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पीएम नरेन्द्र मोदी ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को दी श्रद्धांजलि, कहा- भारत आपके साहस और त्याग को कभी नहीं भूलेगा

23 मार्च 1931 को ब्रिटिश हुकूमत ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेज अधिकारी जॉन सैंडर्स की हत्या का दोषी मानते हुए फांसी पर चढ़ा दिया था।

भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को अंग्रेजों ने लाहौर जेल में 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी थी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शहीद दिवस के मौके पर क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को श्रद्धांजलि दी है। पीएम ने भारत मां के इन वीर सपूतों को याद करते हुए ट्वीटर पर लिखा, ‘भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को उनके बलिदान दिवस पर याद करता हूं, भारत उनके साहस और त्याग को कभी नहीं भूलेगा।’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्वीटर के जरिये देश के महापुरुषों को याद करने परंपरा बनाई है। 23 मार्च 1931 को ब्रिटिश हुकूमत ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेज अधिकारी जॉन सैंडर्स की हत्या का दोषी मानते हुए फांसी पर चढ़ा दिया था। पूरा हिन्दुस्तान 23 मार्च को भारत मां के इन सपूतों के बलिदान को शहीद दिवस के रुप में मनाता है।

इतिहास के दस्तावेजों के मुताबिक भगत सिंह और उनके सहयोगी ब्रिटिश पुलिस सुपरिंटेंडेंट जेम्स स्कॉट को मारना चाहते थे। क्योंकि वे स्कॉट को स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय की मौत का जिम्मेदार मानते थे। लेकिन इसकी जगह भगत सिंह और उनके साथियों के हाथों सैंडर्स मारा गया था। इस हमले के बाद भगत सिंह और उनके साथी फरार हो गये थे लेकिन भगत सिंह अपनी आवाज ब्रिटिश सरकार को सुनाना चाहते थे, उन्होंने 8 अप्रैल 1929 को अपने क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर दिल्ली स्थित सेन्ट्रल एसेंबली में एक बम फेंका, इस घटना में किसी की जान नहीं गई, क्योंकि खुद भगत सिंह ही ऐसा नहीं चाहते थे। दरअसल भगत सिहं और बटुकेश्वर पब्लिक सेफ्टी बिल का विरोध कर रहे थे। अगर भगत और बटुकेश्वर चाहते तो भाग सकते थे लेकिन उन्होंने अपनी गिरफ़्तारी दी।

इस केस में भगत सिंह को ताउम्र कैद की सजा सुनाई गई, लेकिन इसी दौरान उनपर सैंडर्स की हत्या का मुकदमा भी चला और ब्रिटिश अदालत ने उन्हें इसका दोषी पाया। आखिरकार 23 मार्च को अंग्रेजों ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा दे दी। वैसे तो इनकी फांसी की तारीख 24 मार्च को तय थी लेकिन लोगों के अभूतपूर्व विरोध को देखते हुए तीनों क्रांतिकारियों को 31 मार्च को ही फांसी दे दी गई। अंग्रेज भारत के इन क्रांतिकारियों की लोकप्रियता से इस कदर डरते थे कि उन्होंने इन तीनों की अस्थियां इनके परिवार वालों को नहीं सौंपी थी और उसे सतलज नदी में बहा दिया था।

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