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शब्दनामा: प्रवासी शब्द की अर्थयात्रा

भारत दुनिया में शायद पहला ऐसा देश होगा जहां अपने ही देश के सम्मानित नागरिक को अपने रोजगार के सिलसिले में एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में जाकर बस जाने पर ‘प्रवासी’ कहा जा रहा हो और प्राय: सामाजिक विद्रूपताओं पर मुखर विद्वतजन इसके संबंध में मौन साधे हों।

Author Published on: July 13, 2020 1:29 AM
Corona Crisis, Lockdown, Migrantsकोरोना वायरस महामारी के दौरान देश के अंदर श्रमिक और नौकरी पेशा लोग एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रवासी की तरह गए।

सत्यकेतु सांकृत
विभिन्न संचार माध्यमों विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों द्वारा जब किसी शब्द का चाहे-अनचाहे व्यापक स्तर पर भ्रामक प्रयोग होने लगता है तो एक ऐसी भ्रांति पैदा होती है जिसमें उसकी अर्थवत्ता धूल धूसरित होती दिखाई पड़ती है। इन दिनों कुछ कुछ ऐसा ही संकट ‘प्रवासी’ शब्द को लेकर उठ खड़ा हुआ है। कोरोना के इस विकट संकटकाल में एक अजीबोगरीब असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है। ऐसी स्थिति में अपनी अनियंत्रित होती भावनाओं को लेकर हमें विवेक और धैर्य दिखाना होगा। यह भी कि समाज को भावनाओं के खिलंदड़ेपन से कोई बचा सकता है तो वह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही है। पर विपदा की इस बेला में उसकी अगंभीरता औक अधीरता चिंता बढ़ाने वाली है।

पूर्णबंदी के दौरान जिस बदहाल स्थिति में गरीब मजदूरों को महानगरों से अपने गांवों की और लौटना पड़ा है वह दिल दहला देने वाला अनुभव है। ऐसे में जबकि यातायात के सारे साधन बंद रहे तो उनके लिए अपनी भूख की पीड़ा के आगे सारे खतरे बेमानी प्रतीत हुए और ऐसी विकट स्थिति में वे हजार-डेढ़ हजार किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांवों की ओर लौटने को मजबूर हुए। अफसोस की बात है कि बद से बदतर जिंदगी जीने को अभिशप्त इन कामगारों के साथ ‘प्रवासी’ जैसे शब्द को चस्पा कर कुछ मीडियाकर्मी भी अपने शब्दज्ञान की अल्पज्ञता का परिचय देते हुए देश के संघर्षशील जनसमुदाय को जाने-अनजाने अपमानित करने से बाज नहीं आ रहे हैं।

तकरीबन रूढ़ हो चुके शब्दों की अर्थवत्ता के मुलम्मे उसके दुरुपयोग से कैसे छूटने लगते हैं, यह इसका ज्वलंत उदाहरण है। मीडिया के श्रीमुख से नि:सृत ‘प्रवासी मजदूर’ जैसे शब्द को देववाणी की तरह स्वीकृति प्रदान करते हुए अब तो व्यापक रूप में न सिर्फ उसका इस्तेमाल किया जा रहा है बल्कि विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं द्वारा भी इस शब्द के प्रयोग के जरिए राजनीति साधी जा रही है।

भारत दुनिया में शायद पहला ऐसा देश होगा जहां अपने ही देश के सम्मानित नागरिक को अपने रोजगार के सिलसिले में एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में जाकर बस जाने पर ‘प्रवासी’ कहा जा रहा हो और प्राय: सामाजिक विद्रूपताओं पर मुखर विद्वतजन इसके संबंध में मौन साधे हों। ‘प्रवासी’ शब्द का प्रयोग ऐसे समुदाय या व्यक्ति विशेष के लिए रूढ़ हो चुका है जो अपने देश को छोड़कर दूसरे देश में जाकर बसने को मजबूर हुए हों या जो अपनी मर्जी से अपने बेहतर जीवन की चाह में अपने देश को छोड़कर दूसरे देश में जा बसे हों। भारतीय संदर्भ में इसकी शुरुआत गिरमिटिया मजदूरों से मानी जा सकती है।

