Posting Crisis Over NJAC Bar Association Raise Question in Supreme Court - Jansatta
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जजों की नियुक्ति के नए क़ानून ‘एनजेएसी’ पर उठे सवाल

प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के लिए दो सदस्यों की चयन के लिए बैठक में शामिल होने से इनकार करने के एक दिन बाद ही विभिन्न बार संगठनों...

सुप्रीम कोर्ट

प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के लिए दो सदस्यों की चयन के लिए बैठक में शामिल होने से इनकार करने के एक दिन बाद ही विभिन्न बार संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट से मंगलवार को कहा कि जजों की नियुक्ति के बारे में नया कानून वैधानिकता की कसौटी पर टिक नहीं सकता क्योंकि यह संविधान के ‘बुनियादी ढांचे का’ उल्लंघन करता है।

न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ वकील फली नरिमन ने दलील दी कि इससे बुनियादी ढांचे का हनन होता है क्योंकि जिस संस्था (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) को सृजन किया जाना है उसमें उसकी मुख्य बातें नहीं है जिसका स्थान वह लेगा।

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन, बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया और कुछ अन्य ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून 2014 और 99वें संविधान संशोधन कानून 2014 की वैधानिकता को चुनौती दे रखी है। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल शामिल हैं। नरिमन ने तमाम फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि न्यायाधीशों के चयन के मामले में प्रधान न्यायाधीश को महत्त्व या प्रमुखता नहीं दी गई है और वैसे भी यहां सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका की स्वतंत्रता बुनियादी ढांचे का हिस्सा है।

इसके बाद उन्होंने छह सदस्यीय आयोग के संविधान का हवाला दिया और सवाल किया कि यदि किसी जज की नियुक्ति के सवाल पर आयोग में एकसमान विभाजन हो गया तो कौन निर्णय करेगा। प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले छह सदस्यीय अयोग में सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जजों के साथ ही कानून मंत्री और दो प्रबुद्ध नागरिक शामिल हैं। नरिमन ने कहा कि इसमें न्यायपालिका की राय को प्रमुखता नहीं दी गई है। उन्होंने दलील दी कि हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की इस आयोग में भागीदारी नहीं है और वे सिर्फ अपनी सिफारिश आयोग के पास भेज सकते हैं। उन्होंने कहा कि नए कानून में यह बहुत बड़ी खामी है।

नरिमन ने कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून में शीर्ष अदालत के तीन वरिष्ठतम जजों को प्रमुखता नहीं दी गई है जबकि वेंकटचलैया आयोग ने इसकी सिफारिश की थी। बार एसोसिएशन आफ इंडिया की ओर से वरिष्ठ वकील अनिल दीवान ने नरिमन की दलीलों का समर्थन किया और कहा कि इसके (आयोग) के गठन करने के तरीके ने संविधान के बुनियादी ढांचे को बदल दिया है। उन्होंने कहा कि इन दोनों कानूनों का न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रत्यक्ष और अवश्यंभावी प्रभाव पर गौर करना होगा।

इस पर संविधान पीठ ने कहा-हम इन कानूनों पर आज की स्थिति के अनुरूप ही गौर करेंगे। दीवान ने कहा कि अनुच्छेद 368 संसद को संविधान के बुनियादी ढांचे को बदलने की अनुमति नहीं देता है। न्यायाधीशों की वरिष्ठता लांघने के मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि नए कानून के तहत जजों की नियुक्ति के मामले में न्यायपालिका की प्रमुखता की परंपरा टूट सकती है। उन्होंने कहा कि यदि संविधान को बदला जा सकता है तो परंपराओं को भी बदला जा सकता है। दिन भर की सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने वरिष्ठता के सवाल पर कहा कि वरिष्ठता के पहलू की वजह से ही न्यायिक नियुक्तियां प्रभावित हुई हैं।

इस पर न्यायाधीशों ने टिप्पणी की कि यदि वरिष्ठता कोई पैमाना नहीं होगा तो न्यायिक पद के लिए निचले पायदान का कोई कार्यपालिका को उपकृत कर सकता है। नरिमन और दीवान ने मंगलवार को अपनी बहस पूरी कर ली और इसके बाद सर्विस बार एसोसिएशन आफ मद्रास हाई कोर्ट की ओर से वरिष्ठ वकील अरविंद पी दातार ने बहस शुरू की।

नरिमन की दलील

* सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट आन रिकार्ड एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ वकील फली नरिमन ने दलील दी कि इससे बुनियादी ढांचे का हनन होता है क्योंकि जिस संस्था (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) को सृजन किया जाना है उसमें उसकी मुख्य बातें नहीं है जिसका स्थान वह लेगा।

* नरिमन ने तमाम फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि न्यायाधीशों के चयन के मामले में प्रधान न्यायाधीश को महत्त्व या प्रमुखता नहीं दी गई है और वैसे भी यहां सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका की स्वतंत्रता बुनियादी ढांचे का हिस्सा है।

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