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आप राज्यसभा में हंगामे के बीच क्यों नहीं पास करा देते बिल, पूर्व उपराष्ट्रपति ने लिखा- पीएम मोदी बनाते थे दबाव

अंसारी ने इसका खुलासा अपनी नई किताब ‘‘ बाय मैनी ए हैप्पी एक्सीटेंडः रीकलेक्शन्स ऑफ ए लाइफ’’ में किया है। उनका यह कथन ऐसे समय में आया है जब केंद सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों को लेकर देश में कुछ किसान संगठनों और सरकार के बीच ठन गई है।

Author Edited By सिद्धार्थ राय नई दिल्ली | Updated: January 28, 2021 8:38 AM
,Rajya Sabha,NDA,Narendra Modi,hamid ansari,अंसारी ने इसका खुलासा अपनी नई किताब ‘‘ बाय मैनी ए हैप्पी एक्सीटेंडः रीकलेक्शन्स ऑफ ए लाइफ’’ में किया है। (file)

पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने राज्यसभा के सभापति के रूप में तय किया था कि वह कोई भी विधेयक हंगामे में पारित नहीं होने देंगे और उनके मुताबिक उनके कार्यकाल के दौरान इस सिद्धांत का स्वागत करते हुए उस समय के सत्तारूढ़ और विपक्षी दल ने इसका अनुसरण भी किया। अंसारी ने इसका खुलासा अपनी नई किताब ‘‘ बाय मैनी ए हैप्पी एक्सीटेंडः रीकलेक्शन्स ऑफ ए लाइफ’’ में किया है। उनका यह कथन ऐसे समय में आया है जब केंद सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों को लेकर देश में कुछ किसान संगठनों और सरकार के बीच ठन गई है। ज्ञात हो कि तीनों कृषि कानून भारी हंगामे के बीच राज्यसभा से पारित कराए गए थे।

पूर्व उपराष्ट्रपति के मुताबिक तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने ऐसी स्थिति का मुकाबला अपने प्रबंधन के गुर और विपक्षी दलों को साध कर किया वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार का रुख इससे इतर रहा। अंसारी के अनुसार राजग का मानना था कि लोकसभा में उसका बहुमत में होना उसे राज्यसभा की प्रक्रियात्मक अड़चनों से नैतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण बना देता है और इसकी अभिव्यक्ति खुद प्रधानमंत्री मोदी ने उनके सामने की थी। इस पुस्तक में उन्होंने अपने राजनयिक जीवन और राज्यसभा के सभापति के रूप में अपने कई अनुभवों का उल्लेख किया है।

उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति के तौर पर अंसारी का कार्यकाल 10 अगस्त 2017 को पूरा हुआ। वह 2007 से 2017 तक इस पद पर रहे। अपनी किताब में अंसारी ने उस रूख का भी उल्लेख किया है जिसमें उन्होंने बतौर राज्यसभा के सभापति निर्णय लिया था कि वह कोई विधेयक हंगामे और शोर-शराबे में पारित नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा कि सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्षी दलों ने भी इस सैद्धंतिक फैसले का स्वागत करते हुए सराहना की थी उनके कार्यकाल में इसका पालन भी किया गया।

पुस्तक में अंसारी ने कहा कि इससे दोनों सरकारों को परेशानी हुई लेकिन संप्रग सरकार ने उनके नियम का संज्ञान लिया और इसके मद्देनजर सदन में प्रबंधन किया और विपक्ष के साथ समन्वय किया। पूर्व उपराष्ट्रपति ने कहा, “दूसरी ओर राजग सरकार को लगता था कि उसके पास लोकसभा में बहुमत है तो उसे राज्यसभा में प्रक्रियात्मक बाधाओं पर हावी होने का उसे ‘नैतिक’ अधिकार मिल गया है। मुझे यह अधिकृत रूप से बताया गया।’’ उन्होंने कहा, ” एक दिन राज्यसभा के मेरे दफ्तर में प्रधानमंत्री मोदी आए। आमतौर पर ऐसा नहीं होता है कि प्रधानमंत्री बिना तय कार्यक्रम के मिलने आए। मैंने… उनका रस्मी अभिवादन किया। ’’

