protest against supreme court verdict on ban on jallikattu - Jansatta
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तमिलनाडु में जल्लीकट्टू पर बैन नहीं हटाने के विरोध में उतरे लोग, सुप्रीम कोर्ट ने कहा-फैसले पर सवाल मत उठाओ

पोंगल से पहले तमिलनाडु में होने वाले जल्लीकट्टू पर राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को खारिज कर दिया था

2010 से 2014 के बीच जल्लीकट्टू खेलते हुए 17 लोगों की जान गई थी और 1,100 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे। (फोटो-पीटीआई)

पोंगल से पहले तमिलनाडु में होने वाले जल्लीकट्टू के आयोजन पर राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज होने के बाद लोगों का गुस्सा भड़क गया। आज (13 जनवरी) को तमिलनाडु में इसका विरोध तेज हो गया है। डीएमके के कार्यकारी अध्यक्ष स्टालिन की अगुआई में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं और राज्य के सचिवालय के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। स्टालिन के साथ कनिमोझी भी हैं। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त होते हुए कहा कि हमारे फैसले पर सवाल मत खड़ा कीजिए, हम किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर तमिलनाडु के वकीलों को भी लताड़ लगाई है।

स्टालिन ने लोगों से कहा कि जल्लीकट्टू हमारी परंपरा है और राज्य व केंद्र सरकार इसके आयोजन की मंजूरी दिलाने में नाकाम रही हैं। स्टालिन ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दखल देने की मांग की। वहीं सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार ने शुक्रवार को कहा कि जल्लीकट्टू के लिए कोई भी अध्यादेश नहीं लाया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार ने कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है और वही इसे लेकर आखिरी आदेश देगा। गुरुवार को राज्य के मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेलवम ने कहा कि उनकी कोशिशों के बावजूद इस बार पोंगल पर जल्लीकट्टू के आयोजन पर सकारात्मक संकेत दिखाई नहीं दे रहे हैं।

आपको बता दें कि जल्लीकट्टू पर्व पर लगे बैन को हटाने को लेकर दायर की गई याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आदेश का ड्राफ्ट तैयार है, लेकिन शनिवार से पहले फैसला सुनना संभव ही नहीं है। शनिवार 14 जनवरी को ही तमिलनाडु में पोंगल मनाया जाएगा, जिसमें जल्लीकट्टू खेल भी होता है। शीर्ष अदालत ने सबसे पहले साल 2014 में इस खेल पर यह कहते हुए बैन लगाया था कि यह जानवरों के प्रति क्रूरता है।

यह है जल्लीकट्टू ?

जल्लीकट्टू तमिलनाडु का एक परंपरागत खेल है, जिसमें बैल को काबू में किया जाता है। यह खेल काफी सालों से तमिलनाडु में लोगों द्वारा खेला जाता है। तमिलनाडु में मकर संक्रांति का पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है। इस खास मौके पर जल्लीकट्टू के अलावा बैल दौड़ का भी काफी जगहों पर आयोजन किया जाता है। एक्सपर्ट मानते हैं कि जल्लीकट्टू तमिल शब्द सल्ली और कट्टू से मिलकर बना है। जिनका मतलब सोना-चांदी के सिक्के होता है जो कि सांड के सींग पर टंगे होते हैं। बाद में सल्ली की जगह जल्ली शब्द ने ले ली ।

कब शुरू हुआ ?

माना जाता है कि सिंधु सभ्यता के वक्त जो अय्यर और यादव लोग तमिल में रहते थे उनके लिए सांड पालना आम बात थी। बाद में यह साहस और बल दिखाने वाली बात बन गई। बाद में बैल को काबू करने वाले को इनाम और सम्मान दिया जाने लगा। किसी सांड को  काबू करने की प्रथा लगभग 2,500 साल पुरानी कही जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के बैन के बावजूद नाम तमिलर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जल्लीकट्टू का किया आयोजन, देखें वीडियो ः

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