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अबूझ पहेलियों से कम नहीं नतीजा पूर्व सर्वेक्षण

नतीजा पूर्व सर्वेक्षणों शुरुआत से ही इन सर्वेक्षणों के परिणामों की शुद्धता और विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगता रहा है।

EVM, BJP, UP Election 2022
प्रतीकात्मक तस्वीर

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए सोमवार को मतदान के आखिरी चरण के संपन्न होने के बाद कई समाचार चैनलों ने विभिन्न एजंसियों के साथ मिलकर नतीजा पूर्व सर्वेक्षण (एग्जिट पोल) जारी किए। इनमें से अधिकतर ने उत्तर प्रदेश व मणिपुर में भारतीय जनता पार्टी, पंजाब में आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड व गोवा में किसी पार्टी को नहीं जीतने के संकेत दिए।

अब सवाल यह उठता है कि नतीजा पूर्व सर्वेक्षणों पर कितना भरोसा किया जा सकता है? अतीत के अनुभव पर निगाह डालें तो हम पाते हैं कि ये सर्वेक्षण चुनाव के दौरान बने बड़े चित्र पर तो प्रकाश डालते हैं लेकिन मतगणना के बाद अंतिम परिणाम से दूर नजर आते हैं। अतीत में कई ऐसे मौके भी आए जब ये सर्वेक्षण बड़े चित्र को खींचने में भी विफल रहे।

नतीजा पूर्व सर्वेक्षणों शुरुआत से ही इन सर्वेक्षणों के परिणामों की शुद्धता और विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगता रहा है। इन सर्वेक्षणों में मतदाताओं से विभिन्न सवाल पूछकर यह तय किया जाता है कि उन्होंने किस को अपना मत दिया होगा। और इसी के आधार पर अनुमान लगाया जाता है। भारत में 1957 में नतीजा पूर्व सर्वेक्षणों की शुरुआत हुई। तब से अब तक कुछ सर्वेक्षण सही साबित हुए तो कुछ मतदाताओं की नब्ज को टटोलने में विफल रहे।

साल 2014 में हुए आम चुनावों के समय हुए नतीजा पूर्व सर्वेक्षणों का मिलाजुला अनुभव रहा। अधिकतर सर्वेक्षणों में कहा गया कि भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) केंद्र में सरकार बनाने के करीब तो पहुंच जाएगा लेकिन उसे कुछ सीटों की कमी पड़ेगी। सिर्फ एक सर्वेक्षण में कहा गया था कि राजग को पूर्ण बहुमत मिल जाएगा। जब मतगणना के बाद परिणाम आए तो भाजपा अपने दम पर ही बहुमत का आंकड़ा पार कर गई।

वहीं, राजग के खाते में कुल 336 सीटें आर्इं जबकि कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट कर रह गई। दूसरी ओर, 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान स्थिति बिलकुल उलटी रही। अधिकतर नतीजा पूर्व सर्वेक्षणों में कहा गया कि जद (एकी) और राजद के गठबंधन पर भाजपा भारी पड़ेगी। जब परिणाम आए तो इसका उलटा हुआ। गठबंधन को 178 सीटें मिलीं जबकि भाजपा को 58 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा।

इसी तरह हाल के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अधिकतर सर्वेक्षणों ने भारतीय जनता पार्टी को बहुमत मिलने की ओर इशारा किया था लेकिन जब नतीजे आए तो भाजपा 76 सीटों तक पहुंची। इसी तरह हरियाणा विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 80 सीट तक मिलने तक तक अनुमान दिया गया और कांग्रेस को महज तीन सीट। लेकिन जब नतीजे आए तो भाजपा आधी ही सीट पा सकी।

साल 1996 में नतीजा पूर्व सर्वेक्षण में लोकसभा में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलने की बात कही गई थी। जब परिणाम आए तो यह बात सही साबित हुई। भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में तो उभरी लेकिन संसद के निचले सदन में किसी को बहुमत नहीं मिला था। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 13 दिन की सरकार चली और वाजपेयी सदन में बहुमत नहीं जुटा पाए।

