आज पंजाब की राजनीति की चर्चा होते ही चंडीगढ़, 117 विधानसभा सीटें, किसानों के मुद्दे, नशा, रोजगार और मुफ्त योजनाएं जैसे विषय सामने आते हैं। लेकिन 1952 में जब स्वतंत्र भारत का पहला विधानसभा चुनाव हुआ था, तब पंजाब का स्वरूप आज से बिल्कुल अलग था। उस समय ना चंडीगढ़ अस्तित्व में था, ना हरियाणा अलग राज्य था और ना ही हिमाचल प्रदेश का वर्तमान स्वरूप बना था। राजधानी शिमला थी और विभाजन के बाद पुनर्निर्माण सरकार की सबसे बड़ी चुनौती थी।

1952 का चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं था बल्कि यह उस लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली परीक्षा थी जिसने विभाजन की त्रासदी से उबर रहे समाज को नई दिशा देने की कोशिश की।

विभाजन के बाद का पंजाब

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ लेकिन पंजाब ने आजादी के साथ देश के सबसे बड़ा मानवीय संकट का भी सामना किया। पंजाब का विभाजन हुआ और उसका पश्चिमी हिस्सा पाकिस्तान मे चला गया जबकि पूर्वी पंजाब भारत का हिस्सा बना।

विभाजन के कारण लाखों लोग अपने घर, जमीन और कारोबार छोड़ने को मजबूर हुए। पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिंदू और सिख शरणार्थी भारत आए जबकि काफी मुस्लिम आबादी पाकिस्तान चली गई। प्रशासनिक ढांचा लगभग बिखर चुका था। कई गांव खाली हो गए थे और शहरों की सामाजिक संरचना पूरी तरह बदल गई थी।

ऐसे माहौल में लोकतांत्रिक चुनाव कराना किसी चुनौती से कम नहीं था। सरकार को एक ओर प्रशासन खड़ा करना था तो दूसरी ओर विस्थापित लोगों के पुनर्वास की जिम्मेदारी भी निभानी थी।

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1952 में कैसा था पंजाब?

आज के पंजाब की तुलना में 1952 का पंजाब भौगोलिक रूप से कहीं बड़ा था। वर्तमान हरियाणा राज्य का पूरा पंजाब का हिस्सा था जबकि हिमाचल प्रदेश के कई पर्वतीय क्षेत्र भी इसी के अधीन आते थे। राज्य की सीमाएं पाकिस्तान से लेकर हिमालय तक फैली हुई थीं।

उस समय चंडीगढ़ नहीं बना था। इसलिए पंजाब सरकार का सचिवालय, विधानसभा और राजभवन शिमला में संचालित होते थे। शिमला के पीटरहॉफ और काउंसिल चैंबर जैसी ऐतिहासिक इमारतों में सरकार के महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते थे।

PEPSU: पंजाब से अलग एक राज्य

1952 के चुनाव को समझने के लिए Patiala and East Punjab States Union (PEPSU) का जिक्र जरूरी है। साल 1948 में पटियाला, नाभा, जींद, कपूरथला, फरीदकोट और अन्य रियासतों को मिलाकर PEPSU बनाया गया था। यह पंजाब से अलग राज्य था और इसकी अपनी विधानसभा व सरकार थी। इसलिए 1952 में पंजाब और PEPSU के लिए अलग-अलग विधानसभा चुनाव कराए गए।

बाद में 1 नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत PEPSU का पंजाब में विलय कर दिया गया।

आजाद भारत का पहला लोकतांत्रिक चुनाव

1951-52 का आम चुनाव एक बड़ा लोकतांत्रिक प्रयोग माना जाता है। उस समय देश में अधिकांश मतदाता निरक्षर थे। इसलिए चुनाव आयोग ने हर एक उम्मीदवार को अलग चुनाव चिन्ह आवंटित किया ताकि लोग आसानी से अपने प्रत्याशी की पहचान कर सकें।

मतदान बैलेट पेपर के जरिए होता था। मतदान केंद्रों पर हर उम्मीदवार के लिए अलग मतपेटी रखी जाती थी और मतदाता अपनी पसंद की मतपेटी में मतपत्र डालते थे। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) आने में अभी कई दशक बाकी थे।

1952 में पंजाब विधानसभा में कुल 126 सीटें थीं लेकिन निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या 105 थी। इसकी वजह उस समय लागू डबल-मेंबर सीट सिस्टम था।

राज्य के 21 निर्वाचन क्षेत्रों से दो-दो विधायक चुने जाते थे। इनमें एक सामान्य वर्ग और दूसरा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होता था। ऐसे क्षेत्रों में मतदाताओं को दो वोट डालने का अधिकार मिलता था। बाद के वर्षों में यह व्यवस्था खत्म कर दी गई।

चुनावी मुद्दे क्या थे?

