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प्रणब मुखर्जी का विदाई भाषण: राष्‍ट्रपति ने कहा- लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं

राष्‍ट्रपति ने अपने विदाई भाषण में लोकतंत्र में बहस की जरूरत समझाई और हिंसा से दूर रहने की हिदायत दी।

भारतीय गणतंत्री के 13वें राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी। (Source: PTI)

भारत के 13वें राष्‍ट्राध्‍यक्ष प्रणब मुखर्जी ने सोमवार (24 जुलाई) शाम को आखिरी बार राष्‍ट्र को संबोधित किया। अपने विदाई भाषण में राष्‍ट्रपति ने लोकतंत्र के मूल्‍यों की याद दिलाई और एक बेहतर भविष्‍य की बुनियाद के सूत्र भी बताए। राष्‍ट्रपति ने कहा, ”मैं भारत के लोगों के प्रति कृतज्ञता जाहिर करता हूं जिन्‍होंने मुझपर इतना विश्‍वास किया। मैंने इस देश को जितना दिया है, उससे कहीं ज्‍यादा मुझे वापस मिला है। मैं सदैव भारत के लोगों का ऋणी रहूंगा।” राष्‍ट्रपति ने आगे कहा, ”विकास को साकार होने के लिए, देश के गरीबों को यह लगना चाहिए कि वे भी मुख्‍यधारा का हिस्‍सा हैं।” मुखर्जी ने कहा, ”5 साल पहले, जब मैंने राष्‍ट्रपति पद की शपथ ली थी, तब मैंने संविधान के संरक्षण और रक्षा की कसम खाई थी। इन पांच सालों के हर एक दिन पर, मुझे अपनी जिम्‍मेदारी का भान था। मैं अपनी जिम्‍मेदारियां निभाने में कितना सफल रहा, इसका फैसला समय करेगा, इतिहास के चश्‍मे से। पिछले पचास सालों के सार्वजनिक जीवन में, मेरी पवित्र किताब संविधान रहा है। भारत की संसद मेरा मंदिर रही है और लोगों की सेवा करना मेरा जुनून।”

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राष्‍ट्रपति ने अपने विदाई भाषण में लोकतंत्र में बहस की जरूरत समझाई और हिंसा से दूर रहने की हिदायत दी। उन्‍होंने कहा, ”भारत की आत्‍मा बहुवाद और सहिष्‍णुता में बसती है। सदियों तक विचारों के आदान-प्रदान से हमारा समाज बहुमुखी हो गया है। संस्‍कृति, विश्‍वास और भाषा में इतनी विविधता ही भारत को विशेष बनाती है। हमें अपनी ताकत सहिष्‍णुता से मिलती है, यह सदियों से हमारी सामूहिक चेतना का अंग रहा है। सार्वजनिक जीवन में विभिन्‍न मत हो सकते हैं, हम बहस कर सकते हैं, हम सहमत हो सकते हैं, हम असहमत हो सकते हैं, मगर हम विभिन्‍न मतों की मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं कर सकते। अन्‍यथा हमारी सोच का एक मूल चरित्र कहीं गायब हो जायेगा। हमें सार्वजनिक जीवन को किसी भी प्रकार की हिंसा, शारीरिक या जुबानी, से मुक्‍त करना होगा। सिर्फ एक अहिंसक समाज ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सभी हिस्‍सों की भागीदारी को निश्‍चिंत कर सकता है।”

मुखर्जी ने कहा, ”हमारे विश्‍वविद्यालय केवल रट्टा मारने की जगह नहीं, बल्कि बेहतरीन दिमागों का संगम होने चाहिए। हमें गरीब से गरीब को उठाना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी नीतियों का लाभ आखिरी व्‍यक्ति तक पहुंचे। गरीबी के उन्‍मूलन से खुशहाली को पंख लगेंगे।

मुखर्जी ने भाषण के अंत में कहा, ”राष्‍ट्रपति भवन में अपने पांच सालों के दौरान, हमने एक मानवीय और खुशहाल राष्‍ट्र बनाने का प्रयास किया। कल जब मैं आपसे बात करूंगा तो एक नागरिक की तरह, यह एक तीर्थयात्रा के जैसा है जो भारत को शिखर पर ले जा रही है।”

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