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पश्चिम बंगाल में बारिश थमी, राहत पर राजनीति तेज

पश्चिम बंगाल में मौसम के लगातार बदलते मिजाज के साथ ही सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी राजनीतिक दलों के बीच बाढ़ राहत पर राजनीति भी तेज हो रही है...

पश्चिम बंगाल में बाढ़ के कारण एक लाख से ज्यादा घर बर्बाद हुए हैं और लगभग 93 लाख लोग इसकी चपेट में हैं। (पीटीआई फोटो)

पश्चिम बंगाल में पिछले चार दिनों से बारिश नहीं होने की वजह से बाढ़ की हालत में तो सुधार हुआ है, लेकिन राज्य के 12 बाढ़ग्रस्त जिलों में बने राहत शिविरों में रहने वाले लोगों में राहत के लिए हाहाकार मचा है। राज्य में मौसम के लगातार बदलते मिजाज के साथ ही सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी राजनीतिक दलों के बीच बाढ़ राहत पर राजनीति भी तेज हो रही है। माकपा ने सवाल उठाया है कि जब पूरा राज्य बाढ़ की चपेट में था तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लंदन दौरे पर जाने की क्या जरूरत थी?

राज्य सरकार ने 12 जिलों को बाढ़ग्रस्त घोषित कर दिया है। उन इलाकों में 4 लाख से ज्यादा बेघर लोगों के लिए 2,719 राहत शिविर और 592 चिकित्सा शिविर खोले गए हैं। इस बाढ़ के कारण एक लाख से ज्यादा घर बर्बाद हुए हैं और लगभग 93 लाख लोग इसकी चपेट में हैं। इसके अलावा कोई ढाई लाख हेक्टेयर में लगी फसलें नष्ट हो गई हैं। बाढ़ व तूफान की वजह से राज्य में 100 लोगों की मौत हो चुकी है। सरकार ने मृतकों के परिजनों को चार-चार लाख का मुआवजा देने का भी एलान किया है।

मौसम विभाग का कहना है कि विभिन्न वजहों से राज्य का मौसम हर साल बदल रहा है। वैसे तो राज्य के कुछ जिले हर साल बाढ़ की चपेट में आते हैं। लेकिन इस साल जुलाई में राज्य में जितनी बारिश हुई है वह एक रिकार्ड है। इससे पहले गर्मी ने भी आम लोगों के छक्के छुड़ा दिए थे। मौसम विज्ञानियों का कहना है कि दुनिया भर में होने वाले जलवायु परिवर्तन के असर से बंगाल भी अछूता नहीं है। इसका असर सुंदरवन के द्वीपों पर भी नजर आने लगा है।

प्रभावित इलाकों में बाढ़ का पानी उतरने के साथ ही अब आंत्रशोथ समेत दूसरी बीमारियों का खतरा भी गहरा रहा है। ममता का कहना है कि बाढ़ की हालत पर काबू पाना अकेले सरकार के वश की बात नहीं है। इसके लिए केंद्र की सहायता की जरूरत होगी।

इससे पहले पिछले हफ्ते कोमेन तूफान के असर के कारण बंगाल की खाड़ी पर बने निम्न दबाव के कारण राजधानी कोलकाता समेत दक्षिण बंगाल के तमाम जिलों में रिकार्ड बारिश हुई थी। कोलकाता में तो 24 घंटे के भीतर ही 145.4 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई। इसकी वजह से पूरा महानगर पानी-पानी हो गया। ममता ने बाढ़ की स्थिति गंभीर होने के लिए दामोदर घाटी निगम (डीवीसी) की ओर से अतिरिक्त मात्रा में पानी छोड़ने को भी जिम्मेदार ठहराया था। लेकिन डीवीसी ने तुरंत ही इस आरोप का खंडन कर दिया था।

तूफान और बाढ़ की वजह से ममता बनर्जी अपने लंदन दौरे में कटौती कर दो दिन पहले ही यहां लौट आई थीं। उसके बाद उन्होंने कई बाढ़ग्रस्त इलाकों का दौरा कर राहत कार्यों की निगरानी की। उन्होंने पहले कहा था कि सरकार बाढ़ राहत के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएगी। लेकिन उसके चौबीस घंटों की भीतर ही अपना रुख बदलते हुए मुख्यमंत्री ने दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने और बाढ़ राहत व पुनर्वास के मद में केंद्रीय सहायता मांगने का फैसला किया है। वे 11 अगस्त को दिल्ली जाएंगी। उससे पहले सोमवार को बाढ़ग्रस्त जिलों के जिलाशासकों के साथ बैठक में वे हालात की समीक्षा करेंगी।

इस बीच, राजनीतिक दलों में बाढ़ राहत पर घमासान शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जहां विपक्षी दलों पर बाढ़ पर राजनीति करने का आरोप लगाया है तो विपक्षी दलों ने ममता पर बाढ़ पर्यटन का। विपक्ष का आरोप है कि ममता और दूसरे मंत्रियों के लगातार दौरों की वजह से राहत कार्यों में भारी दिक्कत हो रही है और जररूरतमंदों तक राहत सामग्री नहीं पहुंच रही है। दक्षिण बंगाल के कई जिलों में स्थापित राहत शिविरों में रहने वाले लोगों ने जरूर वस्तुओं की आपूर्ति नहीं होने के आरोप लगाए हैं। लोगों का आरोप है कि तृणमूल के नेता और कार्यकर्ता राजनीतिक रंग के आधार पर ही लोगों को राहत पहुंचा रहे हैं।

राहत में राजनीति के विपक्ष के आरोपों के बाद ममता ने बाढ़ पर एक सर्वदलीय बैठक भी बुलाई थी। लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह केंद्र से इस मद में ज्यादा रकम ऐंठने का बहाना है।

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