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कटघरे में पुलिस

तीन वर्ष पहले अपनी मां की कथित बेरहमी की शिकार हुई शीना अब किसी पहचान की मोहताज नहीं।

Author नई दिल्ली | September 5, 2015 12:54 pm

तीन वर्ष पहले अपनी मां की कथित बेरहमी की शिकार हुई शीना अब किसी पहचान की मोहताज नहीं। लेकिन उसकी निर्मम हत्या सिर्फ इसलिए याद रखने लायक नहीं कि एक मां ने अपनी ही बेटी को अपनी बहन बता दिया और फिर ‘खानदानी आन’ की रक्षा या पैसों के लिए उसका कत्ल कर दिया।

बल्कि यह मामला देश में समाई पुलिसिया लापरवाही की मिसाल है। तीन साल पहले गोद में गिरे फल की तरह हासिल इस सनसनीखेज मामले में मौके पर कार्रवाई करने में नाकाम रही पुलिस अब सबूतों के लिए जंगल छान रही है।

पुलिस की इस दस्तावेजी पहचान के कारण शीना को इंसाफ की डगर पर आगे बढ़ने के लिए तीन वर्ष तक इंतजार करना पड़ा। कहना न होगा कि इस मामले को महज एक नजीर की तरह लेना होगा क्योंकि देश में 50 फीसद से भी ज्यादा मामले सिर्फ इसीलिए अदालतों में ठंडे पड़ जाते हैं कि पुलिस ने जांच में लापरवाही बरती, जिसका लाभ अपराधियों को मिला। रही-सही कसर न्याय प्रक्रिया की जटिलता से पूरी हो जाती है। कई वरिष्ठ अधिकारी तो यह अनुपात 50 फीसद से कहीं ज्यादा बताते हैं।

आला पुलिस अफसरों की मानें तो लापरवाही भी दो तरह की है। एक तो वह है जो अचानक या भूलवश हो जाए और दूसरी वह जो दूसरे पक्ष को लाभ पहुंचाने के लिए जान-बूझकर की जाए। एक और वजह यह भी है कि अपराध का बढ़ना चूंकि आपकी अपनी वर्दी पर दाग लगा सकता है इसलिए उसे दर्ज ही न किया जाए। शीना हत्याकांड में यही हुआ। ऐसा माना जा रहा है कि 2012 में ही रायगढ़ के निवासियों को शीना का कंकाल जंगल में मिल गया था। इसकी सूचना भी पुलिस को दी गई थी। लेकिन कई और तरह के कामों में उलझे पुलिसवालों को मामला दर्ज करने का ध्यान भला क्यों रहता?

इस लापरवाही के चलते ही मामले के अहम सबूत, जो तब शायद मिल भी जाते, गायब हो गए। तीन साल की सर्दी, गर्मी और बरसात के बाद पुलिस अब जितना मर्जी नाटक कर ले, मौकाए-वारदात से कुछ पुख्ता सुराग मिलने की गुंजाइश न के ही बराबर है। ऐसे में हलफिया या परिस्थितिजन्य सबूतों के कारण क्या हासिल होगा, यह देखने की बात है। तीन साल के अंतराल पर वकीलों की शातिराना जिरह तो अभी शुरू होनी है। हालांकि यह बहुत असंभव भी नहीं।

नोएडा के आरुषि हत्याकांड ने भी ऐसी ही सुर्खियां बटोरी थीं। युवा हो रही मासूम आरुषि को उसके ही घर में मौत के घाट उतार दिया गया था। उसके रसूखदार डॉक्टर माता-पिता राजेश व नुपूर तलवार पहले ही दिन से शक के घेरे में थे। लेकिन पुलिस ने पहले ही दिन ऐसा हड़कंप मचाया कि घटनास्थल का पूरा ब्योरा व तलाशी भी नहीं ली गई। लिहाजा घर के नेपाली नौकर हेमराज की लाश घर की छत पर पड़ी सड़ती रही। जब तक पुलिस ने लाश बरामद की, मौकाए-वारदात से साक्ष्य मिटाने का अपराधियों के पास पर्याप्त समय था।

राजधानी में ही जेसिका लाल का मामला अब भी सबके स्मृतिपटल पर ताजा है। इस मामले की जांच में कोताही के लिए पुलिस संदेह के घेरे में रही है। लेकिन जेसिका हत्याकांड में मुख्य आरोपी मनु शर्मा के बरी होने के फैसले के बाद जो सशक्त जनांदोलन खड़ा हुआ, उसके सामने पुलिस की तमाम पोलपट्टी खुल गई।

