असम कैबिनेट के उस फैसले की अब विभिन्न मोर्चों आलोचना हो रही है, जिसमें राज्य के एक मेडिकल कॉलेज और अस्पताल से पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद का नाम हटाने का निर्णय लिया गया है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस कदम को राज्य के अन्य मेडिकल कॉलेजों के साथ “समानता” लाने के लिए उठाया गया कदम बताया है।
मंगलवार रात को कैबिनेट की बैठक के बाद सरमा ने घोषणा की कि कैबिनेट ने बरपेटा जिले में स्थित फखरुद्दीन अली अहमद मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (FAAMCH) का नाम बदलकर बरपेटा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल करने का फैसला किया है।
मुख्यमंत्री ने क्या तर्क दिया?
उन्होंने कहा, “राज्य सरकार द्वारा स्थापित सभी 15 मेडिकल कॉलेजों के नाम उन जगहों के नाम पर रखे गए हैं जहां वे स्थित हैं। लेकिन बरपेटा वाले कॉलेज का नाम फखरुद्दीन अली अहमद के नाम पर रखा गया था, जो अन्य ऐसे कॉलेजों से अलग था। इस वजह से हमें कई सवालों का सामना करना पड़ता था कि क्या यह कोई निजी मेडिकल कॉलेज है?”
उन्होंने आगे कहा कि राज्य सरकार इसके बजाय राज्य में किसी अन्य सांस्कृतिक या शैक्षणिक संस्थान का नाम उनके नाम पर रखेगी। इस तर्क के बावजूद, इस कदम की राज्य में “मूल निवासी असमिया मुसलमानों” का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों द्वारा आलोचना की जा रही है। बरपेटा के मूल निवासी अहमद भारत के पांचवें राष्ट्रपति थे; उन्होंने 24 अगस्त, 1974 से 11 फरवरी, 1977 तक इस पद पर कार्य किया।
राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल मुख्य रूप से 1975 में आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर करने के लिए याद किया जाता है, जिसकी घोषणा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने की थी। जाकिर हुसैन के बाद, इस पद को संभालने वाले वह केवल दूसरे मुस्लिम व्यक्ति थे।
‘सदौ असम गोरिया-मोरिया-देशी जातीय परिषद’ के बरपेटा जिला अध्यक्ष मौशम अहमद ने कहा कि उनका संगठन राज्य सरकार से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील करता है। उन्होंने कहा, “हम मुख्यमंत्री का शुक्रिया अदा करते हैं और उनका समर्थन करते हैं कि उन्होंने समय-समय पर असम के मूल निवासी मुसलमानों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में काम किया है… लेकिन हम फखरुद्दीन अली अहमद के नाम पर बने मेडिकल कॉलेज का नाम बदलने के फैसले से खुश नहीं हैं। विधानसभा और लोकसभा में सीटें जीतने के बाद, वह असम के पहले राष्ट्रपति बने थे। वह गोरिया समुदाय से थे। एक असमिया के तौर पर हमें उन पर गर्व है, और जब इस मेडिकल कॉलेज का नाम उनके नाम पर रखा गया था, तब हम बहुत खुश थे… असम के सभी मुसलमान इस बात से आहत हैं और हम असम सरकार और मुख्यमंत्री से अनुरोध करते हैं कि वे इस फैसले पर फिर से विचार करें।”
विपक्षी दलों ने भी इस कदम की आलोचना की
गोरिया उन पांच असमिया मुस्लिम उप-समूहों में से एक है, जिन्हें असम सरकार ने “मूल निवासी” असमिया मुस्लिम समुदायों के तौर पर पहचान देने की मंजूरी दी है; इस तरह उन्हें राज्य में बंगाली मूल के मुसलमानों की कहीं ज्यादा बड़ी आबादी से अलग दर्जा दिया गया है। राज्य में विपक्षी दलों ने भी इस कदम की आलोचना की है।
कांग्रेस नेता और बरपेटा के पूर्व सांसद अब्दुल खालेक ने कहा, “2001 में, जब तरुण गोगोई के नेतृत्व में सरकार बनी थी, तब सरकार ने बरपेटा में फखरुद्दीन अली अहमद के नाम पर एक मेडिकल कॉलेज बनाने का फैसला किया था… कल, हमें यह जानकर झटका लगा कि मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि इसका नाम बदल दिया जाएगा। इसकी क्या वजह है? क्या इसलिए कि वह जन्म और आस्था से मुसलमान थे, या कोई और वजह है? मुख्यमंत्री मुसलमानों के बीच फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं। वह गोरिया, मोरिया, सैयद और जुल्हा की बात करते हैं। दूसरी तरफ, एक ऐसे मूल निवासी जो मुसलमान हैं जो देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ी, जो आजादी के आंदोलन के दौरान जेल भी गए; ऐसे व्यक्ति के नाम को किसी संस्थान से हटाना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।”
AIUDF के विधायक रफीकुल इस्लाम ने कहा, “किसी ऐसे सार्वजनिक संस्थान का नाम बदलना, जो इतनी महान हस्ती की विरासत को संजोए हुए है, एक गलत संदेश देता है और उस सम्मान को कम करता है जिसके वह सही हकदार हैं। मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि वह इस फैसले पर फिर से विचार करे और संस्थान को उसका पुराना नाम—फखरुद्दीन अली अहमद—वापस दे। असम का गौरव बढ़ाने वालों का सम्मान करना कभी भी राजनीतिक उपेक्षा का विषय नहीं बनना चाहिए।”
हालांकि, मुख्यमंत्री सरमा ने बुधवार को यह बात दोहराई कि यह कदम राज्य के अन्य मेडिकल कॉलेजों के साथ एकरूपता लाने के लिए उठाया गया है। उन्होंने बुधवार को पत्रकारों से कहा, “डिब्रूगढ़, धुबरी, गुवाहाटी, सिलचर और तेजपुर के मेडिकल कॉलेज किसी के नाम पर नहीं हैं। तो फिर बरपेटा अलग कैसे हो सकता है? लोग गलती से यह सोच बैठेंगे कि यह एक प्राइवेट कॉलेज है। जब मैं बरपेटा गया था, तो कई लोगों ने मुझसे यह गुजारिश की थी। यह फैसला लोगों के हित में लिया गया है। हम किसी दूसरे अच्छे संस्थान का नाम उनके नाम पर रखेंगे।”
