राजीव गांधी के सहपाठी रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कभी राहुल गांधी के खास को कर दिया था रीप्लेस

द इंडियन एक्सप्रेस में छपी मनराज ग्रेवाल शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक बड़े-बड़े फैसले मिनटों में लेने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह की ताकत जनता पर उनका भरोसा करना था। लेकिन हाल के दिनों में कैप्टन ने इस ताकत को दिया है। उनके खिलाफ उन्ही के करीबियों में मोर्चा खोल रखा है।

कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दिया इस्तीफा। फोटो- गुरमीत सिंह, एक्सप्रेस

 मनराज ग्रेवाल शर्मा।

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह उन राजनेताओं में से हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में अपने मजबूत फैसलों और उत्साह के साथ आगे बढ़ने के लिए जाने जाते हैं। उनकी पहचान सिर्फ एक राजनेता के तौर पर ही नहीं बल्कि एक सैनिक, सैन्य इतिहासकार, शेफ और बागवानी पसंद इंसान की है। हालांकि यह कहा जा सकता है कि वो पंजाब में अपनी पार्टी के भीतर के सियासी घमासान को संभालने में सफल नहीं हो सके। दरअसल, मार्च 2017 तक पंजाब में सब कुछ कैप्टन के तरीके से चल रहा था। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को दो-तिहाई से अधिक बहुमत मिला। इसके पीछे कैप्टन का अहम रोल माना जाता है। इस चुनाव में कांग्रेस ने अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी, शिरोमणि अकाली दल को तीसरे स्थान पर धकेल दिया था।

अमरिंदर सिंह की राजनीतिक मुश्किलें कांग्रेस की जीत से काफी पहले तब शुरू हो गईं थी, जब भारतीय जनता पार्टी से ‘आउट’ क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को आलाकमान ने पार्टी में शामिल कर लिया था। अमरिंदर सिंह इस फैसले के खिलाफ थे लेकिन सिद्धू के कांग्रेस में आने का राहुल गांधी ने जोरदार समर्थन किया था।

राहुल के करीबी को किया किनारे: पार्टी में शामिल होने के बाद खबरें सामने आईं कि सिद्धू को पंजाब में उपमुख्यमंत्री बनाया जाएगा, हालांकि ऐसा नहीं हुआ। राज्य में कांग्रेस की जीत की पटकथा लिखने वाले अमरिंदर आलाकमान के आगे झुकने के मूड में कतई नहीं थे। इससे पहले 2015 में भी वे राज्य पर अपनी मजबूत पकड़ के चलते राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले प्रताप सिंह बाजवा को पीपीसीसी प्रमुख के पद से हटाने में सफल रहे थे।

अपने पहले कार्यकाल के दौरान, अमरिंदर सिंह ने पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी को तब नाराज कर दिया था, जब उन्होंने राज्य को SYL समझौते से बाहर किए बिना कानून बनाया था। नाराज सोनिया ने कथित तौर पर उन्हें महीनों तक मिलने का समय देने से इनकार कर दिया था।

कैप्टन पर आरोप लगता रहा कि वे SAD नेता बादल के प्रति नरमी बरतते हैं। इसी के चलते उनके ही करीबी मंत्रियों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इसका नतीजा हुआ कि 18 सितंबर को कैप्टन अमरिंदर सिंह को अपना इस्तीफा सौंपना पड़ा।

राजीव गांधी के करीबी: पटियाला की तत्कालीन रियासत के वंशज, अमरिंदर सिंह जब दून स्कूल में राजीव गांधी के साथ पढ़ रहे थे, तो उन्हें अक्सर दिल्ली में प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के आवास पर छुट्टी मनाने के लिए आमंत्रित किया जाता था। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, कि जब राजीव गांधी ने उन्हें कांग्रेस में शामिल होने और पटियाला से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए राजी कर लिया था। 1977 में, आपातकाल के बाद, जब चुनाव हुआ तो कैप्टन पटियाला से अकाली नेता गुरचरण सिंह तोहड़ा से अपना पहला चुनाव हार गए। हालांकि तीन साल बाद, उन्होंने उसी सीट से लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की।

