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राष्ट्रपति ने खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता जताई

भूमि की उपलब्धता घटने के साथ बढ़ती आबादी का हवाला देते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश में खाद्यान्न और स्वच्छ जल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक संसाधन..
Author पंतनगर (उत्तराखंड) | November 17, 2015 23:57 pm
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी। (पीटीआई फोटो)

भूमि की उपलब्धता घटने के साथ बढ़ती आबादी का हवाला देते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश में खाद्यान्न और स्वच्छ जल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक संसाधन बचाने रक्षा के उपायों पर आज जोर दिया। करीबन 12 करोड़ हेक्टेयर भूमि के निम्नीकरण के विभिन्न चरणों में होने का हवाला देते हुए उन्होंने भूमि के अधिक टिकाऊ व्यवस्था के इस्तेमाल और भूमि प्रबंधन दस्तूर अपनाने पर जोर दिया।

मुखर्जी ने कहा, ‘हमने तब खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों से पार पाया। लेकिन अब क्या होगा, जब हमारा सामना कृषि के लिए घटती भूमि उपलब्धता के साथ बढ़ती आबादी से हो रहा है। जब मृदा के स्वास्थ्य में गिरावट आ रही है और पानी की गुणवत्ता कृषि उत्पादकता को घटा रही है।’ उन्होंने कहा कि खाद्य सुरक्षा के अनेक आयाम हैं। खाद्यान्न उत्पादन में पोषाहार का स्तर आबादी में खाद्यान्न की प्रचुरता का एक महत्त्वपूर्ण निर्धारक है।

वैश्विक भूख सूचकांक 2015 में भारत 104 देशों में 80 वें स्थान पर है। इस सूचकांक में तीन सूचक-अल्प पोषाहार, बच्चे का जरूरत से कम वजन का होना और शिशु मृत्यु दर शामिल है। मुखर्जी ने कहा, ‘यह बिल्कुल अस्वीकार्य है। हमें अपनी आबादी के पोषाहार की स्थिति में समयबद्ध तरीके से सुधार करना है।’

मुखर्जी ने कहा कि लोगों को हमारे प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने के लिए कठोर परिश्रम करना चाहिए ताकि भोजन और स्वच्छ जल जैसी सेवाएं लगातार मिलती रहें। जलवायु और कीड़ों से बचाव जैसी सेवाओं का नियमन, सांस्कृतिक सेवा यथा शैक्षणिक और पारिस्थितिकी-पर्यटन और मृदा निर्माण और पोषक चक्रण जैसी सेवाओं का समर्थन करना चाहिए।

गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के 29 वें दीक्षांत समारोह में छात्रों और कर्मचारियों को संबोधित करते हुए मुखर्जी ने कहा कि कृषि देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य सहारा है। उन्होंने कहा, ‘50 फीसद से अधिक आबादी आजीविका के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर करती है। इसका स्वस्थ विकास खाद्य सुरक्षा की गुणवत्ता का निर्धारण करता है।’ उन्होंने कहा, ‘कृषि को हमारे नीति निर्माण में हमेशा शीर्ष प्राथमिकता मिली है क्योंकि अपनी योजना प्रक्रिया की शुरुआत में हमने पहचाना कि हमें खुद अपनी बढ़ती आबादी का पोषण करना है, जो आज 1.28 अरब है।’ संस्थान की स्थापना 1960 में की गई थी। देश में स्थापित होने वाला यह पहला कृषि विश्वविद्यालय है। इसे हरित क्रांति की जन्मस्थली भी माना जाता है।

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