थानीय नेताओं को “अपमानित” किया जा रहा है।

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धर्मवीर गांधी ने दावा किया कि उनके साथ डेमोक्रेटिक स्वराज पार्टी, अपना पंजाब, जय जवान जय किसान पार्टी, स्वाभिमान पार्टी जैसे स्थानीय दलों के अलावा किंगरा और दूसरे कई अकादमिकों और कार्यकर्ताओं का समर्थन है। गांधी ने पंजाब में एआईएडीएमके, टीएमसी और बीजेडी जैसे स्थानीय दलों की जरूरत बताते हुए कहा कि नए मोर्च का नाम 10-15 दिनों में घोषित कर दिया जाएगा। कभी योगेंद्र यादव के स्वराज अभियान के सदस्य रहे पंजाब में नई गठित स्वराज पार्टी के प्रमुख प्रोफेसर मंजीत सिंह ने दैनिक द ट्रिब्यून को बताया कि उनकी पार्टी “भरोसेमंद नेतृत्व देने के लिए सभी सही सोच वाले लोगों से संपर्क में हैं जिनपर पंजाबी भरोसा करते हैं।” प्रोफेसर मंजीत ने अखबार को से कहा, “मैंने ऐसे कुछ नेताओं से बात की है जो इस समय मैदान में मौजूद तीनों दलों से अब नहीं जुड़े हैं।”

सत्ताधारी दल की अंदरूनी कलह

अंदरूनी कलह से राज्य में सत्ताधारी अकाली दल भी अछूता नहीं रहा। पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान और अकाली विधायक परगट सिंह और अकाली दल विधायक इंदरबीर सिंह बोलारिया को इस साल जुलाई में “पार्टी विरोधी” गतिविधियों के लिए निलंबित कर दिया गया था। अगस्त के पहले हफ्ते में परगट ने राज्य के सीएम प्रकाश सिंह बादल को एक पत्र लिखकर सीएम के बेटे और राज्य के उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल पर गंभीर आरोप लगाए। परगट के निलंबन के बाद मीडिया में उनके आप में जाने को लेकर अटकलें लगाई जाने लगीं लेकिन दो अकाली विधायकों और सिद्धू के साथ मिलकर नई पार्टी बनाने की घोषणा करके उन्होंने इन अकटलों को हमेशा के लिए शांत कर दिया है।

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अगर सभी दल के बागी या रुष्ट “विकल्पों” के बारे में सोच रहे हैं तो भला पूर्व कांग्रेसी पीछे कैसे रह सकते हैं। कभी पंजाब कांग्रेस के प्रमुख नेता रहे जगमीत सिंह बरार लोकहित अभियान नामक पार्टी बना चुके हैं। स्थानीय मीडिया की मानें तो वो आम आदमी पार्टी के भी संपर्क में हैं। बरार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि राज्य में परिवारवादी और सामंतवादी राजनीति के विकल्प के तौर पर गैर -कांग्रेस और गैर-अकाली पार्टियों से गठबंधन के इच्छुक हैं। दैनिक द ट्रिब्यून को बरार ने बताया है कि वो इसी हफ्ते दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेताओं से मिले थे।

अभी तक परगट और सिद्धू के अलावा किसी अन्य बागी और असंतुष्ट नेताओं ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। सभी हवा का रुख भांप रहे हैं। लेकिन जब राज्य में असर रखने वाली लगभग हर पार्टी के प्रभावी स्थानीय नेता मौजूदा पार्टियों से अलग किसी नए विकल्प की तलाश में हों तो आगामी चुनावों को देखते हुए सभी बागी और असंतुष्ट एक झंडे के तले आ जाएं तो शायद ही किसी को हैरत होगी।

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