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कांग्रेस में अब होगा नया बवाल

पांच मार्च की अंतिम बातचीत में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और नई दिल्ली के सांसद रहे अजय माकन ने गठबंधन का पक्ष लेकर आने वाली रणनीति के संकेत दे दिए।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और शीली दीक्षित (File Photo)

दिल्ली की 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के राजनीतिक कद का लाभ उठाकर दिल्ली के कांग्रेसी नेताओं ने दिल्ली में अपने बूते लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला तो करवा लिया लेकिन अब गठबंधन के बूते चुनाव लड़ने वाले नेताओं को चुनाव लड़वाना कठिन लग रहा है। खुद शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित के भोपाल से चुनाव लड़ने की चर्चा है। इसी की आड़ लेकर दिल्ली के कई कद्दावर नेता चुनाव से पलायन करने वाले हैं। पहले तो कहा जाता था कि दिल्ली कांग्रेस के सारे नेता आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ने के खिलाफ हैं जबकि चांदनी चौक के पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल जैसे नेता भा गठबंधन के हिमायती हैं। पांच मार्च की अंतिम बातचीत में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और नई दिल्ली के सांसद रहे अजय माकन ने गठबंधन का पक्ष लेकर आने वाली रणनीति के संकेत दे दिए। वे भले कहें कि ऐसा उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का मान रखने के लिए किया लेकिन तय है कि वे आसानी से नए समीकरण में चुनाव लड़ने को तैयार नहीं होंगें।

दिल्ली पर राज कर रही ‘आप’ की पूरी ताकत ही कांग्रेस के पुराने मतदाता रहे हैं। कांग्रेस उनसे ही मुकाबला करके 2017 के निगम चुनाव में 22 फीसद वोट ला पाई थी। यह माना जा रहा है कि अगर कांग्रेस के कुछ नेता तब बगावत नहीं करते तो भाजपा के मुकाबले कांग्रेस दूसरे नंबर पर होती। कांग्रेस को वोटकटवा साबित करने की होड़ में लगे ‘आप’ के नेताओं को कांग्रेस के कुछ नेताओं का साथ मिला। दिल्ली की राजनीति करने वाले कांग्रेस नेताओं को यह लगने लगा कि अगर पार्टी के वोट कब्जाने वाले और लगातार कांग्रेस पर तरह-तरह के आरोप लगाने वाले ‘आप’ से तालमेल करके कांग्रेस जो भी हासिल करेगी उसका श्रेय ‘आप’ को जाएगा। मंगलवार को राहुल गांधी के साथ हुई बैठक में दस में से आठ नेताओं ने यही कहा कि डूबते हुए ‘आप’ को कांग्रेस क्यों सहायता देना चाहती है।

केवल दो नेता प्रभारी महासचिव पीसी चाको और अजय माकन गठबंधन के पक्ष में बोले। दिल्ली के राजनीतिक समीकरण अलग तरह के रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा में सीधा मुकाबला होते रहने पर देश की हवा का दिल्ली पर असर होता है। 1977 में सातों साटें जनता पार्टी को मिली तो 1980 में नई दिल्ली सीट पर चुनाव लड़ रहे अटल बिहारी वाजपेयी के अलावा छह सीटें कांग्रेस ने जीती। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में सभी सीटें कांग्रेस ने जीतीं जबकि 1989 में सातों सीटें कांग्रेस हारी। 1991 और 1996 में भाजपा ने पांच-पांच, 1998 में छह और 1999 में सातों सीटें भाजपा ने जीतीं। 2004 में कांग्रेस को छह और 2009 में सातों सीटें कांग्रेस ने जीतीं। 2014 में देश में हवा बदली और सभी सीटें वापस भाजपा ने जीतीं। इस बार कोई हवा अभी तक दिख नहीं रही है।

2015 के विधानसभा चुनाव में ‘आप’ को 70 विधानसभा में 67 सीटों और 54 फीसद वोट मिले। वहीं ‘आप’ उसके बाद के हर चुनाव में कमजोर होती गई। राजौरा गार्डन विधानसभा उपचुनाव में उसके उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई। 2017 के निगम चुनाव में अगर बगावत न होती तो कांग्रेस दूसरे नंबर पर होती जैसा राजौरी गार्डन विधानसभा उपचुनाव और 2016 में निगमों के उपचुनाव में हुआ था। पिछले साल दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव (डूसू) में भले ही भाजपा समर्थित छात्र संगठन एबीवीपी ने ज्यादातर सीटें जीतीं लेकिन कांग्रेस की छात्र शाखा एनएसयूआइ एक प्रमुख सीट जीत गई और परिषद को कड़ी टक्कर दे पाई। ‘आप’ की छात्र सीवाइएसएस चुनाव में कहीं नजर नहीं आईं।

सितंबर में माकन ने अपनी बीमारी के चलते प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया तो पार्टी ने उसे स्वीकारने में चार महीने लगा दिए। अब तो यह लगने लगा है कि वे ‘आप’ से समझौते के विवाद से अपने को अलग रखने के लिए इस्तीफा दिया। जिस तरह से 2015 के विधानसभा चुनाव में तब प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली घोषित होने के बाद चुनाव नहीं लड़े। तब यह भी कहा गया कि वे इस बात से भी नाराज थे कि उनके प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए माकन को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार पार्टी ने क्यों घोषित कर दिया। उस चुनाव में पार्टी को एक सीट भी नहीं मिली। इस साल दस जनवरी को शीला दीक्षित को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। उनके साथ तीन कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए। कहा यही गया कि 80 पार की दीक्षित का चेहरा सामने रहेगा लेकिन काम तीनों कार्यकारी अध्यक्ष करेंगें। पार्टी के उनके विरोधियों ने कहा कि वे तो ‘आप’ से समझौता करवाने के लिए अध्यक्ष बनीं। वास्तविकता इसके उलट साबित हुई।

दीक्षित ने कहा कि जब पार्टी के अधिकांश नेता अपने बूते चुनाव लड़ना चाहते हैं तो हम किसी दल से समझौता क्यों करें। उनके मुताबिक, जल्दी उम्मीदवारों के नाम तय कर लिए जाएंगें। नाम तय करने की प्रक्रिया चल रही है। समझौता न होने का एक कारण तो पंजाब में कांग्रेस के अपने चुनाव लड़ने के फैसले के चलते भी हुआ क्योंकि ‘आप’ वहां भी कांग्रेस से तालमेल करना चाहती थी लेकिन वास्तव में दिल्ली का फैसला शीला दीक्षित के राजनीतिक कद के चलते हुआ। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली ने कहा कि चुनाव तो कांग्रेस और भाजपा में होना तय है, ‘आप’ से समझौता करके उसे ताकत देने का कोई मतलब नहीं है। अब पार्टी के लिए बड़ी चुनौती दिल्ली के बड़े नामों को चुनावी मैदान में उतारने की होगी, जिससे कई नेता अलग-अलग बहाना करके भागने वाले हैं।

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