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कड़वा सच: पीएम के संसदीय क्षेत्र की संगीता को सरकारी रवैया ही कर रहा खुले में शौच को मजबूर

अगस्त में मोदी सरकार ने घोषणा की थी कि गंगा घाट पर उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में स्थित 4480 गांव खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं।
Author September 25, 2017 12:56 pm
सुजाबाद में कपड़े और बर्तन गंगा घाट पर धोना आम बात है। (एक्सप्रेस फोटो- रेणुका पुरी)

मल्लिका जोशी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में गंगा घाट पर हर शाम हाई-प्रेशर पाइप से सफाई की जाती है। लेकिन गंगा घाट के दूसरी तरफ स्थित गांवों में आज भी लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं। सुजाबाद में रहने वाले रिक्शावाले, ढेला वाले, दिहाड़ी मजदूर खुले में ही शौच करते हैं, नहाते हैं, बर्तन और कपड़े धोते हैं। ये गांव घाट से एक अस्थाई पुल से जुड़ा हुआ है। इस पार आने के लिए नाव का इस्तेमाल किया जाता है। इस गांव के लिए लोगों के लिए मोदी सरकार के “स्वच्छता अभियान” के तहत हुए काम अभी “अधूरे” हैं।

35 वर्षीय संगीता देवी के अनुसार उन्होंने नए शौचालय के लिए पिछले साल अर्जी दी थी।  इस साल जून में काम शुरू हुआ और एक हफ्ते के अंदर बन गया लेकिन वो किसी काम का नहीं है। संगीता कहती हैं, “शौचालय का सेप्टिक टैंक मेरी रसोई से तीन मीटर दूर है। उस पर ढक्कन भी नहीं है। शौचालय में भी छत नहीं है।” संगीता कहती हैं, “हम अर्जी देने के लिए एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर दौड़े थे। मेरी दो बेटियां हैं। एक 11 साल की दूसरी 13 साल की। मेरे दो बेटे भी हैं। मैं नहीं चाहती कि वो सुबह खुले में शौच जाएं। मैं 35 साल तक ऐसा ही जीवन जीती रही हूं लेकिन मेरी बेटियां ऐसा क्यों करें”

अगस्त में मोदी सरकार ने घोषणा की थी कि गंगा घाट पर उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में स्थित 4480 गांव खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं। लेकिन सुजाबाद  में ऐसे कई घर हैं जिनमें अधूरे बने शौचालय हैं। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार स्वच्छ भारत अभियान के तहत हर घर को शौचालय बनवाने के लिए 12 हजार रुपये की आर्थिक मदद मिलती है। पैसे परिवार की महिला के खाते में डाले जाते हैं। 23 अक्टूबर 2016 को संगीता को जिला प्रशासन से पत्र मिला कि सूचना मिलने के एक हफ्ते के अंदर शौचालय बनवाकर पैसे का दावा करें। संगीता ने प्रशासन से मिला पत्र इंडियन एक्सप्रेस को दिखाया।

संगीता को पैसे का दावा करने के लिए शौचालय की तस्वीर भी लगानी थी। संगीता के अनुसार बाद में गांव के प्रधान ने कहा कि शौचालय वो बनवाएंगे। जून में शौचालय बना लेकिन अधूरा। शौचालय बनने वाले मजदूर बीच में ही काम छोड़कर चले गये। संगीता कहती हैं, “अगर मैं बनवाती तो उन्हें आधा काम छोड़कर नहीं जाने देती।” गांव के कई और लोगों ने नाम न देने की शर्त पर बताया कि शौचालय बनाने का पैसा ग्राम प्रधान के खाते में आता है और वो निजी ठेकेदारों से शौचालय बनवाता है।

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