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पीएम इन वेटिंग के बाद प्रेसिडेंट इन वेटिंग ही बनकर रह गये बीजेपी के पितामह लालकृष्ण आडवाणी

9 जून 2013 को गोवा में हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जब नरेन्द्र मोदी का नाम प्रचार समिति के प्रमुख के रुप में किया गया तो आडवाणी इस बैठक में नहीं पहुंचे.
Author June 19, 2017 21:23 pm
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के सीनियर नेता लाल कृष्ण आडवाणी। (फाइल फोटो)

बिहार के वर्तमान राज्यपाल राम नाथ कोविंद एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार होंगे। इसी के साथ देश के अगले राष्ट्रपति को लेकर कयासों का बादल छंट गया है। वर्तमान राजनीतिक गणित के मुताबिक राम नाथ कोविंद का राष्ट्रपति बनना लगभग तय है। इस घोषणा के साथ ही राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदारों में से एक और बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी के राष्ट्रपति बनने की संभावनाएं खत्म हो गई है। इस फैसले के साथ ही भारतीय जनता पार्टी के पितामह लालकृष्ण आडवाणी पीएम इन वेटिंग के बाद अब प्रेसिडेंट इन वेटिंग बनकर ही अपनी राजनीतिक पारी के अवसान की ओर बढ़ चले हैं। 89 साल के बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य लालकृष्ण आडवाणी अब बीजेपी में किस रोल में हैं इस सवाल का उत्तर अब शायद वह ही जानते हैं।

बता दें कि राष्ट्रपति चुनाव की घोषणा से कई महीने पहले ही मीडिया और राजनीतिक हलको में ये चर्चा चल रही थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने राजनीतिक गुरु लालकृष्ण आडवाणी को गुरुदक्षिण स्वरुप देश का राष्ट्रपति पद सौपेंगे। लेकिन आज इन सारी चर्चाओं पर विराम लग गया है। मीडिया में ऐसी चर्चाएं आईं थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद ही लाल कृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति बनवाना चाहते हैं। खबरों के मुताबिक इसी साल मार्च महीने में सोमनाथ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और लालकृष्ण आडवाणी के बीच एक मुलाकात हुई थी। इस मीटिंग में नरेन्द्र मोदी ने संकेत दिया था कि अगर यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी के पक्ष में हुए तो वे आडवाणी को राष्ट्रपति पद पर देखना चाहेंगे।

आडवाणी को राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी क्यों नहीं मिली इसे समझने के लिए बीजेपी और देश की सियासत के पिछले 25 सालों के घटनाक्रम का अध्ययन जरूरी है। 9 जून 2013 को गोवा में हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जब नरेन्द्र मोदी का नाम प्रचार समिति के प्रमुख के रुप में किया गया तो आडवाणी इस बैठक में नहीं पहुंचे. 13 सितबंर 2013 को बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक में नरेन्द्र मोदी का नाम पीएम पद के उम्मीदवार के रुप में किया जाना था तो भी आडवाणी इस बैठक में नहीं पहुंचे। और बीजेपी ने अपने स्टार लीडर की गैरहाजिरी में ही नरेन्द्र मोदी का नाम पीएम कैंडिडेट के लिए अनाउंस किया। तब आडवाणी ने पार्टी को एक चिट्ठी लिखी और कहा कि बीजेपी एक व्यक्ति के स्वार्थ की पूर्ति के लिए दीन दयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अटल बिहारी वाजपेयी के सिद्धातों से भटक गई है।

लेकिन बीजेपी के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कभी लालकृष्ण आडवाणी के दुलारे थे। 1990 में आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या का प्रसिद्ध रथयात्रा शुरू की थी तो उन्होंने अपने सारथी के रुप में नरेन्द्र मोदी को चुना किया था। देश की सियासत में हलचल मचा देने वाले 2002 के गुजरात दंगों के दौरान भी आडवाणी चट्टान की तरह मोदी के पक्ष में खड़े हो गये, मोदी पर कई आरोप लगे और उन्हें सीएम पद से हटाने की मांग उठी, लेकिन उन्हें आडवाणी का वरदहस्त हासिल था और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा नरेन्द्र मोदी को “राजधर्म पालन” की नसीहत देने के बावजूद वे गुजरात के सीएम बने रहे।

लेकिन मोदी द्वारा गुजरात में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ही समीकरण बदल गया। मोदी अब 7 आरसीआर की दावेदारी ठोंक रहे थे और आडवाणी को मोदी की उभरती शख्सियत में अपना प्रतिद्वन्दी साफ झलक रहा था। 2014 में प्रचंड बहुमत से जीत के बाद मोदी ने मार्गदर्शक मंडल बनाकर आडवाणी की भूमिका तय कर दी। कहा जाता है कि तभी से बीजेपी के दोनों पावर सेन्टर के बीच अघोषित शीत युद्ध चलता रहता है। लेकिन आज के इस फैसले के साथ ही पीएम नरेन्द्र मोदी ने आडवाणी को त्रासद नायकों सूची में हमेशा के लिए डाल दिया है।

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