1952 का चुनाव आज की राजनीति से बिल्कुल अलग था। उस समय किसी दल ने मुफ्त बिजली, नकद सहायता या अन्य लोकलुभावन योजनाओं का वादा नहीं किया था।

सबसे बड़ा मुद्दा था शरणार्थियों का पुनर्वास। सरकार के सामने पाकिस्तान से आए लाखों परिवारों को जमीन, मकान और रोजगार उपलब्ध कराने की चुनौती थी। इसके साथ ही कृषि उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर था। देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था और पंजाब को भविष्य के कृषि केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई जा रही थी।

भाखड़ा-नांगल परियोजना, नहरों का विस्तार और सिंचाई व्यवस्था चुनावी बहस के प्रमुख विषय थे। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक पुनर्निर्माण भी चुनावी एजेंडे में शामिल थे।

प्रचार का तरीका भी था बिल्कुल अलग

1952 के चुनाव में प्रचार के साधन बेहद सीमित थे। ना सोशल मीडिया था, ना टीवी चैनल और ना ही हाई-टेक चुनावी अभियान। नेता गांव-गांव जाकर जनसभाएं करते थे। बैलगाड़ी, रेल और जीप के जरिए चुनाव प्रचार होता था। हाथ से छपे पोस्टर, पर्चे और नुक्कड़ सभाएं ही मतदाताओं तक पहुंचने का प्रमुख माध्यम थीं।

राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के सबसे बड़े प्रचारक थे जबकि ग्रामीण इलाकों में शिरोमणि अकाली दल तेजी से अपना आधार मजबूत कर रहा था।

कांग्रेस की बड़ी जीत, लेकिन PEPSU में बदली तस्वीर

1952 के पंजाब विधानसभा चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया। 126 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी ने 96 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। शिरोमणि अकाली दल को 13 सीटें मिलीं जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, फॉरवर्ड ब्लॉक, जमींदार पार्टी और निर्दलीय उम्मीदवारों ने बाकी सीटों पर जीत दर्ज की।

चुनाव के बाद कांग्रेस विधायक दल ने भीम सेन सच्चर को अपना नेता चुना। उन्होंने 17 अप्रैल 1952 को शिमला में पंजाब के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनकी सरकार के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी विभाजन के बाद प्रशासन को स्थिर करना और विस्थापित लोगों के पुनर्वास को गति देना था।

PEPSU में बनी शुरुआती गैर-कांग्रेसी सरकार

जहां पंजाब में कांग्रेस ने बहुमत हासिल किया, वहीं PEPSU में राजनीतिक तस्वीर अलग रही। यहां कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी। चुनाव के बाद शिरोमणि अकाली दल और अन्य सहयोगी दलों के समर्थन से ज्ञान सिंह राड़ेवाला मुख्यमंत्री बने। इसे स्वतंत्र भारत की शुरुआती गैर-कांग्रेसी सरकारों में गिना जाता है।

हालांकि राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह सरकार ज्यादा वक्त तक नहीं टिक सकी और बाद में वहां राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम लागू होने के बाद PEPSU का पंजाब में विलय कर दिया गया।

पहली विधानसभा के सामने क्या थीं चुनौतियां?

