पंजाब में लगभग सात महीने बाद विधानसभा चुनाव होगा। यहां मुकाबला कई दलों के बीच होने की संभावना है। हर पार्टी प्रमुख खुद को जीत की दौड़ में मान रहा है।
आम आदमी पार्टी जो इस वक्त राज्य की सत्ता में है। वह विपक्ष के बिखराव फायदा उठाकर फिर से सरकार बनाने की उम्मीद कर रही है। मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली सरकार अपने कामकाज के आधार पर जनता का समर्थन बनाए रखने का दावा कर रही है।
कांग्रेस का मानना है कि सरकार के खिलाफ पैदा हुई कथित सत्ता विरोधी लहर उसे फिर से सत्ता तक पहुंचा सकती है। हालांकि, पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी उसकी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
शिरोमणि अकाली दल जिसका नेतृत्व सुखबीर सिंह बादल कर रहे हैं। लंबे समय से कमजोर दौर से गुजर रहा है और उसके अस्तित्व पर भी सवाल उठ रहे हैं। इसके बावजूद पार्टी पंजाब की राजनीति में वापसी की कोशिशों में जुटी हुई है।
पंजाब में भले ही भाजपा का समर्थन आधार कम हो, लेकिन वह सीमावर्ती राज्य में सत्ता हासिल करने की आकांक्षा रखती है। हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में मिली शानदार जीत से पार्टी का मनोबल बढ़ा है, जहां उसने पहली बार सत्ता संभाली।
मान का बेअदवी वीडियो विवाद
राज्य विधानसभा के 117 सदस्यों में से केवल 16 विधायकों वाली प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने मुख्यमंत्री मान से जुड़े कथित बेअदवी वीडियो विवाद को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। जिससे वह आम आदमी पार्टी को संकट में डाल सके और उसे उसका फायदा मिल सके।
15 जून को सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त ने कथित बेअदबी वाले वीडियो को लेकर मान को “गुरु विरोधी” और “खालसा पंथ विरोधी” घोषित किया है। हालांकि, मुख्यमंत्री मान का लगातार कहना है कि वह वीडियो में नहीं हैं। मान का कहना है कि वीडियो उन्हें बदनाम करने के लिए मनगढ़ंत बनाया गया था।
हाल के महीनों में आम आदमी पार्टी को दल-बदल का भी सामना करना पड़ा है। अप्रैल में, राघव चड्ढा के नेतृत्व में पार्टी के 10 राज्यसभा सदस्यों में से सात ने पाला बदलकर भाजपा में विलय कर लिया। इन सात दल-बदलुओं में से छह पंजाब से AAP सांसद चुने गए थे।
इन असफलताओं के बावजूद, आम आदमी पार्टी ने मई में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में शानदार जीत दर्ज की और राज्य भर में आठ में से पांच नगर निगमों, 75 में से 39 नगर परिषदों और 20 में से नौ नगर पंचायतों में बहुमत हासिल किया।
कांग्रेस में आंतरिक कलह
जहां एक ओर आम आदमी पार्टी की मुश्किलों से कांग्रेस को फायदा होने की उम्मीद थी। वहीं दूसरी ओर अपने ही दल में बढ़ते मतभेद और आंतरिक कलह के बीच कांग्रेस को अपने अंदरूनी मामलों को सुलझाने में जूझना पड़ रहा है।
कांग्रेस हाई कमान ने हाल ही में पंजाब इकाई को पुनर्गठित करने के लिए संतुलन बनाने का प्रयास किया। उन्होंने अमरिंदर सिंह राजा वारिंग को राज्य पार्टी अध्यक्ष और प्रताप सिंह बाजवा को विधानसभा में विपक्ष के नेता के पद पर बरकरार रखा, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री और वारिंग के विरोधी चरणजीत सिंह चन्नी को पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया। हालांकि, ऐसा लगता है कि इस कदम से राज्य कांग्रेस के भीतर दरारें और गहरी हो गई हैं, क्योंकि चन्नी के समर्थकों ने वारिंग के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है।
राज्य कांग्रेस अध्यक्ष पद के दावेदार चन्नी ने कथित तौर पर पार्टी नेतृत्व पर दबाव डालने के लिए कई वरिष्ठ पार्टी नेताओं, विधायकों और पूर्व मंत्रियों को एकजुट किया है।
कांग्रेस हलकों में इस बात की भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि आने वाले दिनों में पार्टी से कई लोग भाजपा में शामिल हो सकते हैं। इन घटनाक्रमों ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को झटका दिया है, जो पार्टी को आम आदमी पार्टी के एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश कर रहे थे।
भाजपा की भूमिका
भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पार्टी आगामी चुनावों में अपनी छाप छोड़ने के लिए अपने प्रतिद्वंद्वियों के बीच मौजूद विरोधाभासों और मतभेदों का फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। भाजपा नेताओं ने कई ऐसे मुद्दों को उठाया है, जिनके बारे में उनका दावा है कि उन्होंने मान सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को हवा दी है। इनमें आप सरकार द्वारा पिछले साल की बाढ़ का कुप्रबंधन, रुकी हुई बुनियादी ढांचा परियोजनाएं और राज्य का बढ़ता कर्ज संकट शामिल हैं।