अंसारी ने कहा, ‘‘ उन्होंने (मोदी) कहा कि आपसे उच्च जिम्मेदारियों की अपेक्षा है लेकिन आप मेरी मदद नहीं कर रहे हैं। मैंने कहा कि राज्यसभा में और बाहर मेरा काम सार्वजनिक है। उन्होंने पूछा ‘शोरगुल’ में विधेयक पारित क्यों नहीं कराए जा रहे हैं? मैंने जवाब दिया कि सदन के नेता और उनके सहयोगी जब विपक्ष में थे तो उन्होंने इस नियम की सराहना की थी कि कोई भी विधेयक शोरगुल में पारित नहीं कराया जाएगा और मंजूरी के लिए सामान्य कार्यवाही चलेगी। ’’

अंसारी ने कहा, ‘‘ इसके बाद उन्होंने (मोदी) ने कहा कि राज्यसभा टीवी सरकार के पक्ष में नहीं दिखा रहा है। मेरा जवाब था कि चैनल की स्थापना में तो मेरी भूमिका थी लेकिन इसके संपादकीय कामकाज में मेरी कोई भूमिका नहीं है। राज्यसभा सदस्यों की एक समिति है, जिसमें भाजपा का भी प्रतिनिधित्व है, वह चैनल को मार्गदर्शन देती है। चैलन के कार्यक्रम और चर्चाओं की दर्शक सराहना करते हैं।’’

पूर्व उपराष्ट्रपति ने अपनी पुस्तक में कहा कि उनके कार्यकाल के अंतिम सप्ताह के दौरान दो घटनाओं से कुछ वर्गों में ‘‘नाराज़गी’’ पैदा हुई और समझा गया कि इनके कुछ ‘‘छिपे हुए अर्थ’’ थे। अंसारी दीक्षांत समारोह में किए संबोधन और एक टीवी साक्षात्कार का जिक्र कर रहे हैं जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यकों में असुरक्षा को लेकर आशंका का जिक्र किया था।

कार्यकाल के अपने अंतिम दिन का जिक्र करते हुए अंसारी ने कहा, ‘‘ मुझे बाद में पता चला कि मेरे कार्यकाल के आखिरी सप्ताह में दो घटनाओं ने कुछ वर्गों में नाराजगी पैदा की और समझा गया कि उनके छिपे हुए अर्थ थे।’’

उन्होंने कहा कि पहली, बेंगलुरू के नेशनल लॉ स्कूल ऑफ यूनिवर्सिटी के 25वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करना जहां उसका विषय था, ‘‘ दो आवश्यक वाद, क्यों बहुलदावाद और धर्मनिरपेक्षता हमारे लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं”, जिसमें “मैंने सहिष्णुता से आगे जाकर स्वीकार्यता के लिए सतत बातचीत के जरिए सद्भाव को बढ़ावा देने पर जोर दिया, क्योंकि हमारे समाज के विभिन्न वर्गों में असुरक्षा की आशंका बढ़ी है, खासकर, दलितों, मुसलमानों और ईसाइयों में।’’

उनके अनुसार दूसरी, राज्यसभा टीवी पर करण थापर को दिया साक्षात्कार था जो नौ अगस्त 2017 को प्रसारित हुआ जिसमें उपराष्ट्रपति के कार्य के सभी पहलुओं पर बातचीत की गई। इसमें ‘अनुदार राष्ट्रवाद’ और भारतीय समाज और राजनीति में मुसलमानों को लेकर धारणाओं के बारे सवाल भी शामिल थे।