1952 में चुनी गई विधानसभा के सामने सामान्य प्रशासन से कहीं बड़ी जिम्मेदारियां थीं। विभाजन के कारण लाखों परिवार बेघर हो चुके थे। सरकार को उनके पुनर्वास, भूमि आवंटन, मुआवजा, रोजगार और शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरतों की व्यवस्था करनी थी।

कई शहरों और कस्बों का जनसांख्यिकीय स्वरूप पूरी तरह बदल चुका था। प्रशासनिक इकाइयों का पुनर्गठन करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती थी। इसके साथ ही कृषि उत्पादन बढ़ाने और सिंचाई परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। आगे चलकर यही प्रयास पंजाब में हरित क्रांति की मजबूत नींव बने।

पंजाब की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का उभार

1952 के चुनाव में कांग्रेस का प्रभाव सबसे अधिक था लेकिन इसी दशक में पंजाब की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का महत्व बढ़ने लगा। शिरोमणि अकाली दल ने पंजाबी भाषा, सिख पहचान और क्षेत्रीय अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। आने वाले वर्षों में यही राजनीति ‘पंजाबी सूबा आंदोलन’ का आधार बनी।

यह आंदोलन भाषा के आधार पर अलग राज्य की मांग पर केंद्रित था। लंबे राजनीतिक संघर्ष और कई दौर की बातचीत के बाद केंद्र सरकार ने पंजाब के पुनर्गठन का फैसला लिया।

1966: जब बदल गया पंजाब का नक्शा

1 नवंबर 1966 को लागू हुए पंजाब पुनर्गठन अधिनियम ने राज्य की भौगोलिक और राजनीतिक पहचान बदल दी। हिंदी भाषी क्षेत्रों को अलग कर हरियाणा बनाया गया जबकि पर्वतीय क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा हिमाचल प्रदेश में शामिल कर दिया गया।

वहीं चंडीगढ़ को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया और उसे पंजाब तथा हरियाणा दोनों की संयुक्त राजधानी का दर्जा मिला। यहीं से आधुनिक पंजाब की शुरुआत मानी जाती है।

1952 से आज तक कितना बदल गया चुनाव?

सात दशक पहले चुनाव प्रचार पूरी तरह जनसंपर्क पर आधारित था। उम्मीदवार गांव-गांव जाकर लोगों से मिलते थे। रेडियो, पोस्टर, पर्चे और छोटी जनसभाएं ही प्रचार के प्रमुख साधन थे।

आज चुनावी राजनीति डिजिटल हो चुकी है। सोशल मीडिया, डेटा एनालिटिक्स, मोबाइल ऐप, लाइव प्रसारण, हाई-टेक वॉर रूम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चुनाव प्रचार का हिस्सा बन चुके हैं।

इसी तरह चुनावी मुद्दे भी बदल गए हैं। जहां 1952 में पुनर्वास, कृषि, सिंचाई और प्रशासनिक पुनर्निर्माण प्रमुख विषय थे। वहीं आज रोजगार, उद्योग, एमएसपी, नशा, शिक्षा, स्वास्थ्य, निवेश, कानून-व्यवस्था और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में हैं।

क्यों ऐतिहासिक है 1952 का चुनाव?

पंजाब का पहला विधानसभा चुनाव केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि यह राज्य का पहला लोकतांत्रिक चुनाव था। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि विभाजन जैसी भीषण त्रासदी झेलने के बावजूद लोगों ने लोकतंत्र पर भरोसा जताया और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी सरकार चुनी।

यही विधानसभा आगे चलकर पंजाब के प्रशासनिक ढांचे, कृषि विकास, सिंचाई परियोजनाओं और संस्थागत निर्माण की नींव बनी। बाद के दशकों में हरित क्रांति, औद्योगिक विकास और राज्य के पुनर्गठन जैसे बड़े बदलावों की नींव भी इसी दौर में पड़ी।

आज का पंजाब भले ही 1952 के पंजाब से भौगोलिक, राजनीतिक और सामाजिक रूप से बिल्कुल अलग हो। लेकिन उसकी लोकतांत्रिक यात्रा की शुरुआत उसी पहले विधानसभा चुनाव से हुई थी। शिमला से चलने वाली सरकार, बैलेट बॉक्स से होने वाला मतदान, डबल-मेंबर सीटों की व्यवस्था, विभाजन के बाद पुनर्निर्माण की चुनौती और लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास- इन सभी ने मिलकर आधुनिक पंजाब की राजनीतिक पहचान गढ़ी।

1952 का विधानसभा चुनाव केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं बल्कि यह उस लोकतांत्रिक विरासत का प्रतीक है जिस पर आज का पंजाब खड़ा है।