मामला एक बार फिर से खुला और फैसला पलट गया। राजधानी के पड़ोस में ही हुए एक अन्य नीतीश कटारा हत्याकांड में एक मां ने अपने पुत्र के हत्यारों (बाहुबली नेता डीपी यादव के बेटे विकास व दो अन्य) को सजा दिलाने के लिए सिर-धड़ की बाजी लगा दी और फिर चाहे देर से ही, दुरुस्त हुआ सब कुछ।

मेरठ के हाशिमपुरा हत्याकांड में पुलिस की लापरवाही इंसानी मूल्यों के पैरोकारों को बेचैन कर देने वाली है। इसी लापरवाही, कोताही और आपराधिक उपेक्षा के कारण पीड़ितों को इंसाफ हासिल करने के लिए बरसों भटकना पड़ा। 1987 में हुए इस हत्याकांड में अदालत में 2006 में आरोप तय हो सके क्योंकि पुलिस का रवैया पहले दिन से ही ठीक नहीं था।

लेकिन अफसोस की बात है कि 28 साल पुराने इस जघन्यतम मामले के 19 खाकी ‘कसूरवार’ (पीएसी वाले) अदालत ने सबूतों के अभाव के कारण छोड़ दिए हैं और मृतकों के मायूस परिजन फिर ऊंची अदालत से आस लगाए हैं कि देर से सही, उन्हें बचा-खुचा न्याय नसीब हो जाए।

हाशिमपुरा कांड के वक्त गाजियाबाद के पुलिस अधीक्षक रहे विभूति नारायण राय कई बार मुखर रूप से कह चुके हैं कि पीड़ितों को इसलिए न्याय नहीं मिला क्योंकि मामले में पहले की गई तफ्तीश अधूरी थी। राय दावा करते हैं कि जनसंहार में जिन पुलिसवालों के खिलाफ प्रथम दृष्टया स्पष्ट सबूत थे, उन पर कार्रवाई से इसलिए रोका गया क्योंकि शासन को पीएसी की बगावत का डर था।

मध्य प्रदेश के व्यापमं का उदाहरण भी ताजा ही है। इस मामले में लापरवाही जान-बूझ कर उच्च पदों पर बैठे लोगों को बचाने के लिए की गई। अगर शीना हत्याकांड में सबूतों की अनदेखी की गई, जेसिका लाल हत्याकांड में सबूतों से छेड़छाड़ की गई, आरुषि हत्याकांड में घटनास्थल की उपेक्षा की गई तो व्यापक गवाहों को ही नजरअंदाज किया गया। सौ से भी ज्यादा गवाह ऐसे थे जिनका बयान ही दर्ज नहीं हुआ।

क्या गांव, क्या शहर, एक बार भीड़ जमा हुई नहीं कि पुलिस हक्की-बक्की हो जाती है। और फिर भीड़ का ही कानून लागू हो जाता है। यहीं अगर घटनास्थल को सील कर दिया जाए तो वहां पर ऐसा बेवजह व अनधिकृत प्रवेश रोका जा सकता है। घटनास्थल पर पुलिस के आने से पहले ही छेड़छाड़ इसलिए भी हो जाती है कि पुलिस का आने का समय ही देरी से होता है। यह सिर्फ दावे की बात है कि अत्याधुनिक व तेज रफ्तार वाहनों से लैस पुलिस पांच मिनट में ही हादसे वाली जगह पर पहुंच जाती है।

एक और बड़ा कारण यह भी है कि देश में पुलिस के पास फॉरेंसिक विशेषज्ञों की भारी कमी है। जो हैं वे भी उतने प्रशिक्षित नहीं हैं। एक संसदीय समिति ने 2013 में जो रिपोर्ट पेश की थी उसके मुताबिक देश में सिर्फ 25 फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं हैं और इनमें महज 60 विशेषज्ञ हैं।

अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक देश में एक हजार फॉरेंसिक विशेषज्ञों की जरूरत है। बजाहिर, अपराध की जांच में फॉरेंसिक प्रमाणों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। खास तौर पर बलात्कार के मामलों में मौके से मिले खून या वीर्य के सबूत महत्त्वपूर्ण भूमिका तय कर सकते हैं। कत्ल और दूसरे फौजदारी के मामलों में भी रक्त, दांतों और हड्डियों का विशेष महत्त्व रहता है। बलात्कार के मामलों में आरोपी का डीएनए प्रोफाइल बनाने में इन सब सबूतों की अहमियत रहती है।
अब मुद्दा यह है कि क्यों हमारे ही देश में पुलिस जांच में घपला होता है। भ्रष्टाचार के एक आरोप के अलावा जो मुख्य कारण हैं, वह अपने में ही विचारणीय हैं। सबसे बड़ा कारण तो पुलिस वालों का अपराध की जांच का समुचित प्रशिक्षण न होना ही है।