रूपा पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक में अंसारी ने लिखा, “‘‘कुछ सवाल बेंगलुरु में मेरे संबोधन पर केंद्रित थे और कुछ अगस्त 2015 में ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत में दिए गए भाषण को लेकर भी थे। उनका जवाब देने के दौरान मैंने कहा, मुसलमानों में बेचैनी और असुरक्षा की भावना आ रही है। मैंने कहा कि जहां भी सकारात्मक कार्रवाई की जरूरत है वहां इसे किया जाना चाहिए और राय रखी कि भारतीय मुस्लिम अनूठे हैं और चरमपंथी विचारधारा से आकर्षित नहीं होते हैं।’’

इसके बाद उन्होंने अपने कार्यकाल और राज्यसभा के सभापति के तौर पर अपने अंतिम दिन-10 अगस्त 2017 के बारे में बताया। अंसारी ने कहा कि दिन की कार्यवाही सुबह के सत्र का विवरण रिकॉर्ड करती है। पार्टी नेताओं और मनोनीत शख्सियतों ने तारीफ की और प्रशंसात्मक संदर्भ दिए। कार्यवाही संबंधी सुधार और शोर गुल में कोई विधेयक पारित नहीं करने के नियम और निष्पक्षता का, खासकार जिक्र किया गया। पीछे की बेंच से एक वरिष्ठ सदस्य ने संस्कृत के श्लोक का उल्लेख करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दी और उपनिषद के शब्दों के हवाले से उनकी लंबी उम्र की कामना की।

पूर्व उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री ने उस कार्यक्रम में शिरकत करते हुए उनके कामों का चुनिंदा तौर पर उल्लेख किया। राज्यसभा के सभापति के रूप में उनके काम का बहुत कम उल्लेख किया गया और जबकि राजनयिक के रूप में उनके काम की ओर इशारा करके उसकी प्रशंसा की गयी।

अंसारी के अनुसार इसके पीछे इस बात का प्रयास था कि उन्हें एक खास माहौल और विचारधारा में बांधने तथा जहां उनकी तैनाती की गयी वहां इस प्रकार (मतलब मुसलमानों) से चर्चा करने की बात पर बल दिया जाए। साथ ही इस के पीछे एएमयू के कुलपति और एनएमसी के अध्यक्ष के रूप में उनकी पृष्ठभूमि की बात पर भी जोर देना था।

अंसारी ने मोदी के भाषण के हवाले से कहा, ‘‘ (इन सब वर्षों में) कुछ संघर्ष हो सकता है, लेकिन अब से आपको इस दुविधा का सामना नहीं करना पड़ेगा। आपको स्वतंत्रता का एहसास होगा और आपको अपनी विचारधारा के अनुरूप काम करने, सोचने और बोलने का मौका मिलेगा। ’’

सारी ने कहा कि उनके काम की अनदेखी की गई जबकि भारत के प्रतिनिधि के रूप में और विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र में एक महत्वपूर्ण अवधि में उनका काम साक्षी है। उन्होंने कहा कि भारत का प्रतिनिधि कहीं भी हो किसी स्तर का हो, भले ही, उच्च स्तर क्यों न हो, वह भारत के नजरीय के हिसाब से ही काम करता है और वह अपनी निजी धारणों से प्रभावित हुए बिना भारतीय हितों को ही बढ़ावा देता है।

उन्होंने उस दिन बाद में बालयोगी साभगार में राज्यसभा के सदस्यों की तरफ से विदाई कार्यक्रम का भी जिक्र किया जहां उन्हें ‘‘स्क्रॉल ऑफ ऑनर’’ दिया गया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने वहां भी संबोधन किया और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, सार्वजनिक जीवन में अनुभव, ब्रिगेडियर मोहम्मद उसमान और 1948 में उनकी शाहदत का जिक्र किया और उनके लंबे कार्यकाल के बारे में उनके संज्ञान में कुछ भी प्रतिकूल नहीं आया। उन्होंने उम्मीद जताई कि जो ज्ञान कार्यकाल के दौरान हासिल हुआ है वह जनहित के लिए दर्ज होगा।

 

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