Bengaluru News: बेंगलुरु पुलिस ने जुलाई के महीने में बांग्लादेश से आई एक कथित अवैध प्रवासी अस्मा खातून को हिरासत में लिया था, तो उन्हें लगा की उसे वापस भेजने की प्रक्रिया सामान्य होगी। लेकिन अस्मा खातून आठ महीने की गर्भवती थी। इसके बाद पुलिस की एक टीम ने उसकी सेहत पर नजर रखी, सुरक्षित डिलीवरी सुनिश्चित की और बाद में उसे वापस भेजने की प्रक्रिया के दौरान उसकी नवजात बेटी की देखभाल की।

रबीबुल बादशाह की पत्नी खातून को 17 जुलाई को ‘ऑपरेशन मुक्ता’ के तहत हिरासत में लिया गया था, क्योंकि उन पर परप्पना अग्रहारा पुलिस स्टेशन क्षेत्र में अवैध रूप से रहने का आरोप था। उन्हें बाद में एफआरआरओ के समक्ष पेश किया गया और उसके निर्देशों के अनुसार, एक स्पेशल वार्ड में डिटेंशन सेंटर में रखा गया।

उसके मामले को संभालने वाले पुलिसकर्मी उसके साथ मेडिकल चेक-अप के लिए जाने लगे, जरूरी चीजों का इंतजाम करने लगे और यह पक्का करने लगे कि उसे प्रेगनेंसी के दौरान जरूरी देखभाल मिले। एक महीने से कुछ ज्यादा समय बाद 24 अगस्त को खातून को प्रसव पीड़ा हुई और उसने अपनी दूसरी बेटी को जन्म दिया।

इसका मतलब यह था कि पुलिस को अब उसकी और उसकी चार साल की बेटी की देश-निकासी सुनिश्चित करनी थी और साथ ही एक नवजात बच्चे की देखभाल भी करनी थी, जब उन्हें आखिरकार पश्चिम बंगाल के मालदा भेजा जाएगा, जहां से उन्हें बांग्लादेश भेजा जाना था।

एक गर्भवती पुलिस अधिकारी की देखरेख में थी खातून

परप्पना अग्रहारा पुलिस स्टेशन की पुलिस सब-इंस्पेक्टर कलावती ने बताया कि खातून के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। कलावती खुद भी छह महीने की गर्भवती हैं। उनको यह सुनिश्चित करने का जिम्मा सौंपा गया था कि खातून को जरूरी देखभाल मिले।

कलावती ने कहा, “चूंकि वह गर्भावस्था के आठवें महीने में थी, इसलिए हम उसे नियमित जांच और स्कैन के लिए सरकारी अस्पतालों में ले जाते थे। चूंकि उसका इलाज सरकारी अस्पतालों में हो रहा था, इसलिए मेडिकल खर्च ज्यादा नहीं था। हालांकि, हमने यह सुनिश्चित किया कि उसकी अन्य सभी जरूरी चीजें उपलब्ध कराए जाएं।”

खातून को स्पेशल वार्ड में रखा गया

खातून को अस्पताल के एक स्पेशल वार्ड में रखा गया था, जहां महिला पुलिसकर्मी बारी-बारी से उसकी देखभाल करती थीं। कलावती ने बताया, “हर दिन हममें से कोई न कोई उसके साथ होता था। महिला कांस्टेबल और अधिकारी बारी-बारी से उसकी देखभाल करती थीं।”

24 अगस्त को जब अस्मा को प्रसव पीड़ा शुरू हुई, तो महिला पुलिस कांस्टेबल चंद्रकला उनके साथ गईं। उन्हें शिवाजीनगर के घोष अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्होंने अपनी दूसरी बेटी को जन्म दिया। अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान ही पुलिस को पता चला कि खातून को चिकनपॉक्स हो गया था।

खातून 28 अगस्त तक अस्पताल में रहीं

कलावती ने कहा, “प्रसव के बाद भी, हमने यह सुनिश्चित किया कि उसे हर आवश्यक चीज मिले। अधिकारियों ने सहयोग किया और मां और नवजात शिशु दोनों की जरूरतों का ख्याल रखा।” खातून 28 अगस्त तक अस्पताल में रहीं। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद उन्हें और उनके बच्चे को वापस सेंटर ले जाया गया और एफआरआरओ के डिपोर्टेशन ऑर्डर पर अमल होने तक पुलिसकर्मी वहां की व्यवस्थाओं पर नजर रखते रहे।

बच्चा सिर्फ नौ दिन का था, इसलिए मां और बच्चे को मालदा ले जाने के लिए खास इंतजाम करने पड़े। खातून के साथ जाने और बेंगलुरु रेलवे स्टेशन से मालदा तक के सफर में नवजात बच्चे की देखभाल के लिए महिला हेड कॉन्स्टेबल शीला को तैनात किया गया।

पुलिसकर्मियों ने नवजात बच्चे के लिए खाना, कपड़े और बेबी सूट का इंतजाम किया। उन्होंने यह भी पक्का किया कि 30 अगस्त को सफर के दौरान मां और बच्चे के पास सभी जरूरी चीजें हों।

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