राज्य भाजपा अपने पूर्व सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के साथ अनौपचारिक बातचीत कर रही है, ताकि फिर से गठबंधन किया जा सके। भाजपा को केंद्र सरकार द्वारा कई मुद्दों पर लिए गए फैसलों पर उम्मीदें टिकी हैं, जिनसे राज्य की जनता में सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
राज्य भाजपा नेताओं का कहना है कि केंद्र सरकार बंदी सिंहों (सिख कैदियों) की रिहाई के लिए पहल कर सकती है, जो देश के विभिन्न हिस्सों में उग्रवाद में कथित संलिप्तता के आरोप में कई वर्षों से जेल में बंद हैं। साथ ही, चार साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद सेवा में बने रहने वाले अग्निवीरों का प्रतिशत (वर्तमान 25% से) बढ़ाने के लिए भी कदम उठा सकती है। राज्य के एक पार्टी नेता ने कहा कि ऐसे कदम भाजपा को जनता के बीच लोकप्रिय बनाएंगे और पंजाब में पार्टी के विस्तार के नए रास्ते खोलेंगे।
पार्टी के नेताओं का यह भी दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनाव में भाजपा के चेहरे के रूप में पेश करके पार्टी राज्य के छह हिंदू बहुल जिलों में अपना दबदबा कायम कर सकती है। भाजपा ने हाल ही में 76 वर्षीय केवल सिंह ढिल्लों को अपना पहला जाट सिख प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। इस कदम का उद्देश्य जाट सिखों तक पहुंच बनाना है, जो पंजाब की आबादी का 20-25% हिस्सा हैं।
जहां एक ओर पड़ोसी राज्य हरियाणा के भाजपा मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी इन दिनों पंजाब में जमकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं। वहीं तरुण चुघ और केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर जैसे वरिष्ठ पार्टी नेता भी चुनाव से पहले पार्टी के जमीनी स्तर के कार्यों के समन्वय के लिए नियमित रूप से राज्य का दौरा कर रहे हैं।
भाजपा द्वारा शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन करने के प्रयास के बावजूद, सैनी ने कुछ दिन पहले मीडियाकर्मियों से कहा था कि भाजपा पंजाब चुनावों के लिए गठबंधन में शामिल नहीं होगी।
तनावपूर्ण स्थिति क्यों?
पंजाब के वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि राज्य में मौजूदा स्थिति जटिल और जोखिम भरी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने कहा, “मुश्किल यह है कि पंजाब को 1966 में पुनर्गठन के समय की तुलना में अब कहीं ज्यादा गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसका सार्वजनिक ऋण अब 47 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, औसत भूमि जोत घटकर 25 से 5 एकड़ रह गई है और जलस्तर में भारी गिरावट आई है। खासकर मध्य पंजाब के धान उत्पादक क्षेत्रों में। यहां कोई उद्योग नहीं है, कोई रोजगार नहीं है, जबकि नशीले पदार्थों से संबंधित उग्रवाद राज्य को 1980-1990 के दशक में वापस ले जा रहा है और दुर्भाग्य से इनमें से किसी भी मुद्दे पर सार्वजनिक चर्चा नहीं हो रही है।”
उन्होंने आगे कहा कि बढ़ते कर्ज संकट के बावजूद आम आदमी पार्टी अपने वोट बैंक को लुभाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन दे रही है, कांग्रेस आंतरिक कलह से जूझ रही है। शिरोमणि अकाली दल अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर पा रही है और भाजपा अभी भी हाशिए पर ही है। ऐसे में पंजाब की राजनीति अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है और आशंका जताई जा रही है कि यह स्थिति कट्टरपंथी तत्वों के लिए जगह बना सकती है।
तिवारी ने कहा कि पंजाब को अपने अस्तित्व के संकट से निपटने के लिए विभिन्न दलों के बीच राजनीतिक सहमति की आवश्यकता है। या फिर उसे 60 महीनों के लिए ऐसी सरकार की आवश्यकता है जो सत्ता में दोबारा आने में रुचि न रखती हो और राज्य को पटरी पर लाने के लिए कड़े फैसले ले सके।
गुरुग्राम पुलिस ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के विवादित वीडियो के मामले में अब तक पंजाब पुलिस के दो अफसरों से पूछताछ नहीं की है। पंजाब की सियासत में बीते दिनों एक वीडियो को लेकर काफी हंगामा हुआ था। दावा किया गया था कि यह वीडियो भगवंत मान का ही है जबकि सीएम मान ने इससे पूरी तरह इनकार किया है। पढ़ें पूरी खबर।