यही कारण है कि पुलिस जांच शुरू करने का जो बुनियादी नियम है, उसी का पालन नहीं होता। इस नियम के तहत सबसे पहला काम घटनास्थल की घेरेबंदी करके उसे सुरक्षित करना होता है। लेकिन हमारे यहां घटनास्थल कई बार तो आम रास्ता ही बन जाता है। अति उत्साही मोबाइल कैमरा पत्रकारों में ही रिकार्डिंग की होड़ लग जाती है। और हरेक को घटनास्थल में घुसकर माहिराना राय जारी करनी होती है।

हमारे देश में किसी भी अपराध के मामले में प्राथमिकी दर्ज कराना ही आसान काम नहीं है। पुलिस को लगता है कि रपट दर्ज हो गई तो थाने के खाते में अपराध दर्ज हो जाएंगे। कर्मचारियों व अधिकारियों की पदोन्नति पर असर पड़ेगा। लिहाजा ज्यादातर पुलिस स्टेशन परामर्श केंद्र बन गए हैं। बलात्कार के अपराध में पुलिस में रपट दर्ज कराना एवरेस्ट की चोटी चढ़ने से कम नहीं।

ज्यादातर मामलों में पुलिस वाले ही शिकायतकर्ता को बदनामी की दुहाई देकर चुप कराके, समझा-बुझाकरभेज देते हैं। हालांकि इस आंकड़े पर विवाद हो सकता है। लेकिन यह माना जाता है कि छेड़छाड़, शोषण, दुर्व्यवहार, बलात्कार और बलात्कार की कोशिश के महज 20 फीसद मामले ही दर्ज होते हैं।

एक बार मामला दर्ज हो जाए किसी तरह तो दूसरा खेल शुरू हो जाता है। पुलिस तंत्र में समाए भ्रष्टाचार के चलते एक ओर बड़ा कारण ठहरता है सबूतों से छेड़छाड़ का। जैसा कि जेसिका लाल हत्याकांड में हुआ। फाइल और मौके से मिले साक्ष्यों के साथ तो छेड़छाड़ की ही गई, ये आरोप भी लगे कि खास सबूत जोड़ दिए गए और गवाहों की खरीद-फरोख्त भी हुई।

पुलिस तंत्र की पारंपरिक लुका-छिपी भी मामले को उलझा कर रख देती है। जांच में पारदर्शिता के अभाव के कारण शरलाक होम्स के वंशज इस पर अपने कयास-अंदेशे लगाते रहते हैं। रोज एक नए कोण से वही पुरानी सूचनाएं परोस दी जाती हैं। कहना न होगा कि विकसित देशों में मीडिया कवरेज के लिए पुलिस पूरी तरह से पारदर्शी रवैया अपनाने की भरसक कोशिश करती है।

वहां पर आधिकारिक तौर पर सूचना जारी करने का प्रावधान है और जो सूचना साझा की जा सकती है, उसे मुहैया कराया जाता है। लेकिन हमारे यहां वह महकमे में हर स्तर से छन-छन के बाहर आती है और मामले पर भ्रामक प्रचार का कारण बनती है। हां, 24 गुणा 7 के संगी प्रचार माध्यमों को जरूर प्रचारित करती है। जेसिका लाल मामले में शायद इंसाफ की भी हत्या हो जाती, अगर एक जनांदोलन न खड़ा हो गया होता। लेकिन सवाल यह है कि अपराधी को उसके किए की सजा मुल्क की पुलिस और न्यायिक व्यवस्था से स्वाभाविक तौर पर क्यों न मिले? इस व्यवस्था को ठीक से लागू करने में इच्छाशक्ति की किस स्तर पर कमी है और इस कमी को दूर करने के रास्ते में कहां रुकावट है?

शीना हत्याकांड देश के हाई प्रोफाइल मीडिया मुगल पीटर मुखर्जी से जुड़ा है इसलिए सबकी नजर में है। आरुषि, जेसिका लाल और नीतीश कटारा भी इस मामले में अपवाद नहीं। लेकिन उस आम आदमी का क्या जो किसी गांव या छोटे शहर में व्यवस्था की इन खामियों का शिकार हो रहा है?

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