बीजेपी के लिए पंजाब में सिखों का समर्थन हासिल करना मुश्किल रहा है। एक वक्त में पंजाब में उसकी सहयोगी रही अकाली दल के साथ उसके राजनीतिक रिश्ते खराब हो चुके हैं और किसान आंदोलन के दौरान भी सिख समुदाय की नाराजगी सामने आई थी।
पंजाब में बीजेपी के सिख नेताओं को इस बात का डर है कि सतलुज फिल्म को लेकर रवनीत सिंह बिट्टू का जो रूख है, उससे सिख समुदाय पार्टी से और दूर हो सकता है। रवनीत सिंह बिट्टू ने फिल्म में लापता लोगों को लेकर किए गए दावे पर सवाल उठाए हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस ने इस मामले में बीजेपी के कई सिख नेताओं से बात की है।
बीजेपी नेताओं ने कहा कि बेकसूर लोगों की हत्या को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता, चाहे वह उग्रवादियों द्वारा की गई हो या फिर पुलिस के द्वारा किए गए कथित एनकाउंटर में। बीजेपी नेताओं ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि सतलुज फिल्म सिखों और हिंदुओं के बीच तनाव पैदा कर सकती है।
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने क्या कहा?
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों कहते हैं, “जब सतलुज को ओटीटी से हटाया गया तो मैंने इस मामले को सरकार के सामने उठाना जरूरी समझा। मैं केंद्र सरकार के द्वारा इस मामले को रिव्यू कमेटी के सौंपने के फैसले का स्वागत करता हूं।”
सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट और बीजेपी के वरिष्ठ नेता हरविंदर सिंह फूलका ने फिल्म का समर्थन किया और कहा कि युवा पीढ़ी को पंजाब में उग्रवाद के दौर का पता चलना चाहिए। फूलका ने रवनीत सिंह बिट्टू को सलाह दी कि वह किसी के बेवजह के विवाद में ना पड़ें।
फूलका ने कहा, “बेकसूर लोगों की हत्याओं को कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए और दोषियों को माफ नहीं किया जाना चाहिए।” फूलका ने कहा, “उग्रवादियों ने हिंदुओं की टारगेट किलिंग की जबकि बेगुनाह सिखों को पुलिस मुठभेड़ों के नाम पर मार दिया गया।”
लंबे वक्त तक 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले फूलका ने इस बात का समर्थन किया कि नई पीढ़ी को यह समझाने के लिए कि हम उस मुश्किल दौर से कैसे बाहर निकले हैं, सतलुज जैसी फिल्में बनी चाहिए।
पंजाब, पंजाबियों और पंजाबियत के साथ है बीजेपी- लालपुरा
इकबाल सिंह लालपुरा ने इस मामले में संयम बरतने की अपील की। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रहे लालपुरा ने कहा था कि अगर रवनीत सिंह बिट्टू को आंकड़ों को लेकर कोई भ्रम है तो उन्हें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास जाना चाहिए।
लालपुरा ने कहा है कि इस मामले में दोनों पहलुओं को सामने लाना चाहिए। इसे लेकर बीजेपी का क्या रूख है, इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “पार्टी हमेशा पंजाब, पंजाबियों और पंजाबियत के साथ है धर्म चाहे कोई भी हो हम सभी पंजाबी हैं।”
राज्यसभा सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी ने कहा कि पुरानी घटनाओं को लेकर बनी किसी भी फिल्म को कला की प्रस्तुति के रूप में देखा जाना चाहिए और यह पुराने घावों को कुरेदने का जरिया न बने। उन्होंने कहा, “यह सब जानते हैं कि जसवंत सिंह खालड़ा ने लोगों के लापता होने के मुद्दे को संवैधानिक और कानूनी ढंग से उठाया और सुप्रीम कोर्ट और एनएचआरसी ने उनके मुद्दों का संज्ञान लिया। सीबीआई ने 62 मामले दर्ज किए और खालड़ा के अपहरण और हत्या के मामले में भी दोषियों को सजा हुई।”
सांप्रदायिक सौहार्द को कोई खतरा नहीं- बाजवा
पंजाब बीजेपी के उपाध्यक्ष फतेह जंग सिंह बाजवा ने कहा कि उनका परिवार खुद आतंकवाद का शिकार रहा है। फतेह जंग सिंह बाजवा के पिता सतनाम सिंह बाजवा की 1987 में आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। सतनाम सिंह बाजवा पंजाब में तीन बार विधायक रहे थे। फतेह जंग सिंह बाजवा का कहना है कि इस फिल्म से पंजाब का सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता है, इस तरह की आशंका बेबुनियाद है।
बीजेपी नेताओं की राय के बीच रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा, “लालपुरा जी हमारे सम्मानित नेता हैं और मैं उनकी सलाह को मानूंगा। वह उस दौरान एसपी के पद पर तैनात थे और उन्होंने तब के हालात को बेहद नजदीक से देखा है।”
बिट्टू कहते हैं, “जब तक मेरे दादा (पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह) जिंदा थे खालड़ा के खिलाफ पुलिस ने कोई एफआईआर दर्ज नहीं की थी और उनसे कोई पूछताछ भी नहीं हुई। मेरे दादा की हत्या 31 अगस्त, 1995 को हुई और खालड़ा का अपहरण 6 सितंबर, 1995 को हुआ। अक्टूबर 1995 में खालड़ा की हत्या कर दी गई।”
बिट्टू ने सवाल उठाया कि उनके दादा बेअंत सिंह की इसमें क्या भूमिका है? हालांकि बिट्टू ने 25000 लोगों के आंकड़े को लेकर फिर से सवाल उठाया और कहा कि इसकी कोई बुनियाद नहीं है।
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सतलुज फिल्म को इन दिनों शिरोमणि अकाली दल, सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से पंजाब के कई गांवों में दिखाया जा रहा है। फिल्म को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ रही है। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।