इसके बाद एचडी देवेगोड़ा और आइके गुजराल के नेतृत्व में सरकारें चलीं। वर्ष 1998 में लोकसभा चुनाव के दौरान भी नतीजा पूर्व सर्वेक्षण सही साबित हुए थे। इन सर्वेक्षणों में भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को 200 से अधिक सीटों का अनुमान लगाया गया था। जब परिणाम आए तो राजग को 252 सीटें प्राप्ट हुर्इं। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को इस चुनाव में 119 सीटें मिलीं।

उत्तर प्रदेश का नतीजा पूर्व सर्वेक्षण

उत्तर प्रदेश में साल 2012 में हुए चुनाव में नतीजा पूर्व सर्वेक्षण में समाजवादी पार्टी को उनके विरोधियों से बेहतर प्रदर्शन के साथ ही त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणी की गई थी। चुनाव परिणाम आने के बाद समाजवादी पार्टी ने 403 विधानसभा में 224 सीटें जीतकर शानदार जीत दर्ज की। मायावती की बहुजन समाज पार्टी को 80 सीटें मिलीं। वहीं, भाजपा और कांग्रेस क्रमश: केवल 47 और 28 सीटें ही जीतने में कामयाब हो सकीं। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में अधिकतर नतीजा पूर्व सर्वेक्षण सही साबित हुए थे। उस दौरान नतीजा पूर्व सर्वेक्षणों में भाजपा के लिए पूर्ण बहुमत की भविष्यवाणी की गई थी।

मोदी लहर में भाजपा ने 14 साल बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता पर वापसी की। राज्य में भाजपा को तीन-चौथाई बहुमत मिला था। वहीं, समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन और बसपा कहीं टिके नहीं पाए। 403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा ने 312 सीटें हासिल कर सरकार बनाई थी।सहयोगी दलों की सीटें मिलाने के बाद कुल सीटों की संख्या 325 हो गई थीं। वहीं, सपा ने 47 और कांग्रेस ने सात सीटें जीती थीं। बसपा ने 19 सीटों पर जीत दर्ज की थी।

सर्वेक्षणों में मतदाता से अधिक ध्यान मतदान पर

दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान के शिक्षक सुनील के चौधरी ने बताया कि वर्तमान में चुनाव सर्वेक्षण विज्ञान मतदाता से अधिक मतदान पर ध्यान दे रहा है। इस दौरान किस दल को कितनी सीटें मिलेगी यह प्राथमिकता होती है जबकि मतदाता विभिन्न मुद्दों को लेकर मतदाता का व्यवहार कैसे बदल रहा है प्राथमिकता होनी चाहिए। चौधरी के मुताबिक जितने भी सर्वेक्षण होते हैं वे चयनित होते हैं जबकि इन्हें समग्र होना चाहिए। यानी ये सर्वेक्षण कुछ क्षेत्रों में ही किए जाते हैं और उनके आधार पर अनुमान लगाया जाता है। इसके अलावा ये सर्वेक्षण बाजार से जुड़ गए हैं जिसकी वजह से इनके परिणाम अकसर सही नहीं होते हैं।

नतीजा पूर्व सर्वेक्षणों शुरुआत से ही इन सर्वेक्षणों के परिणामों की शुद्धता और विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगता रहा है। इन सर्वेक्षणों में मतदाताओं से विभिन्न सवाल पूछकर यह तय किया जाता है कि उन्होंने किस को अपना मत दिया होगा। और इसी के आधार पर अनुमान लगाया जाता है। भारत में 1957 में नतीजा पूर्व सर्वेक्षणों की शुरुआत हुई। तब से अब तक कुछ सर्वेक्षण सही साबित हुए तो कुछ मतदाताओं की नब्ज को टटोलने में विफल रहे।

उत्तर प्रदेश में साल 2012 में हुए चुनाव में नतीजा पूर्व सर्वेक्षण में समाजवादी पार्टी को उनके विरोधियों से बेहतर प्रदर्शन के साथ ही त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणी की गई थी। चुनाव परिणाम आने के बाद समाजवादी पार्टी ने 224 सीटें मिली थीं।

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