औपनिवेशिक शासन व्यवस्था में एक अनुबंध के तहत एक बड़े समुदाय को अच्छे जीवन का लालच देकर फिजी, सूरीनाम, मॉरीशस जैसे तत्कालीन गुमनाम देशों में धोखे से ले जाकर बसा दिया गया था और उसके बाद उनका अमानवीय शोषण किया गया था। इन्हीं गिरमिटिया मजदूरों या यों कहें कि ‘प्रवासी मजदूरों’ के शोषण की चर्चा ‘मॉरिशस के प्रेमचंद’ कहे जाने वाले कथाकार अभिमन्यु अनत ने अपने ‘लाल पसीना’ जैसे उपन्यासों में की है।

गांधीजी ने इन्हीं प्रवासी मजदूरों के हक की लड़ाई दक्षिण अफ्रीका में न सिर्फ लड़ी बल्कि पूरे विश्व का ध्यान उनकी तरफ खींचा। यह एक ऐसा समुदाय था जिसे एक तरह से जबरन दूसरे देशों में ले जाकर बसा दिया गया था।

इसके विपरीत बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में भारतीय समुदाय का एक वर्ग खाड़ी देशों में अपने बेहतर जीवन के लिए श्रमिकों के रूप में स्वेच्छा से जाकर बस गया। ऐसे कामगारों के लिए भी ‘प्रवासी मजदूर’ शब्द का इस्तेमाल किया गया। यहां तक कि नब्बे के दशक के बाद से अब तक अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और जापान जैसे विकसित देशों में स्वेच्छा से जाकर बस गए भारतीय समुदाय के लिए भी ‘प्रवासी’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता रहा है।

दरअसल, यह शब्द अपनी ध्वन्यात्मकता में विदेश में जाकर बस गए लोगों की पहचान को फलीभूत करता रहा है। पर जिस तरह से अपनी रोजी-रोटी की तलाश में एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश विशेषकर महानगरों में गए श्रमिकों को ‘प्रवासी’ कहकर संबोधित किया जा रहा है, वह अपने आप में कुछ प्रश्न पैदा करता है। क्या अपने ही देश के नागरिक को एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में कामकाज की तलाश में जाकर बस जाने पर ‘प्रवासी’ शब्द से संबोधित किया जा सकता है? अगर इसका उत्तर ‘हां’ है तो फिर यह शब्द केवल श्रमिकों के साथ ही चस्पा कर उन्हें अलग पहचान देने की कोशिश क्यों की जा रही है।

सही मायने में तो यह ‘प्रवासी’ विशेषण उस हर शख्स के साथ सुशोभित होना चाहिए जो अपने गांव-कस्बे से निकलकर बड़े शहरों में अच्छी सुविधा की चाह में जा बसा हो। इसमें उस नौकरीपेशा वर्ग को भी जोड़ लेना चाहिए जो अपने गांव या प्रांत से निकलकर अपने ही देश के किन्हीं अन्य प्रांत में बस गया हो? ऐसी स्थिति में दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में कोई प्रवासी प्रोफेसर होगा तो कोई प्रवासी डॉक्टर या इंजीनियर।

यहां तक कि अन्य प्रदेशों से आए नौकरशाह और न जाने कितने राजनीतिज्ञों के साथ साहित्यकारों और पत्रकारों के बड़े समूह भी इसकी जद में आ जाएंगे। फिर इस देश की लगभग आधी आबादी ‘प्रवासी’ के अजीबोगरीब विशेषण से नवाजी जाएगी। पर समाज के बुद्धीजीवी कहे जाने वाले वर्ग को ‘प्रवासी’ कहने की हिमाकत शायद ही कोई कर पाएगा। वह तो केवल सारी सुविधाओं से वंचित श्रमिक ही हैं, जो अपने ही देश में प्रवासी बना दिए जाने को अभिशप्त हैं।

दिलचस्प है कि ये तथाकथित ‘प्रवासी मजदूर’ वापस अपने गांव आने पर भी अपने उन्हीं विशेषणों से संबोधित किए जा रहे हैं। एक अत्यंत लोकप्रिय टीवी चैनल पर यह खबर ब्रेकिंग न्यूज के तौर पर चलाई गई कि अब बिहार और यूपी जैसे प्रदेशों में कोई बेरोजगार नहीं रहेगा और ‘प्रवासी मजदूरों’ को उनके गांव में ही ‘मनरेगा’ के तहत रोजगार उपलब्ध कराए जाएंगे यानी एक बार उनके साथ अपने ही देश में प्रवासी होने की जो छाप लगा दी गई है उससे उनको छुटकारा अपने गांव लौट आने पर भी नहीं मिल रहा है। यह एक ऐसी हास्यास्पद और कारुणिक स्थिति है जिसे जितनी जल्दी से जल्दी हो दूर कर देनी चाहिए।

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