राजीव गांधी के बेहद करीबी होने के चलते अमरिंदर सिंह ने 1984 में हुए ऑपरेशन ब्लूस्टार के तुरंत बाद कांग्रेस छोड़कर अकाली दल का दामन थाम लिया था। द इंडियन एक्सप्रेस के साथ एक आइडिया एक्सचेंज कार्यक्रम में अमरिंदर सिंह ने कहा था कि वह पंजाब में आतंकवाद के काले दशक के दौरान हुई घटनाओं पर एक किताब लिखेंगे।

बनाई थी पार्टी: अकाली दल में अपने कार्यकाल के दौरान वह पहली बार तलवंडी साबो से राज्य विधानमंडल के लिए चुने गए, जो सिखों की पांच पवित्र सीटों (तख्तों) में से एक है। वे राज्य सरकार में कृषि, वन, विकास और पंचायत मंत्री बने। लेकिन स्वभाव से, वह पार्टी के अनुकूल फिट नहीं बैठते थे। बाद में 1992 में शिरोमणि अकाली दल (पंथिक) बनाने के लिए उन्होंने अकाली दल को छोड़ दिया। छह साल बाद, 1998 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी का सफाया हो गया, इसके बाद उन्होंने पार्टी का कांग्रेस में विलय करने का फैसला किया।

सैन्य जीवन: राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और भारतीय सैन्य अकादमी के पूर्व छात्र, अमरिंदर को 1963 में सिख रेजिमेंट में शामिल किया गया था। हालांकि उन्होंने यहां केवल तीन वर्षों के लिए सेवा की। सेना के जीवन का असर उनके राजनीतिक जीवन पर भी देखने को मिलता है। अपने पहले कार्यकाल में कैप्टन को बड़े फैसले लेने के लिए जाना जाता है। एक वरिष्ठ नौकरशाह ने उनकी तुलना अपने पूर्ववर्ती प्रकाश सिंह बादल से करते हुए कहा था कि, बादल को किसी फैसले को लेने में महीनों लगते थे लेकिन अमरिंदर सिंह मिनटों में ही महत्वपूर्ण निर्णय ले लेते थे।

मुख्यमंत्री के रूप में अमरिंदर सिंह अपने पहले कार्यकाल के दौरान पूर्वी और पश्चिमी पंजाब के बीच संबंधों के एक बड़े समर्थक थे। एक बार उन्होंने पाकिस्तान पंजाब के मुख्यमंत्री की मेजबानी की थी। उस दौरान उन्होंने कहा था, ‘मैं अमृतसर में नाश्ता और लाहौर में लंच करना चाहता हूं।

राष्ट्रवादी कैप्टन: वैचारिक मतभेद होने के बाद भी देश की अखंडता को लेकर उनके मजबूत विचारों पर BJP उन्हें एक राष्ट्रवादी के रूप में मानती है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद अमरिंदर पूरी तरह से आक्रोशित हो गए थे। पंजाब विधानसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, “मैं जनरल बाजवा (पाकिस्तानी सेना प्रमुख) से यह कहना चाहता हूं कि अगर आप पंजाबी हैं, तो हम भी पंजाबी हैं और आपने हमारे क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश की, हम आपको सही जवाब देंगे।”

अमरिंदर सिंह ने 2019 में पंजाब में पहली बार हिंदू मुख्यमंत्री होने की संभावना पर गुरदासपुर में पूर्व पीपीसीसी प्रमुख सुनील जाखड़ के लिए प्रचार करने के दौरान कहा था कि जाखड़ प्रदेश के अगले सीएम हो सकते हैं। लेकिन अंत में, ‘द पीपल्स महाराजा’, जैसा कि उनकी जीवनी का शीर्षक है, लोगों का समर्थन उन्होंने खो दिया, और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी।

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