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Lok Sabha Election 2019 Schedule: थोड़ी देर में तारीख का ऐलान, 2014 के मुकाबले 2019 लोकसभा चुनाव में दिखेंगे ये पांच बड़े बदलाव

2014 के मुकाबले 2019 लोकसभा चुनाव में कई परिवर्तन देखने को मिलने वाले हैं। इस बार कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी मुख्य चेहरा है, वहीं, मुद्दा भी पिछली बार के मुकाबले भ्रष्टाचार और काला धन से हटकर राष्ट्रवाद बनाम गद्दार पर जा टिका है।

2014 के मुकाबले इस बार चुनाव में कुछ निश्चित बदलाव देखने को मिलेंगे। (फोटो क्रेडिट/ PTI)

Lok Sabha Election Chunav 2019: लोकसभा चुनाव की रणभेरी कुछ ही देर में बजने वाली है। भारतीय चुनाव आयोग थोड़ी देर में तारीखों का ऐलान करने वाला है। तारीखों के ऐलान करते ही देश भर में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो जाएगी और औपचारिक रूप से पार्टियां चुनावी समर में उतर जाएंगी। लेकिन, इस बीच 2014 लोकसभा चुनाव और 2019 लोकसभा चुनाव में काफी अंतर देखने को मिल रहा है। चुनाव की तौर-तरीकों से लेकर मुद्दों काफी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। पिछली बार के मुकाबले इस बार चुनाव तकनीकी रूप से काफी माइक्रो-लेवल पर लड़ा जा रहा है। रैलियां हों या सोशल मीडिया, सभी जगहों पर चुनावी बोल और तौर-तरीके 2014 के मुकाबले इस बार कुछ हटकर दिखाई दे रहे हैं। पेश हैं, 2014 के मुकाबले 2019 लोकसभा चुनाव के 5 मुख्य बदलाव—

कांग्रेस से राहुल गांधी मुख्य चेहरा

2014 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनोहन सिंह और सोनिया गांधी को आगे रखकर चुनाव लड़ा जा रहा था। हालांकि, साथ में राहुल गांधी भी थे। मगर इस बार 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सर्वे-सर्वा राहुल गांधी ही हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस तमाम भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी थी। लेकिन, इस बार उल्टा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राफेल डील को मुद्दा बनाकर नरेंद्र मोदी की सरकार के खिलाफ काफी आक्रामक दिखाई दे रहे हैं। 2014 में कांग्रेस के नेताओं की भाषा शैली मुश्किल से कठोर दिखाई पड़ी। लेकिन, इस बार पार्टी के नेता बीजेपी के खिलाफ काफी कठोर और बेलाग भाषा-शैली का इस्तेमाल कर रहे हैं। खुद राहुल गांधी का ‘चौकीदार चोर है’, ‘गायब हो गया’ और ‘डरपोक’ आदि स्पष्ट उदाहरण हैं।

डिजिटल कैंपने का बदल चुका है तरीका

2014 के लोकसभा चुनाव में मुख्य रूप से फेसबुक और वॉट्सऐप पर राजनीतिक दलों का प्रचार व्यापक स्तर पर दिखाई दिया। लेकिन, सोशल मीडिया पर प्रचार अब राजनीतिक दलों से हटकर नेता-विशेष पर जा कर टिक गया है। फेसबुक, ट्विटर और वॉट्सऐप के जरिए प्रचार माइक्रो लेवल पर किया जा रहा है। हर नेता और पार्टी का अलग से समर्थक ग्रुप्स हैं जो चुनावी फायदा पहुंचाने के लिए प्रोपगैंडा को फैलाने में बढ़-चढ़कर प्रयास कर रहा है। इसमें बीजेपी को कांग्रेस समेत दूसरे दल भी टक्कर देते दिखाई दे रहे हैं। लगभग सभी दलों के नेता तथ्यों से परे सोशल मीडिया पर वॉर-पलटवार कर रहे हैं।

पहले ईमानदार बनाम भ्रष्टाचार और अब राष्ट्रवादी बनाम गद्दार

2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए के कार्यकाल में लगे भ्रष्टाचार के आरोप बड़े मुद्दे थे। उस दौरान मोदी के नेतृत्व में प्रचार कर रही बीजेपी काला धन और घोटाले को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ रही थी। पांच साल के कार्यकाल में मोदी सरकार ने नोटबंदी का हवाला देकर भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का दावा किया। लेकिन, इस चुनाव में खुद मोदी सरकार इस मुद्दे पर कुछ बोल नहीं रही है। 2019 के चुनाव में काला धन का कोई जिक्र नहीं है। काला धन समेत तमाम भ्रष्टाचार के मुद्दे चर्चा से गायब हैं और इनकी जगह अब राष्ट्रवाद ने ले रखी है। पाकिस्तान के खिलाफ एयर-स्ट्राइक और सर्जिकल स्ट्राइक को बीजेपी अपनी कामयाबी के तौर पर पेश कर रही है। वहीं, कांग्रेस पिछले चुनाव में मोदी द्वारा ‘एक बदले दस सिर’ लाने के दावे को चुनौती दे रही है। एयर-स्ट्राइक के जवाब में कांग्रेस जैश सरगना मसूद अजहर को लेकर निशाना साध रही है और पूछ रही है कंधार ले जाकर मसूद को किसने छोड़ा।

महागठबंधन बनाम मोदी

2019 लोकसभा चुनाव में मोदी के खिलाफ समस्त विपक्ष एकजुट दिखाई दे रहा है। कई जगहों पर पुराने विरोधी भी गठबंधन का हिस्सा बन चुके हैं। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा का गठबंधन है। जातीय समीकरण वाले गढ़ में बीजेपी इस स्थिति से मुकाबला करेगी। जबकि, 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मोदी के प्रचार और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का काफी लाभ मिला था। वहीं, अन्य जगहों पर मुख्य विपक्षी पार्टी महागठबंधन के दूसरे दलों के साथ अलग-अलग शर्तों पर हाथ मिलाने में रुचि दिखा रही है। कई जगहों पर कांग्रेस ने अपनी स्थिति स्पष्ट भी कर ली है। जबकि, कई जगहों पर अभी बातचीत जारी है। वहीं, स्थिति को भांपते हुए बीजेपी भी नए साथियों की तलाश कर रही है। 2014 में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए के सामने यूपीए और तमाम दल अपने-अपने निजी स्तर पर चुनाव लड़ रहे थे।

वीवीपैट मशीन का इस्तेमाल

चुनाव संपन्न कराने के दृष्टिकोण से भी इस बार प्रक्रिया 2014 लोकसभा चुनाव से अलग रहने वाली है। इस बार पूरे देश में ईवीएम के साथ-साथ वीवीपैट मशीन का इस्तेमाल किया जाएगा। ईवीएम टैंपरिंग के आरोप के बाद चुनाव आयोग ने वीवीपैट तकनीक को हर जगह लागू करने का ऐलान किया है। पिछले विधानसभा चुनावों में इसका इस्तेमाल हो चुका है।

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