ताज़ा खबर
 

जजों की बगावत पर सियासत तेज- कांग्रेस ला सकती है मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग, विशेषज्ञ बोले- होने चाहिए दो सॉलिड ग्राउंड

अगर कांग्रेस जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाती है तो देश के न्यायिक इतिहास में वो तीसरे जज होंगे जिनके खिलाफ महाभियोग लाया जाएगा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज।

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों द्वारा देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ मुहिम छेड़ने के बाद अब इस बात की चर्चा हो रही है कि संसद के आगामी बजट सत्र में कांग्रेस पार्टी चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग ला सकती है। सूत्रों के मुताबिक इस मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और सीनियर एडवोकेट्स से संपर्क कर अंतिम फैसला लेंगे। चार वरिष्ठ जजों द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेन्स कर आरोप लगाने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने देर शाम प्रेस कॉन्फ्रेन्स किया और इसे काफी गंभीर मुद्दा बताया। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि चार जजों द्वारा उठाए गए मुद्दे काफी संवेदनशील हैं लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं। उन्होंने जजों द्वारा जज लोया के मामले को उठाने पर कहा कि इसकी जांच होनी चाहिए। इससे पहले कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सूरजेवाला ने भी जज लोया की मौत की जांच सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जज से कराने की मांग की।

बता दें कि शुक्रवार (12 जनवरी) को सुप्रीम कोर्ट के चार जजों जस्टिस चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगाई, जस्टिस मदन भीमराव लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि केसों के आवंटन में अनियमितता बरती जा रही है। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए एक खतरा बताया था। जस्टिस चेलामेश्वर के आवास पर हुई इस प्रेस कॉन्फ्रेन्स में जजों ने गुजरात के सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ केस की सुनवाई करने वाले जज लोया की संदेहास्पद मौत का भी उल्लेख किया।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ:

इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस जेड यू खान ने भी न्यूज 18 इंडिया के कार्यक्रम में चारों जजों के उस तर्क को सही ठहराया है कि सीजेआई अन्य जजों के बॉस नहीं हैं बल्कि बराबर हैं लेकिन वो इन सबमें सबसे आगे हैं। उन्होंने कहा कि सभी जज संविधान से बंधे हुए हैं। उन्होंने कहा कि जजेज इन्क्वायरी एक्ट 1968 के तहत ही महाभियोग लाया जा सकता है। जस्टिस खान ने कहा कि अनाचार और अयोग्यता ये दो आधार हैं जिनके बल पर ही किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाया जा सकता है। इसे साबित भी करना होता है। हालांकि अभी तक देश में किसी भी जज पर महाभियोग की पूरी प्रक्रिया नहीं हो सकी है।

गौरतलब है कि देश की न्यायपालिका के इतिहास में यह पहला मौका है जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने बाही होकर मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ मोर्चा खोला हो। जस्टिस चेलामेश्वर ने कहा कि पिछले पिछले 2 महीने से सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन ठीक से नहीं चल रहा है। इसमें सुधार की जरूरत है। जस्टिस चेलामेश्वर ने कहा था कि इस संबंध में इन लोगों ने सीजेआई दीपक मिश्रा को पत्र लिखा था और उनसे मुलाकात की थी लेकिन उन्होंने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। चारों जजों ने मीडिया में आने की बात को सही ठहकाते हुए कहा कि उनका मकसद देश के सर्वोच्च न्यायिक संस्थान की अहमियत को बरकरार रखना है।

अब तक दो बार लाया गया है महाभियोग: अगर कांग्रेस जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाती है तो देश के न्यायिक इतिहास में वो तीसरे जज होंगे जिनके खिलाफ महाभियोग लाया जाएगा। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस वी रामास्वामी पर साल 1993 में महाभियोग लाया गया था लेकिन यह प्रस्ताव लोकसभा में ही गिर गया था। इसके बाद कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन को महाभियोग का सामना करना पड़ा था। उन पर साल 2011 में महाभियोग लाया गया था लेकिन उन्होंने लोकसभा में इसका सामना करने से पहले ही पद से इस्तीफा दे दिया था।

सियासत हुई तेज: देश के मुख्य न्यायाधीश बनाम अन्य न्यायाधीशों की लड़ाई में राजनीति भी तेज हो गई है। कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा कि इस मुद्दे में सरकार की तरफ से भी चूक नजर आ रही है। जस्टिस चेलमेश्वर से मिलने वाले सीपीआई के डी राजा ने इसे राजनीतिक रंग देने से इनकार किया और कहा कि जजों द्वारा उठाया गया कदम देश और लोकतंत्र के लिए ऐतिहासिक है। पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने ट्विटर पर लिखा, सुप्रीम कोर्ट से जुड़े आज के घटनाक्रम से हम व्यथित हैं। चारों जजों द्वारा जो बयान दिए गए वे नागरिक के तौर पर हमें परेशान और दुखी करने वाले हैं।

क्या है महाभियोग और उसकी प्रक्रिया: संविधान के अनुच्छेद 124(4)127 में सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को हटाने का प्रावधान है। जजों को हटाने की प्रक्रिया महाभियोग कहलाती है। इसका निर्धारण जज इन्क्वायरी एक्ट 1968 के जरिए होता है। महाभियोग की शुरुआत संसद के किसी भी सदन में हो सकती है। इसके लिए लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों की सहमति जरूरी होती है। प्रस्ताव पारित के बाद सदन के पीठासीन अधिकारी द्वारा एक समिति का गठन किया जाता है जो जज पर लगे आरोपों की जांच करती है। इसके बाद उस रिपोर्ट के आधार पर आरोपी जज को सदन में अपना पक्ष रखना होता है। इसके बाद उस पर वोटिंग होती है। किसी जज को तभी महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है जब संसद  के दोनों सदनों में दो तिहाई मतों (उपस्थिति और वोटिंग) से यह प्रस्ताव पारित हो जाए। हालांकि अभी तक देश के इतिहास में ऐसा नहीं हो सका है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App