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केंद्र की कोयले की आत्मनिर्भर योजना के खिलाफ चार राज्यों ने पीएम मोदी को लिखी चिट्ठी, आदिवासी नेताओं ने भी आशियाना छिनने का किया विरोध

देश में कोयले की खदानों पर सरकार का नियंत्रण रहा है लेकिन इन नए 40 कोलफील्ड के आवंटन में निजीकरण को तरजीह दी जा सकती है।

narendra modi coal block coalfieldsकोल ब्लॉक आवंटन के खिलाफ चार राज्यों के सीएम ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखी है। (पीटीआई/फाइल फोटो)

अपनी महत्वकांक्षी ‘आत्मनिर्भर भारत’ योजना के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कोयले के आयात को कम करने की योजना बनायी है। इसके लिए सरकार ने देश में ही 40 नए कोल फील्ड (कोयले की खदान) खोलने का फैसला किया है। गौरतलब है कि ये कोल फील्ड जिन जंगलों में खोले जाएंगे, उनमें से कई भारत के जैव विविधता वाले संवेदनशील जंगल हैं, जिनके तबाह होने से पर्यावरण को भारी नुकसान होने की आशंका है।

जिन कोलफील्ड को खोलने की अनुमति दी जाएगी, उनमें से 4 बड़े ब्लॉक छत्तीसगढ़ के हसदेओ अरंड नामक जंगल में हैं। 4,20,000 एकड़ भूमि में फैले इस हसदेओ अरंड जंगल से करीब 5 बिलियन टन कोयला निकलने की उम्मीद है। देश में कोयले की खदानों पर सरकार का नियंत्रण रहा है लेकिन इन नए 40 कोलफील्ड के आवंटन में निजीकरण को तरजीह दी जा सकती है।

बता दें कि इन कोल फील्ड के लिए जो कंपनियां बोली लगा रही हैं, उनमें अडाणी ग्रुप आदि शामिल हैं। हालांकि इन कोल फील्ड की नीलामी पर विवाद शुरू हो गया है। दरअसल इन 40 कोल फील्ड में से 7 कोल फील्ड ऐसे हैं, जिनमें कोयले की खुदाई पर रोक थी क्योंकि ये जंगल पर्यावरण के लिहाज से काफी अहम हैं और साथ ही 80 फीसदी कोल ब्लॉक आदिवासी लोगों के घर हैं।

यही वजह है कि चार राज्यों की सरकारों पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, झारखंड और छत्तीसगढ़ ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर कोल ब्लॉक की नीलामी पर आपत्ति जतायी है। द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक स्थानीय आदिवासी उमेश्वर सिंह अमरा का कहना है कि कोल ब्लॉक की नीलामी ना हो इसके लिए वह अपनी जान भी देने को तैयार हैं। अमरा ने कहा कि साल 2011 में जंगल के बाहरी इलाके में कोयला खनन की मंजूरी दी गई थी। जिसके बाद यह इलाका प्रदूषण, गर्मी और शोर से भर गया है। यहां अपराध की दर तेजी से बढ़ी है और जंगल में रहने वाले हाथी उग्र हो गए हैं, जिनके हमले में कई लोगों की जान जा चुकी है।

अमरा ने बताया कि कोयला खनन के चलते उनके इलाके में पांच गांव तबाह हो चुके हैं और 6000 आदिवासी लोग विस्थापित हो चुके हैं। वहीं हजारों हेक्टेयर भूमि से पेड़ काटकर सड़कें और खदान बनायी जा रही हैं।

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